'बाघ' एक विविध और बहुत सुन्दर काव्य रचना है| केदारनाथ सिंह जी की पैनी नज़र, भाषा पर बेजोड़ पकड़, और देखने समझने के अद्भुत संतुलन का प्रमाण है 'बाघ'| विशिष्ट रचना|
कवि 'बाघ' को देखता है प्रेम की तरह, भूख की तरह, बोध की तरह, अकेलेपन की तरह, बेजोड़ प्रगति की तरह, बरबाद होते सब कुछ की तरह, नए बने हर कुछ की तरह, और भी बहुत कुछ की तरह|
केदारनाथ सिंह जी ना सिर्फ प्रभावित करते हैं बल्कि जगाते हैं, पूछते हैं, बोध कराते हैं|
”पहाड़ का मस्तक फाड़कर लाया जा सकता है नदी को समूचा उठाकर ठीक अपने जबड़ों की प्यास के करीब‘
कुछ और पंक्तियाँ|
”कि यह जो प्यार है यह जो हम करते हैं एक–दूसरे से या फिर नहीं करते यह भी एक बाघ है”
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इस विशाल देश के धुर उत्तर में एक छोटा-सा खँडहर है किसी प्राचीन नगर का जहाँ उसके वैभव के दिनों में कभी-कभी आते थे बुद्ध कभी-कभी आ जाता था बाघ भी
दोनों अलग-अलग आते थे अगर बुद्ध आते थे पूरब से तो बाघ क्या कभी वह पश्चिम से आ जाता था कभी किसी ऐसी गुमनाम दिशा से जिसका किसी को आभास तक नहीं होता था
पर कभी-कभी दोनों का हो जाता था सामना फिर बाघ आँख उठा देखता था बुद्ध को और बुद्ध सिर झुका बढ़ जाते थे आगे