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पांगिरा

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' पांगिरा ' में रोशनी और अँधेर की वही धड़कनें हैं, उसकी मिट्टी और मौसम के वही रंग और मिजाज हैं, वही राग और विराग हैं, आपाधापी और जद्दोजहद हैं, धूल फूल पत्तों की सरसराहट भी वैसी ही है-जो आज के किसी भी भारतीय गाँव में सहज उजागर 'पांगिरा'-महाराष्ट्र का एक आधुनिक भारतीय गाँव-इस उपन्यास का केन्द्रीय कथानायक है। दरअसल, पांगिरा एक ऐसा विराट कैनवास है जिस पर तमाम चलती हुई गतियों में फँसे लोगों की बहरूपी तसवीरें हैं, जो अपन-अपने तरीके से इस उपन्यास का ख़ुश और उदास अर्थ देत हैं-पूरी आत्मीयता और सजगता के साथ। -और शायद इसीलिए 'पांगिरा' उपन्यास को एक सशक्त सामाजिक दस्तावेज़ कहना गलत नहीं होगा। क्योंकि मराठी भाषा के प्रख्यात उपन्यासकार श्री विश्वास पाटिल ने इस प्रतीकात्मक सामाजिक दस्तावेज के जरिए जीवन की सार्थक परिभाषा को तलाश करना चाहा है। मूल मराठी से अनूदित इस बहुचर्चित उपन्यास की अपनी अनुवादगत सीमाएँ हैं, लेकिन गाँव का यह महाकाव्य हिन्दी के उपन्यास-प्रमी पाठकों को रोचक, रोमांचक और सखद अनुभव देगा।।

Hardcover

Published June 25, 1905

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About the author

Vishwas Patil

37 books425 followers
An Eminent Author in Marathi

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Profile Image for Suyash W.
46 reviews3 followers
August 22, 2018
खेड्यापाड्यातील वैर व राजकारण
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