यदा यदा हि धर्मस्य ग्लानिर्भवति भारत।
अभ्युत्थानमधर्मस्य तदाऽऽत्मानं सृजाम्यहम्।।4.7।।
ठीक उसी प्रकार, तत्कालीन परिस्थितियों को ध्यान में रखते हुए, और इसे आधुनिक अर्थो में लेते हुए, जब पूरा देश लीग और कांग्रेस की खींचातानी में दर्द से बिलबिला रहा था, और धार्मिक-दंगो की आग में झुलस रहा था, तब भारत-भूमि पर विष्णुजी के ग्यारहवें अवतार के रूप में एक पुरुष, क्षमा कीजियेगा, महापुरुष का आगमन होता है, जिसने ठीक उसी प्रकार जैसे भगवान शिव ने मानव जाति की रक्षा के लिए देवासुर समुद्र-मंथन में निकले विष को स्वयम पी लिया था, उस महापुरुष ने भारत को आज़ादी देने जैसे दुरूह व लगभग असम्भव काम को अपने हाथ मे लिया- उस महापुरुष का नाम था- लॉर्ड माउंटबैटन।
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इस औपन्यासिक इतिहास को पढ़ने के बाद मैं सोच रहा था कि अगर इसकी शुरुआत उपरोक्त शब्दों से हुई होती तो निश्चित ही ये और चटकीला लगता।
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किताब तो है ये इतिहास की लेकिन इसमें केवल पाँच या छः व्यक्तियों पर फोकस किया गया है। लॉर्ड माउंटबैटन को भारत की आज़ादी का हीरो माना गया है, एडविना माउन्टबैटन हीरोइन है, गांधी जी साइड हीरो है, नेहरू और पटेल पात्र-कलाकार है जबकि जिन्ना को विलेन बनाया गया है। किताब लिखने में बड़ा भयंकर शोध किया गया है- मुख्य रूप से तत्कालीन भारतीय रियासतो के राजाओं की अय्याशियों का जबरदस्त वर्णन है, विभाजन के दौरान हुए हैवानियत और दरिन्दगी के नंगे नाच का चित्रात्मक प्रदर्शन है, और गांधी जी की हत्या की पूरी प्लानिंग बताई गई है, इसके अलावा जो सबसे मुख्य बात है वो यह कि पुरी किताब में बस माउन्टबैटन का ही जलवा है।
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माउंटबैटन की नौ-सैन्य उपलब्धियां, उनके मेडल्स व उपाधियां, उनकी वाक-पटुता, उनकी वशीकरण क्षमता,उनकी प्रसाशनिक दक्षता, उनकी दयामयी देवी जैसी पत्नी एडविना, उनके कुत्ते, उनका ब्रिटिश राजघराने से ताल्लुक, उनका राजकीय रहन-सहन और उनके द्वारा दी गयी आलीशान पार्टियां- इन सबका विशद वर्णन है- यदि आप लॉर्ड माउंटबैटन नामक महापुरुष के बारे में जानना चाहते हैं तो यह किताब जरूर पढ़ें।
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एक जगह जिक्र है किताब में कि जब सितम्बर1947 में दिल्ली और पंजाब में दंगे अपनी पराकाष्ठा पर थे, और लॉर्ड माउंटबैटन देश के प्रथम गवर्नर जनरल के रूप मे शिमला में आराम फरमा रहे थे, तभी एक रात वी पी मेनन का फोन आता है और वह लॉर्ड माउंटबैटन से कहते है कि,
"दिल्ली में समस्याएं बढ़ रही है; राजधानी खतरे में है, आपको तुरंत वापस आना चाहिए"
इस पर कुछ देर तो लॉर्ड माउंटबैटन ना-नुकर करते है और कहते हैं कि मैं बाद में आऊंगा, मैंने तो देश उसके कर्णधारों के हाथ मे छोड़ ही दिया है, फिर भी वी पी मेनन आखिरी बार कहते है कि
,"अगर आप 24 घण्टे के भीतर नही आ सकते,तो फिर आने की जहमत उठाने की कोई जरूरत नही, तब तक हम भारत को खो चुके होंगे"
तब लार्ड माउंटबैटन जवाब देते हैं," वी पी, यू आर एन ओल्ड स्वाइन, यू हैव परसुअडेड मी."
और जैसा कि वर्णित है किताब में, उसके बाद माउंटबैटन आते है, तुरंत आपातकालीन समिति का गठन कर के धड़ा-धड़ फैसले लेते है और स्थिति को काबू में लाते है, जब कि ये और बात है कि हजारों लोग तब तक मर चुके होते है, और सिलसिला बदस्तूर जारी रहता है। इस बात को तब जानने वाले केवल पाँच लोग थे- माउंटबैटन, नेहरू, पटेल, मेनन और एम. ओ. मथाई। खुद माउंटबैटन के अनुसार (जैसा कि किताब में लिखा है) कहा था कि यह बात प्रकाशित नही की जाएगी कि फैसले उनके दिमाग से लिये गए, बल्कि दिमाग नेहरू और पटेल का ही दिखाया जाएगा और माउंटबैटन केवल संवैधानिक मुखिया के तौर पर उन फैसलों के क्रियान्वयन हेतु आदेश जारी करेंगे।
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लेकिन उनका एक बीबीसी इंटरविव जो 30 अक्टूबर1975 को Listner पत्रिका में छपा था, उसमे माउंटबैटन ने खुद ही अपनी बड़ाई हाँकी है कि कैसे देश को आज़ादी के बाद उन्होंने कैसे टेक ओवर किया था नेहरू एवम पटेल की मिन्नतों पर। वाह!
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एम ओ मथाई ने अपनी किताब The Reminiscences of The Nehru Age में इस घटना का जिक्र करते हुए लिखा है कि वी पी मेनन ने 4 सितम्बर 1947 को शिमला फोन किया तो था लेकिन नेहरू और पटेल को संज्ञान में न लेते हुए। यह भी लिखा है कि वी पी मेनन नेहरू के शुरुआती विरोधियों में से एक थे। खैर, फोन करने के बाद अलसुबह वह मथाई से मिले और निवेदन किया कि किसी तरह नेहरू को राजी करें। नेहरू और पटेल दोनों वी पी मेनन से इस बात पर सख्त नाराज थे, लेकिन अब चूंकि गवर्नर जनरल शिमला से चल चुके थे तो उनको दिल्ली पहुँचते ही उन्हें असमंजस में डालना उचित नही था। इस प्रकार तीनो के सम्मिलित प्रयास से प्रशाषनिक गतिविधियों में तेजी आई- Freedom at Midnight में इसका अकेला श्रेय लॉर्ड माउंटबैटन को देना कहां तक उचित है?
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मथाई ने अपनी किताब में यह भी जिक्र किया है कि 1969 में और 14 सितम्बर 1976 को माउंटबैटन ने इस बात को स्वीकारा है कि मेनन ने उन्हें दिग्भ्रमित किया था और परिस्थितियों को बढ़ा-चढ़ाकर बयान किया था, इसके अलावा यह भी ध्यान देने योग्य है कि दिल्ली और पंजाब मिलाकर ही भारत नही बन जाता है। लेकिन फिर भी बीबीसी को इंटरविव देते समय हमारे प्रथम गवर्नर जनरल और अंतिम वायसराय आखिर आत्म-मुग्ध हो ही गए और निष्कपटता व सत्यवादिता को ताक पर रखकर आत्म-प्रवंचना के शिकार बन गए।
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माउंटबैटन पदवियाँ, उपाधियां प्राप्त करने के लिए अति महत्वकांक्षी थे, फोटोज़ खिंचवाने का, सुर्खियों में रहने का उन्हें शौक था। इंडिया आने से पहले वह "विस्काउंट" थे, आजादी की शाम उनका रैंक "अर्ल" का हो गया, उसके बाद गवर्नर जनरल बनाये जाने के बाद उन्होंने स्वयं नेहरू की सिफारिश के जरिए ब्रिटेन के महाराजा से "मरकिस" की पदवी पाने की कोशिश की- दुर्भाग्यवश महाराज द्वारा उस सिफारिश पर ध्यान नही दिया गया, नेहरू ने कोशिश थी। माउंटबैटन ने खुद अपने बारे में लगभग कुछ नहीं लिखा है, लेकिन अन्य लेखकों को अपनी महानता लिखने के लिए प्रेरित किया है। खुद इस किताब को लिखने के लिए उन्होंने लेखकद्वै को तीस घण्टे का रिकॉर्डेड इंटरविव दिया था।
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22 मार्च 1947 की माउंटबैटन भारत आये , 15 अगस्त 1947 को भारत एक आजाद मुल्क था, इस अवधि में आजादी देने की प्रक्रिया में जो तेजी से कार्य हुआ, यह एक खास बात है वाइसराय के शाषन-काल की, लेकिन इसका भी पूरा श्रेय माउंटबैटन को नही दिया जा सकता, नेहरू, पटेल एवम अन्य नेताओं (जिन्ना को छोड़कर) की भी भागीदारी थी-लेकिन किताब इस बात का पुरजोर समर्थन करती है जैसे माउंटबैटन ही सबकुछ थे। आजादी देना मजबूरी हो चुकी थी- अंतरार्ष्ट्रीय दबाव, ब्रिटेन में सत्ता परिवर्तन और द्वितीय विश्वयुद्ध के बाद ब्रिटेन की मरणासन्न अर्थव्यवस्था के कारण- विंस्टन चर्चिल तब भी भारत को आजादी देने के विरोध में थे- जब तक यह क्लियर नही हो गया कि भारत कॉमनवेल्थ की सदस्यता में बना रहेगा।
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देश की आजादी के बारे में मेरा जो मानना है, और हो सकता है बहुत सारे लोग मेरी राय से सहमत हो, एवं गीतकार शकील बदायूनी ने चार लाइनों में बहुत अच्छे से व्यक्त किया है-
"हमने सदियों में ये आज़ादी की नेमत पाई है
सैकडों कुरबानियां दे कर ये दौलत पाई है
मुस्कुराकर खाई हैं सीनों पे अपने गोलियां
कितने वीरानों जो गुजरे हैं तो जन्नत पाई है।"
"गोलियां भी खाई है" और "वीरानों से भी गुजरे है"- भीष्म साहनी ने एक पतली सी किताब लिखी है "जलियावाला बाग" जो नेशनल बुक ट्रस्ट से छपी थी, 6 या 7 साल हो गए उसे पढ़े हुए- जिस तरह से उन्होंने जनरल डायर की हैवानियत का चित्रांकन किया है, आज भी मुझे याद है। कितने लोग अंग्रेजो की लाठियों से मर गए, कितनों को गोली मार दी गयी, फांसी पर लटका दिया गया, जेलों में कितनी मौतें हो गयी- इन सब का सही-सही आँकड़ा कही नही है शायद। शशि थरूर ने अपनी पुस्तक "अंधकार काल- भारत मे ब्रिटिश साम्राज्य" के अध्याय-5 में लिखा है कि, "... ब्रिटेन द्वारा क्रूरता पूर्वक लागू की गई आर्थिक नीतियों के कारण 'राज' के दौरान 30 से 35 मिलियन भारतीय भूख से अनावश्यक ही मृत्यु को प्राप्त हुए। अकाल की विभीषिका के दौरान लाखो टन गेहूँ का भारत से निर्यात किया जाता था।" विभाजन के दौरान लगभग 14.5 मिलियन लोग विस्थापित हुए और 1 मिलियन से ज्यादा लोग दंगों में मारे गए- सम्मिलित रूप से देखा जाए तो ऐसी त्रासदी का सामना शायद ही दुनिया के किसी देश को करना पड़ा हो।
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तो इस प्रकार, अगर कोई लेखक,व्यक्ति या समूह आजादी का सेहरा किसी एक आदमी के सर बांधने की कोशिश करता है तो देश की आजादी के लिए अन्य लोगो द्वारा बहाए गए उनके हर एक खून के कतरे के साथ नाइंसाफी करता है। आजादी अनेक लोगो के सम्मिलित प्रयासों का परिणाम है। कुछ लोग जो लाइमलाइट में थे या आजादी तक और उसके बाद भी जिये, आज हम उनको ज्यादा जानते है, मानते है, महान बताते है, पर बहुत से लोग ऐसे है जो आजादी की हसरत दिल मे लिए हुए दुनिया से रुखसत हो गए- उनके योगदान को बनिस्बत कम आंकना बेमानी होगी। चाहे किसी के पसंदीदा माउंटबेटन हो या गांधी, चाहे नेहरू हो या पटेल।
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"Freedom at Midnight" जिस लेखन शैली में लिखी गयी है, वो मुझे अच्छी लगी, ग्रिपिंग है, और लास्ट तक पढ़ने को मजबूर करती है, किताब के कुछ भाग जैसे राजाओं की अय्याशियां और गांधीजी की हत्या की प्लानिंग और उसके बाद के घटनाक्रम इन सब चीजों के वर्णन में अच्छा शोध किया गया है, रोचक वर्णन है,किन्तु जब मैं इसके बारे में समग्र रूप से सोचता हूँ तो लगता है ये पुस्तक साम्राज्यवादी खिड़की से झांकते हुए एवम लार्ड माउंटबैटन को माध्यम बनाकर अंग्रेजो की "जातीय वरीयता" तथा "प्रबुद्ध निरंकुशता" की समर्थक लगती है। जय हिन्द!!