समाज और प्रकृति को एक ही कैनवास पे इतनी खूबसूरती और वास्तविकता के साथ पिरोते है कि रचना मन में रूप लेने लगती है।
तुम्हारे साथ रहकर, भूख, कितना अच्छा होता है, पिछड़ा आदमी, पोस्टमार्टम की रिपोर्ट, रिश्ते, रिश्ता, अपनी बिटिया के लिए दो कविताएँ, पाँच नगर-प्रतीक, इस मृत नगर में, गोबरैले, भेड़िया-3, तुम्हारा मौन, तुमसे, बाँसगाँव, गरीबा का गीत, जूता भाग 1-4, रंग तरबूजे का, हजूरी, मैं नहीं चाहता और 'अन्त में' पहले पाठन में अत्यंत पसंद आयी।
तीन रचनायें कुआनो नदी शिर्षक पे दशकों की कहानियाँ सुनाती है जिसमें गाँव, गरीबी, भूख, मृत्यु, समाज और जनतंत्र का जर्जर ढ़ाचा और ज़िन्दगी के निरंतर चलते रहने की छोटी छोटी कड़ियाँ है। सर्वेश्वरदयाल सक्सेना जी की ये प्रतिनिधि कविताएँ जितनी बार पढ़े आपको एक नया दर्शन ही देगी।