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नाच्यौ बहुत गोपाल
This ebook is from Rajpal and Sons, a 103 year-old publishing house headquartered in Delhi. Rajpal and Sons publishes books in English and Hindi languages, in non-fiction, fiction, classic and contemporary literature, and children categories.
- GenresNovels
328 pages, Kindle Edition
First published January 1, 2013
About the author
Amritlal Nagar
48 books41 followersHe started off as an author and journalist, but moved on to be an active writer in the Indian film industry for 7 years. He worked as a drama producer in All India Radio between December 1953 and May 1956. At this point he realised that a regular job would always be a hindrance to his literary life, so he devoted himself to freelance writing.
Often cited as the true literary heir of Premchand, Amritlal Nagar created his own independent and unique identity as a littérateur and is counted as one of the most important and multi-faceted creative writers of Indian literature.
Often cited as the true literary heir of Premchand, Amritlal Nagar created his own independent and unique identity as a littérateur and is counted as one of the most important and multi-faceted creative writers of Indian literature.
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Community Reviews
Displaying 1 - 4 of 4 reviews
October 6, 2018
One of the great books of all time. It is a pity that like many others, this one will not get the audience it deserves because it does not seem to have been translated into English, or any other language, from the original Hindi. I did come across this academic article that discusses some aspects of translating the book, but I don't see any translations available.
Written in 1978, and providing some commentary on the "emergency" period of modern India, the main narrative of the book is set in the 1930s. The protagonist is a foul-mouthed saintly woman whose circumstances led her to marry into the caste of mahtars, people who carry human excrement away from city homes. The woman, Nirguniya, is an truly outstanding fictional character.
Amritlal Nagar obviously spent much time researching his subject, and he has created a masterpiece that speaks for the the underdogs in a cruel society. What makes this a classic is Nagar's voice - never dramatising, while cataloging evil and cruelty with the eye of an observer with a conscience.
Written in 1978, and providing some commentary on the "emergency" period of modern India, the main narrative of the book is set in the 1930s. The protagonist is a foul-mouthed saintly woman whose circumstances led her to marry into the caste of mahtars, people who carry human excrement away from city homes. The woman, Nirguniya, is an truly outstanding fictional character.
Amritlal Nagar obviously spent much time researching his subject, and he has created a masterpiece that speaks for the the underdogs in a cruel society. What makes this a classic is Nagar's voice - never dramatising, while cataloging evil and cruelty with the eye of an observer with a conscience.
May 20, 2020
कल यह उपन्यास समाप्त करने के बाद ऐसा लगा जैसे कुछ लोगों से एक सम्बंध समाप्त हो गया, इतने सजीव थे इस उपन्यास के चरित्र।
कुछ प्रश्न मन में जागे जो इस प्रकार हैं।
1. क्या व्यक्ति की जात जन्म से निर्धारित की जानी चाहिए, कर्मों से अथवा आचार विचार से?
2. क्या हम किसी बिरादरी को पूर्वाग्रह से ग्रस्त विचारों से तौल सकते हैं?
3. क्या हम कभी वर्ण व्यवस्था को हटा कर सभी को सम्मानित जीवन के लिए प्रेरित कर सकते हैं?
4. निर्गुनिया (उपन्यास की नायिका) ने तो स्वयं ही हरिजन का जीवन स्वीकार किया था पर ऐसे लोग जिन पर यह जीवन शुरु से थोपा हुआ होता है क्या वे अपने और अपने परिवार के लिए एक बेहतर जीवन की तरफ बढ़ पाते हैं?
कुछ प्रश्न मन में जागे जो इस प्रकार हैं।
1. क्या व्यक्ति की जात जन्म से निर्धारित की जानी चाहिए, कर्मों से अथवा आचार विचार से?
2. क्या हम किसी बिरादरी को पूर्वाग्रह से ग्रस्त विचारों से तौल सकते हैं?
3. क्या हम कभी वर्ण व्यवस्था को हटा कर सभी को सम्मानित जीवन के लिए प्रेरित कर सकते हैं?
4. निर्गुनिया (उपन्यास की नायिका) ने तो स्वयं ही हरिजन का जीवन स्वीकार किया था पर ऐसे लोग जिन पर यह जीवन शुरु से थोपा हुआ होता है क्या वे अपने और अपने परिवार के लिए एक बेहतर जीवन की तरफ बढ़ पाते हैं?
August 19, 2020
Yet to find a better book on Caste. Have been reading for past 30 years.
June 30, 2019
एक विद्वान सज्जन पंडित घर की छोटी बच्ची अपने बाल्यकाल में ही ऐसे माहौल में फँस जाती है जहाँ वो संभ्रांत महिला-पुरुषों को हर उचित-अनुचित तरीके से देह की भूख मिटाते हुए देखती है। बालमन में जगी उत्कण्ठा और परिस्थितियां उसे भी एक कामातुर युवती में परिवर्तित कर देती है .... और फिर इसी भूख से आतुर होकर अपने वृद्ध धनाढ्य पति को छोड़कर एक मेहतर के साथ भाग जाती है।
कहानी बायोग्राफी शैली में लिखी गई है --- लेखक इस पात्र से तब मिलता है जब वे अपने उम्र के आठवें दसक में होती हैं। वे लेखक को अपनी डायरी देती है जिसमे अपने जीवन की घटनाओं को टूटे-फूटे क्रम में वे लिखी होती हैं। डायरी में वर्णित कड़ियों को जोड़कर और पात्र से साक्षात्कार कर कहानी को मुकम्मल किया जाता है।
लेखक एक जगह कहानी की मुख्य पात्र निर्गुनियांजी को संबोधित कर कहते हैं,
"मैंने भी अपनी ज़िन्दगी में तरह-तरह के पापड़ बेले हैं, फिर भी यह मानता हूँ कि आपकी जीवनकथा ने मुझे हिमालय के गौरीशंकर शिखर से लेकर समुद्रतल की धरती तक के दर्शन करा दिए। अद्भुत लगता है मुझे आपके मुख से संस्कृत के श्लोक, सूर, तुलसी, नानक आदि संतों की पंक्तियां और उसके साथ-ही-साथ बेखटक, बेझिझक मुँह से निकलने वाली अश्लील गलियां ..."
लेखक की ये पंक्तियां इस पात्र को पूर्णरूप से चित्रित करने में समर्थ है --- ब्राह्मणी से मेहतर बनने की प्रक्रिया, उनके जीवनशैली और खान-पान को आत्मसात करना, एक कामातुर युवती का अपने मन पर नियंत्रण कर एक पतिव्रता सा जीवन जीने की जद्दोजहद और फिर जिस समाज में जुड़ गईं उसके उत्थान के लिए संघर्ष।
उपन्यास का शीर्षक सूरदास की पंक्तियों से लिया गया है जिसे मुख्य पात्र और एकाध अन्य पात्र भी कई बार परिस्थितियों से परेशान होकर दुहराते हैं
"अब मैं नाच्यौ बहुत गुपाल।
काम-क्रोध कौ पहिरि चोलना, कंठ बिषय की माल"
(हे गोपाल! अब मैं बहुत नाच चुका। काम और क्रोध का जामा पहनकर, चिन्तन की माला गले में डालकर)
कहानी का समयकाल बीसवीं सदी के तीसरे-चौथे दसक का है जब गाँधी जी के नेतृत्व में आंदोलन चल रहा है और कहानी लिखने का समयकाल स्वतंत्र भारत में लगे इमरजेंसी के समय का है। अतः इन दोनों समयकालों के सामाजिक और राजनितिक परिस्थितियों का भी चित्रण है। लेखक ने मेहतर समाज पर गहन अध्ययन किया है, अतः मेहतर समाज के इर्द-गिर्द बुनी इस उपन्यास द्वारा पाठक उनके सामाजिक, धार्मिक और इतिहासिक तथ्यों से भी रु-ब-रु होते हैं।
उपन्यास के समापन की ओर बढ़ते हुए लेखक इस पात्र से पूछते हैं, "आप श्रेष्ठतम वर्ण से वर्ण-जाति-विहीन समाज तक के जीवन को देख चुकी हैं। बताइये, कौन वर्ण श्रेष्ठ है?"
इस प्रश्न के जवाब में वे कहती हैं,
"आज़ादी-सुतंत्रता का वरण ही उत्तम है। मैंने तो नसीब की मार से मेहतरानी बनके ये सीखा बाबूजी कि दुनिया में दो पुराने-से-पुराने गुलाम हैं -- एक भंगी और दूसरी औरत। जब तक ये गुलाम हैं आपकी आज़ादी रुपये में पूरे सौ के सौ नये पैसे भर झूठी है।"
कहानी बायोग्राफी शैली में लिखी गई है --- लेखक इस पात्र से तब मिलता है जब वे अपने उम्र के आठवें दसक में होती हैं। वे लेखक को अपनी डायरी देती है जिसमे अपने जीवन की घटनाओं को टूटे-फूटे क्रम में वे लिखी होती हैं। डायरी में वर्णित कड़ियों को जोड़कर और पात्र से साक्षात्कार कर कहानी को मुकम्मल किया जाता है।
लेखक एक जगह कहानी की मुख्य पात्र निर्गुनियांजी को संबोधित कर कहते हैं,
"मैंने भी अपनी ज़िन्दगी में तरह-तरह के पापड़ बेले हैं, फिर भी यह मानता हूँ कि आपकी जीवनकथा ने मुझे हिमालय के गौरीशंकर शिखर से लेकर समुद्रतल की धरती तक के दर्शन करा दिए। अद्भुत लगता है मुझे आपके मुख से संस्कृत के श्लोक, सूर, तुलसी, नानक आदि संतों की पंक्तियां और उसके साथ-ही-साथ बेखटक, बेझिझक मुँह से निकलने वाली अश्लील गलियां ..."
लेखक की ये पंक्तियां इस पात्र को पूर्णरूप से चित्रित करने में समर्थ है --- ब्राह्मणी से मेहतर बनने की प्रक्रिया, उनके जीवनशैली और खान-पान को आत्मसात करना, एक कामातुर युवती का अपने मन पर नियंत्रण कर एक पतिव्रता सा जीवन जीने की जद्दोजहद और फिर जिस समाज में जुड़ गईं उसके उत्थान के लिए संघर्ष।
उपन्यास का शीर्षक सूरदास की पंक्तियों से लिया गया है जिसे मुख्य पात्र और एकाध अन्य पात्र भी कई बार परिस्थितियों से परेशान होकर दुहराते हैं
"अब मैं नाच्यौ बहुत गुपाल।
काम-क्रोध कौ पहिरि चोलना, कंठ बिषय की माल"
(हे गोपाल! अब मैं बहुत नाच चुका। काम और क्रोध का जामा पहनकर, चिन्तन की माला गले में डालकर)
कहानी का समयकाल बीसवीं सदी के तीसरे-चौथे दसक का है जब गाँधी जी के नेतृत्व में आंदोलन चल रहा है और कहानी लिखने का समयकाल स्वतंत्र भारत में लगे इमरजेंसी के समय का है। अतः इन दोनों समयकालों के सामाजिक और राजनितिक परिस्थितियों का भी चित्रण है। लेखक ने मेहतर समाज पर गहन अध्ययन किया है, अतः मेहतर समाज के इर्द-गिर्द बुनी इस उपन्यास द्वारा पाठक उनके सामाजिक, धार्मिक और इतिहासिक तथ्यों से भी रु-ब-रु होते हैं।
उपन्यास के समापन की ओर बढ़ते हुए लेखक इस पात्र से पूछते हैं, "आप श्रेष्ठतम वर्ण से वर्ण-जाति-विहीन समाज तक के जीवन को देख चुकी हैं। बताइये, कौन वर्ण श्रेष्ठ है?"
इस प्रश्न के जवाब में वे कहती हैं,
"आज़ादी-सुतंत्रता का वरण ही उत्तम है। मैंने तो नसीब की मार से मेहतरानी बनके ये सीखा बाबूजी कि दुनिया में दो पुराने-से-पुराने गुलाम हैं -- एक भंगी और दूसरी औरत। जब तक ये गुलाम हैं आपकी आज़ादी रुपये में पूरे सौ के सौ नये पैसे भर झूठी है।"
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