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सच में हैं भगवान पिता

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172 pages, Paperback

Published December 1, 2017

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Aalok sethi

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February 20, 2020
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This entire review has been hidden because of spoilers.
Profile Image for Ved Prakash.
189 reviews28 followers
November 17, 2017
ड्राइविंग काफी महीनों के लिए छोड़ देने के बाद आप सड़क पर उस दक्षता से ड्राइव नहीं कर सकते जिस दक्षता से वो कर लेता है जो बिच बिच में स्टीयरिंग पकड़ते रहता है।

तो ये पुस्तक वही स्टीयरिंग है जो आपको उन बातों को भूलने नहीं देगी जिसे आप जानते तो हैं लेकिन ज़िन्दगी की आपाधापी में दरकिनार कर देते हैं।

इस पुस्तक में आपको नया कुछ नहीं मिलेगा। बहुत सी रचनायें आपने सोशल मीडिया या इधर-उधर देखि भी होंगी। लेखक को जहाँ भी मोती मिला वहाँ से कलेक्ट कर और कुछ अपने घर का मोती मिलाकर एक माला बनाया और हमसब के सामने रख दिया।

इसमें वस्तुतः पिता की महता और पारिवारिक मूल्यों के बारे में बताया गया है।

अब जब अपने आतिथ्य और पारिवारिक संस्कारों के लिए प्रसिद्ध देश में भी मूल्यों का क्षय हो रहा है तो उस परिस्थिति में इस पुस्तक की वैल्यू उसी "स्टीयरिंग" की तरह है जिसे बिच बिच में छुते रहने से आप ज़िन्दगी और परिवार के ट्रैफिक में स्मूथ राइड का आनंद ले पाएंगे।

इसे एक बार पढ़ कर रख न दें, बिच-बिच में इस "स्टीयरिंग" को पकड़ते रहें।

रही बात रेटिंग की तो कुछ पुस्तकें नंबरों से परे की चीज़ होती है।
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