It is a wonderful book about relationship between nature, water and excreta disposal. Excreta, which can be easily converted into rich manure, is being disposed off to pollute water in the name of swacch bharat. The book discusses the hazards of modern sewer system and enlist successful alternatives. The topic is vital for the survival of human race.
बहुत ही जरूरी किताब सभी के लिये चाहे वो विद्यार्थी हो समाजसेवी हो या पर्यावरण के लिये काम करने वाला...हमारी बहुत सारी समस्याओं का समाधान समझाती हुई .....
This is a fantastic book. So many various ways this book explained social, political,economical problem related with sanitation . I just love how author connected mythological aspect with this subject. Definitely author has huge story telling ability. This is one of the best book I have ever acquired. Every penny is worth spending for this master piece. Even if someone have kids in their home this is the perfect book to buy. There are lots of things we don't know and which we can't explain our kids, this book has almost all the answers related with the subject. Love the way very talented artist Somesh Kumar illustrated this book. In one sentence A must buy.
This is an insightful book on the messed up water-land-excreta situation, which is no longer contained in the Indian subcontinent. The book carries intriguing tales from evolution to the socio-cultural fabric in India and the invisible threads connecting them to the environmental woes we are facing. Sopan Joshi's beautifully crafted Hindi flows smoothly through the book intertwined with some soul-searching questions, we must ask and try to address as a society which at all cares for well-being of future generations. Highly recommended.
पर्यावरण की समस्या पर एक बेहतरीन पुस्तक। आज के युवा पीढ़ी के पढ़ने के लिए एक बेहद जरूरी पुस्तक। ऐसे पुस्तकों के माध्यम से वो पर्यावरण से जुड़ी समस्याओं के प्रति अपने समझ को दुरुस्त कर सकते हैं। पुस्तक के पन्ने की गुणवत्ता भी अच्छी है। जो चित्र इनमें दिखाएं गए हैं, वो भी पुस्तक के विषय अनुसार अच्छे हैं।
एक पंक्ति में अगर कहना हो तो, इतना कहूंगा - "अज्ञानता के तिमिर में ज्ञानदीप आलोकित करती, एक अतिविशिष्ट किताब।" (तमसो मा ज्योतिर्गमय) बेहद सशक्त लेखन। क्या दो टूक कही है। और कुछ नहीं तो इसे पढ़ने के बाद जल, मिट्टी और प्रकृति के असीम उपकारों के प्रति कृतज्ञता का बोध तो भीतर घर कर ही गया है।
इसे पढ़कर समझ आता है कि शुचिता (sanitation) को लेकर हमारे समाज में समझ कितनी कम है। सभ्य समाजों की "किट्टी" वार्तालापों में शौच या मलत्याग या उससे जुड़ी शुचिता की बातें लोगों को असहज कर देती हैं। ज़रा सोचिए हमारे सुसज्जित शब्द भंडारों में मलत्याग जैसे दैनिक कर्म के लिए कोई ठीक-ठाक और सीधा क्रिया सूचक शब्द तक नहीं है।
किताब में पानी, मिट्टी और शरीर तीनों के संस्कारों पर प्रकाश डाला गया है। पानी और मिट्टी से निकली फसलें इंसान हज़म करके मल बनाता है और यही त्याज्य, मिट्टी के लिये ज़रूरी उर्वरक तत्वों से भरा हुआ नैसर्गिक फ़र्टिलाइज़र है, जिसे हम सीवर या सेप्टिक टैंक के माध्यम से जलस्रोतों में पहुंचा देते हैं। प्रकृति का वृत सभ्यता के दोहरे मापदंड तथा कुलीनों की अनभिज्ञता की भेंट चढ़ जाता है। निर्ममता से ध्वस्त कर दिया जाता है। नतीजा - जलस्रोतों का अंधाधुंध प्रदूषण। जल मुहैया कराने के लिए सरकारें एड़ी चोटी का जोर लगा देती हैं किंतु जलस्रोतों की सुरक्षा और मैले जल की सफाई पर गंभीरता से रुचि शायद कभी ली ही नहीं जाती।
लेखक ने मैला उठाने वाली जातियों की पीड़ा पर भी स्पष्ट और तथ्यात्मक विचार रखे हैं। कुछ विशेष जातियों के प्रति समाज में व्याप्त घृणा का उद्गम क्या है? ऐसे जानलेवा काम करने वाले लोगों की हमारे समाज में ऐसी दुर्दशा कैसे है? अपनी सहूलियत और व्यापार के विस्तार हेतु कैसे अंग्रेज़ी हुकूमत ने वर्णों को जातियों में गुत्थमगुत्था कर दिया, जो आज हमारे समाज का बड़ा श्राप बना हुआ है। प्रौद्योगिकीकरण, लालच और अंधाधुंध सुविधाओं के चक्कर में हमने अपने जलस्रोतों का जो ह्रास किया है वह अकल्पनीय है। बड़ी विडंबना है जो मानवजाति, ज्ञात ब्रह्मांड की सबसे बुद्धिशाली प्रजाति है, वही शायद सबसे मूर्ख भी है। सब जानते, समझते भी जो अनजान बना रहे उसका भला तो भगवान भी नहीं कर सकते। हमारी नदियां जिनके जल के प्रति हमें मां के दूध की तरह कृतज्ञ रहने की सीख दी जाती है, आज उनका जो लचर हाल है इसका वर्णन करना तो व्यर्थ ही है। उनके बाजू से गुज़रते हुऐ, नाक में आती सड़ांध ही उनकी स्थिति बयां करने में सक्षम है। हमारे भूमिगत जलस्रोतों का हाल भी कोई अच्छा नहीं है। सेप्टिक टैंक से रिसाव के कारण जल में जो गंदगी मिश्रित होती है उसके परिणाम कितने भयावह हैं, उसका एक छोटा सा उदाहरण 'हैजा' है। इन सबसे ज्यादा विस्मित करने वाली बात तो यह है कि हमारे पूर्वज हमसे कहीं अच्छी तरह से मैले पानी का निस्तारण करना जानते थे। अनुसंधानों के ऊपर करोड़ों खर्च किए बिना, सिर्फ़ प्रकृति के प्रतिमानों को समझकर, कोलकाता की पूर्ण प्राकृतिक भेरियों और लद्दाख के 'छगरा' जैसी आधारभूत संरचनाएं उन्होंने बना डालीं। विस्मय की बात पूर्वजों का व्यवहारिक ज्ञान नहीं बल्कि हमारी टेक्नोलॉजी से लैस समाज का स्वच्छता के प्रति दिमागी दीवालियापन है।