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84 pages, Paperback
Published January 20, 2017
ख़्वाब के गाँव में by Javed Akhtar
एक छोटी, कलात्मक लेकिन भावनात्मक रूप से गहरी किताब जो शायरी, विचार और तजुर्बे के ज़रिये ज़िंदगी, समाज और सिनेमा पर जावेद साहब की नज़र को बेहद सलीके से सामने रखती है।
रूप और प्रस्तुति:
तकनीकी रूप से यह पारंपरिक कविता-संग्रह नहीं, बल्कि एक मिनी कॉफी-टेबल बुक है जिसमें छोटे-छोटे अशआर, नज़्मों के अंश, इंटरव्यू की पंक्तियाँ और तजुर्बाती टिप्पणियाँ सुन्दर हिंदी कैलीग्राफी और स्केचों के साथ सजाई गई हैं। फ़ॉन्ट, लेआउट और चित्रकारी किताब को पढ़ने से ज़्यादा देखने और महसूस करने का अनुभव बनाते हैं; कई पाठक इसे “हर पन्ने पर बुकमार्क लगाने का मन करने वाली किताब” बताते हैं, जो इसकी विज़ुअल अपील और कोटेबल लाइनों को अच्छी तरह पकड़ता है।
थीम: ज़िंदगी, समाज और फ़िल्म
जावेद साहब यहाँ महज़ गीतकार या शायर नहीं, बल्कि एक संक्षिप्त-फॉर्म के दार्शनिक की तरह दिखते हैं। किताब में बार-बार लौटने वाले बिंदु हैं – अमीरी–ग़रीबी का फासला, सत्ता-संरचना, रिश्तों में बराबरी, और यह शिकायत कि फ़िल्मों पर समाज के बुरे असर की चर्चा बहुत होती है, पर समाज के पतन का असर सिनेमाई कंटेंट पर कैसे पड़ रहा है, इस पर कम बात होती है।
ज़बान की सादगी, ख़याल की गहराई:
अशआर और पंक्तियाँ बहुत आसान ज़बान में हैं लेकिन उनके भीतर की कड़वाहट और सच्चाई देर तक चुभती रहती है – जैसे: “ऊँची इमारतों से मकान में घिर गया, / कुछ लोग मेरे हिस्से का सूरज भी खा गए”, जो वर्ग-असमानता और स्पेस–छिन जाने की तकलीफ को दो पंक्तियों में पकड़ लेता है। इसी तरह, “क्यों डरें ज़िंदगी में क्या होगा / कुछ न होगा तो तज़ुर्बा होगा” वाली लाइनें इस किताब के मोटिवेशनल, लगभग life-coach टोन की मिसाल हैं, जिनकी वजह से कई पाठक इसे “philosophy of life” वाली किताब कहते हैं।
राजनीतिक–सामाजिक स्वर और ‘कम्युनिस्ट’ झुकाव:
टेक्स्ट में जगह-जगह पर पूँजीवाद, असमानता, और सत्ता-संरचना पर आलोचनात्मक दृष्टि झलकती है; कुछ पाठक साफ़ तौर पर इसे जावेद साहब के “कम्युनिस्ट साइड” का परिचय मानते हैं। यह राजनीतिक स्वर कभी–कभी सीधे नारेबाज़ी की तरफ़ बढ़ता है, पर अधिकतर जगहों पर यह व्यक्तिगत अनुभव और सूक्ष्म टिप्पणियों के ज़रिये आता है, जिससे वह सूखा प्रोपेगेंडा नहीं, बल्कि नि���ी–सामूहिक चिंता की तरह महसूस होता है।
कमज़ोरियाँ: पुनरावृत्ति और ‘नया’ कितना?
जो पाठक पहले से जावेद अख्तर के इंटरव्यू, टॉक शो और पुराने संग्रह (जैसे तरकश) पढ़ चुके हैं, उन्हें इस किताब में काफी सामग्री “पहले सुनी–पढ़ी” लग सकती है; कुछ रिव्यू इसे साफ़-साफ़ “पुराने काम की री–पैकेजिंग” और बढ़ती लोकप्रियता को भुनाने की कोशिश कहते हैं। किताब बहुत छोटी है, लगभग 45–60 मिनट की रीड; कुछ पाठकों को शेर–ओ–शायरी की मात्रा कम और “विचार / बातें” ज़्यादा लगती हैं, जिससे hardcore poetry lovers के लिए यह थोड़ा पतला अनुभव बन जाता है।
किसके लिए उपयुक्त?
अगर आप जावेद अख्तर को पहली बार पढ़ रहे हैं, तो यह किताब उनकी भाषा, सोच और सामाजिक दृष्टि का बेहतरीन, आसानी से ग्रहण करने योग्य परिचय है – खासकर हिंदी में। पुराने पाठकों के लिए यह “essential new material” से ज़्यादा एक खूबसूरती से डिज़ाइन किया गया सार-संकलन है, जिसे आप shelf पर सजाकर, कभी–कभार खोलकर दो–तीन पन्ने पढ़ेंगे और किसी लाइन पर ठिठकेंगे।
Rating: ⭐⭐⭐✩✩ (3.0/5) — आइडियाज़ और इमेजरी दोनों स्तरों पर खूबसूरत, पर आकार और मौलिकता की सीमाएँ इसे “greatest hits–style” कैलीग्राफी बुक बना देती हैं, न कि एक संपूर्ण नया काव्य-संग्रह।