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उपन्यास "नीम का पेड़" राही मासूम रज़ा द्वारा लिखित इसी नाम के धारावाहिक का रूपांतरण है। यह रूपांतरण प्रभात रंजन ने किया है।
कथावाचक एक नीम का पेड़ है, जो स्वतंत्रता से पूर्व एवं उसके पश्चात् सत्ता तथा शक्ति के खेल एवं खिलाड़ियों का वर्णन करता है। कहानी राजनीति के संसार की एक झलक दिखाती है, जिसका मायाजाल कुछ ऐसा है कि यह मनुष्य को आदर्श, मूल्य, नैतिकता, सब कुछ भुला कर ताक़त की लालसा के मद में अंधा कर देता है।
कहानी अत्यंत सरल एवं भाषा बोधगम्य है। फ़ारसी से आये शब्दों का प्रचुर मात्रा में उपयोग किया गया है। आरम्भ में कहानी कुछ सुस्त और अनाकर्षक-सी लगती है, परन्तु धीरे-धीरे यह गति पकड़ती है। एक बार गति पकड़ने के बावजूद भी कहानी बहुत अधिक सरस नहीं हो पाती। जहाँ होती भी है, वहाँ रह नहीं पाती। राजनेताओं की मानसिकता का सुंदर चित्रण मिलता है। नाम बदलने वाली तदबीर से योगी जी याद हो आते हैं। बहुत संभव है योगी जी का प्रेरणास्रोत जीवन रहे हों। चरित्रों की भाषा और संवाद बहुत सुंदर और मनभावन लगते हैं। परंतु कई चरित्र कहानी पर बिना कुछ प्रभाव डाले लुप्त हो जाते हैं; या यूँ कहें कि उनकी कहानी अधूरी छोड़ दी गयी है। यह एक बहुत बड़ा नकारात्मक पहलू है। शहनाज़ बेगम की कहानी को तो काफ़ी दिलचस्प बना कर भी अंत से वंचित रखा गया, जैसे लेखक भूल गए हों कि यह क़िस्सा शुरू भी हुआ था। ज़ामिन मियाँ जैसा मुख्य पात्र भी कहानी के दूसरे हिस्से में चमक खो देता है।
वर्तनी और विराम-चिह्नों की अशुद्धियाँ बहुत खटकती हैं। या तो आप देवनागरी में छापते समय "ख़", "क़", "ग़", "ज़" का उपयोग ही न करें, और यदि कर ही रहे हैं तो तनिक ध्यानपूर्वक करें। अनगिनत स्थानों पर "ज" को "ज़" और "ज़" को "ज" छापा गया है। यह पाठन के अनुभव पर नकारात्मक प्रभाव डालता है। 19 साल का सुखीराम 1965 में एम०एल०ए० का चुनाव कैसे लड़ लिया, यह समझ नहीं आया। कहानी में वर्णित अली नक़ी ख़ाँ दर्द कौन थे, यह भी अस्पष्ट है।
नीम का पेड़ दरअसल जीवन में शांति और सुकून को दर्शाता है। बुधई ने नीम का पेड़ उसकी सुखदाई छाँव का आनंद लेने के लिए लगाया, किन्तु लोगों की राजनैतिक महत्वाकांक्षाओं ने कभी उसको यह सुख प्राप्त नहीं होने दिया। यही महत्वाकांक्षाएँ जीवन की शांति छीनकर उसमें विष घोल देती हैं। इसीलिये बुधई कहता है,"पेड़ बचाओ। नीम का पेड़ बचाओ। ख़ून दे के बचे तो बचाओ।"।