साल का अंत आते आते मेरे अंदर का यायावर भी जाग उठा और मैंने एक छोटी किंतु रोचक यात्रा तय की। इस साल कोरोना महामारी की वजह से जो चीज़ सबसे ज्यादा खली वो थी यात्रा ना कर पाने की बाध्यता। इसी यात्रा के दौरान मैंने दो यात्रा वृतांत पढ़े,अज्ञेय जी का वृतांत बड़ा असरदार लगा और सोचा इस पर अपने विचार साझा करूं। आज के तकनीक और संसाधनों से लबरेज़ युग में यात्रा करना काफ़ी सुगम है। रास्ता भटके तो जीपीएस तकनीक से ढूंढ लिया, ये तक पता चल गया कि कितनी दूरी पर कोई होटल, ढाबा आदि है या अमुक जगह से अमुक जगह तक पहुंचने में ट्रैफिक की मौजूदा स्थितिनुसार कितना समय लगेगा। पर इस पुस्तक में लेखक ने अपने सारे यात्रा वृतांत ऐसे काल में पूर्ण किये जब ये सभी सहूलियतें स्वप्न मात्र रहीं होंगी। आज हम कहीं पहुंचने से पहले वहां के मौसम, ख़ान पान आदि की जानकारी प्राप्त कर लेते हैं पर तब ये नामुमकिन था। जहां जो उपलब्ध हुआ वही खाकर आगे बढ़े, जो मिला सहर्ष, बिना किसी ना नुकुर ग्रहण किया। आज एयरबीएनबी के माध्यम से हम यात्रा शुरु होने से पहले कमरा बुक कर सकते हैं लेकिन लेखक महोदय की यात्राएं इतनी आयोजित ना थीं, कभी किसी ड़ाक बंगले में रुक गये तो कभी किसी गांव में घर के बाहर ही बिस्तरा डाल कर आराम किया। और यात्रा में इस्तेमाल होने वाली गाड़ियों का तो जनाब पूछिये ही मत। कभी आर्मी का खटारा ट्रक, कहीं हाथी की सवारी तो कहीं खच्चर की, कहीं किसी डोंगी की सैर और कुछ ना मिला तो ईश्वर प्रदत्त टांगों का ही सुचारू रूप से उपयोग। आजकल समाज में सोलो (अकेले) यात्रा करने का भी एक चलन है, इसके बाद अमुक यात्री गर्व और अहंकार की मिश्रित प्रतिक्रिया सोशल मीडिया पर दर्ज़ करता है। लेखक महोदय ने ऐसी बहुत सी एकांकी यात्राएं आज़ादी पूर्व और उसके पश्चात भी पूरी की। आगे बात करते हैं किताब में दर्ज़ यात्राओं की।
किताब में कुल मिलाकर आठ यात्राओं का वर्णन है, सभी एक दूसरे से भिन्न और अपने आप में अनूठी। पहली यात्रा असम में ब्रह्मपुत्र नदी के किनारे से शुरु होती है, यायावर फ़ौजी है और मिलिट्री ट्रक में सवारी कर रहा है। फ़ौजी ट्रक में सवार होकर असम से आज़ादी पूर्व पंजाब, लाहौर, पेशावर, नौशेरा, खैबर पास आदि की रोमांचक यात्रा का लेखा जोखा है। आज़ादी के बाद इस यात्रा में तय किया हुआ एक हिस्सा पाकिस्तान बन गया और लेखक फ़िर कभी उधर नहीं जा पाये ।
दूसरी यात्रा में यायावर भौतिक शास्त्र का एक विद्यार्थी है और कॉस्मिक किरणों पर अपने शोध हेतु कश्मीर के दुर्गम झीलों तक का सफ़र तय करता है। कश्मीर की नैसर्गिक सुंदरता, गुजरों (पहाड़ों पर रहने वाले) की जीवन शैली आदि का विस्तृत वर्णन है। इस यात्रा में हमें भौतिक शास्त्र के कई सिद्धांतों की भी जानकारी होती है। इस यात्रा में लेखक अपने गुरु और जोशी बंधु के साथ होते हैं। दुर्गम इलाकों और कठोरतम परिस्थितियों में भी हास्य का पुट विद्यमान है जो कि पाठक के तौर पर मुझे अच्छा लगा।
तीसरी और चौथे प्रसंग में लेखक महोदय ने पर्वत प्रदेश हिमाचल के कुल्लू, मनाली, दाना, रोहतांग आदि स्थान नाप डाले। लेखक पहाड़ों पर शांति की तलाश में जाते हैं और उनका मुख्य उद्देश्य लेखन कर्म होता है। यहां आकर उन्हें अलग तरह की अनुभूति होती है। मौत की घाटी में लेखक ने एक अति दुर्लभ यात्रा का भी वर्णन किया है जहां वो बाल बाल बचे थे। पहाड़ों पर रहने वाले मासूम गांव वालों की ज़िंदगी के बहुत से तथ्य हमारे सामने आते हैं। लेखक समतल भूमि पर रहने वाले तथाकथित सभ्य मानव को कोसते भी हैं कि हमने इन पहाड़ियों को कलुषित करने में कोई कसर नहीं छोड़ी है। सैलानियों को अपनी ज़िम्मेदारियों का बोध होना नितांत आवश्यक है।
पांचवीं यात्रा महाराष्ट्र में औरंगाबाद के निकट खुल्दाबाद और एलोरा की गुफाओं का सौंदर्य चित्रण है। गुफाओं में मूर्तियों का शिल्प लेखक को खूब आकर्षित करता है। छठी यात्रा में लेखक ने माझुली द्वीप का ज़िक्र किया है, असम स्थित यह द्वीप भौगोलिक परिस्थितियों के कारण अपने आप में अनूठा है। लेखक द्वीप पर रहने वालों से अपनी मुलाक़ात, द्वीप वासियों की दिनचर्या, रहन सहन, ख़ान पान, शिल्प कला आदि की ढेर सारी जानकारी पाठक के सामने रखते हैं। प्रतिकूल परिस्थतियों में भी माझूली द्वीप के बासिंदों के संघर्ष को लेखक ने नमन किया है।
सातवीं कहानी फ़िर से ब्रह्मापुत्र नदी के उफ़ान की गाथा है और आखिरी कहानी में लेखक महोदय दक्षिण के मंदिरों और वहीं की यात्रा का विवरण देते हैं। लेखक का यह भी मानना है कि दक्षिण में लोगों ने अपनी संस्कृति, धर्म, परंपरा आदि का संरक्षण बेहतर तरीक़े से किया है और उत्तर भारत में रहने वालों के लिए यह अनुसरणीय होना चाहिए।
सभी कहानियों में पाठक के तौर पर आपको ऐसा प्रतीत होगा कि आप एक सहयात्री हैं और आप स्वयं इन स्थलों से होकर गुजरे हैं। लेखक ने सैलानियों को आगाह किया है कि जब आप किसी जगह जाते हैं तो वहां की स्थानीय परंपराओं और रिवाजों का सम्मान करें और किसी तरह की गंदगी ना फैलायें, सजग, चिंतनशील और जागरूक बनें। लेखक के प्रसंगों में समाज, इतिहास, प्रकृति, दर्शन, धर्म आदि सब विषयों पर पर्याप्त और अच्छी जानकारी है। लेखक को अपने समय का विद्वान कहना कोई अतिशयोक्ति नहीं होगी।
लेखक की भाषा शैली संस्कृतनिष्ठ है, मुझ जैसे सीमित भाषा ज्ञान वाले औसत पाठक को कई बार शब्दकोश का सहारा लेना पड़ा। पर इसी क्रम में मैंने बहुत से नए शब्द भी सीखे। लेखक ने वृत्तांत में संस्कृत की सूक्तियां और हिंदी की कविताएं भी रची हैं , एक आपके सामने प्रस्तुत है :-
आज भी मेमने आ कर मेरी पुस्तकों को उलटा जाएँगे,
और नीलकंठ किंशुक के ठूँठ पर ऊँघेगा और
सेमल की बुढ़िएँ हवा पर तैरती चली जाएँगी।
आज भी धुँधला आर्द्र प्रकाश बिछल जाएगा
नील स्फटिक खंडों पर चिकनी लचकीली ग्रीवाओं और
तरंगायित नितम्ब-लहरियों के,
ओज भी वस्त्र-खंडों में से कुच-मुकुलों का निर्व्याज सौन्दर्य झाँक जाएगा निरायास स्वच्छन्दता की ही ओट ले कर! आज भी फूस के छप्परों को छितरा जाएगी ढोलकों की गमक,.......
कुल मिलाकर विभिन्न जगहों के साथ ही मुझे और भी ढेर सारी जानकारी प्राप्त हुई और किसी भी घुमक्कड़ प्रवृति वाले मित्र के लिए यह "भटक शास्त्र" पढ़ी जाने वाली किताब है। अंत, मैं लेखक की कुछ पंक्तियों से ही करना चाहूंगा :-
कहते हैं कि मैंने अपने जीवन का कुछ नहीं बनाया, मगर मैं बहुत प्रसन्न हूँ, और किसी से ईर्ष्या नहीं करता। आप भी अगर इतने ख़ुश हों तो ठीक—तो शायद आप पहले से मेरा नुस्खा जानते हैं—नहीं तो मेरी आपको सलाह है, “जनाब, अपना बोरिया-बिस्तर समेटिए और ज़रा चलते-फिरते नज़र आइए।” यह आपका अपमान नहीं है, एक जीवन दर्शन का निचोड़ है। ‘रमता राम’ इसी लिए कहते हैं कि जो रमता नहीं, वह राम नहीं। टिकना तो मौत है।
टिकना तो मौत है, घूमते रहीये
#kitaabgoi