कुछ पढ़ी हुई किताबें हमेशा साथ लेकर चलता हूं। सोचता हूं कि उन्हें जरूरत पड़ने पर पढूंगा। पर ऐसा बहुत कम हो पाता है। फिर लगता है उनका पढ़ना शायद उतना जरूरी नहीं, पर उनके होने से किसी पुराने आत्मीय संबंध की गर्माहट हर वक्त साथ रहती है। जो कभी कभी बहुत अकेले पड़ने पर जो ठिठुरन होती है, उस किताब को देख लेने भर से दूर हो जाती है।
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बदलता क्या है सखी? मैने लिखा दुख, तुमने भी लिखा दुख। बदला क्या? मेरे आज के लिखे दुख से सालों पहले किसी ने लिखा होगा दुख? बदला क्या? अक्षर वही रहे। अर्थ वही रहा... बदला क्या?
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जिस लेखक से प्रेम में पड़ते हैं उसकी physical closeness पाने की बहुत जोर से इच्छा होती है। तब non fiction की तरफ बढ़ जाते हैं। पत्र, निबंध... इनमें कहानी लिखने वाला कब रोजमर्रा का इंसान बन जाता है और मुझे घेर लेता है - अपने पूरे होने में... ये जादू है। और शब्दों के जरिए। ये पत्र,... निर्मल वर्मा 'लेखक' के साथ निर्मल वर्मा 'मित्र', 'हितैषी', 'अपने रोज के कामों में व्यस्त एक सामान्य आदमी ' और ना जाने जाने कौन कौन से रूप मिले हैं। मैने घेर लिया इन सबसे खुदको। अब लगता है मैं बात कर सकता हूं, क्योंकि मैंने उनका लिखा भी पढ़ा है और उनके लिखे के पीछे जो घट रहा था जब वो लेखक नहीं थे वो भी... क्या ये एक संबंध को और गाढ़ा नहीं कर देता? मेरे मन में उनकी को मूर्ति थी उसे और सजीव कर देता? थोड़ा सा उन्हें और इंसान बना देता है जिसके पास मैं पहुंच सकता हूं... एक ठंडी मूर्ति धीमे धीमे जीवंत होकर एक इंसान की गर्माहट देती है... क्या हम इसलिए ही पत्र नहीं पढ़ते? क्या ऐसे ही मौकों पर किसी ने उनसे अपने लिखे में बात करना शुरू किया होगा? जब आप एक कहानीकार की आवाज को अपने निजी जीवन जीते हुए सुनते हो... तब क्या वो आपका मित्र नहीं बन जाता जिसे घर बैठकर या एक ही कमरे में ले आकर घंटों बातें कर सकते हैं... सुख.
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