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Pavitra Veshya

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एक सीधा साधा लडका मोहन और वेश्यालय की वेश्या लक्ष्मी। दोनों पहले कभी एकदूसरे से नही मिले थे। मेहन कभी वेश्यालय नही जाता था। लेकिन सिर्फ एकबार लक्ष्मी की एक झलक देखी और पागल हो गया। जिस गली में वेश्यालय था उस गली में उठने वाली सुगंध में मोहन को लक्ष्मी का एहसास होता था। अब उसे लक्ष्मी के सिवा कुछ भी दिखाई न देता था।
ये हिन्दी उपन्यास उन उपन्यासों से एकदम अलग है जो सिर्फ फेंटेसी के लिये लिखे जाते है। मेरा इरादा आपको किसी वेश्यालय का भ्रमण कराना नही बल्कि उनमें अपने आप को बेचने वाली महिलाओं की मनोदशा से परिचित करना है।
इस उपन्यास की नायिका लक्ष्मी और नायक मोहन की कहानी आपको ऐसा महसूस करायेगी मानो वो सब आपके सामने घटा था। पढते वक्त आप उसी फिजा में घूम रहे होंगे जिसमें वो दोनों खडे थे। कोई वेश्या किस तरह से पवित्र हो सकती है ये आपको अपने आप समझ में आ जायेगा। आप जो पढेंगे उसे दिल से महसूस भी करेंगे। ये मेरा वादा भी और दावा भी।

200 pages, Kindle Edition

First published April 14, 2017

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Dharm

19 books3 followers
Dharm.

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1 review
March 31, 2025
Superb
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