यह लेख भगत सिंह ने जेल में रहते हुए लिखा था और 27 सितम्बर 1931 को लाहौर के अखबार “द पीपल“ में प्रकाशित हुआ। इस लेख में भगतसिंह ने ईश्वर कि उपस्थिति पर अनेक तर्कपूर्ण सवाल खड़े किये हैं और इस संसार के निर्माण, मनुष्य के जन्म, मनुष्य के मन में ईश्वर की कल्पना के साथ साथ संसार में मनुष्य की दीनता, उसके शोषण, दुनिया में व्याप्त अराजकता और और वर्गभेद की स्थितियों का भी विश्लेषण किया है । यह लेख भगत सिंह के सबसे चर्चित हिस्सों में रहा है।
"मैं नास्तिक क्यों हूँ? और अन्य लेख", इसे पढ़ते हुए लगा जैसे शब्द नहीं, अग्निशिखाएं हों जो केवल पन्नों को नहीं, भीतर कहीं बहुत गहरे तक जला देती हैं। ये लेख पढ़ते-पढ़ते मैं भूल गया कि मैं पाठक हूँ, और उतर गया अपने ही विवेक, साहस और मूल्यबोध की कसौटी पर। पाया कि कितना तुच्छ हूँ मैं, और यह भी कि जिस धरती पर मैंने जन्म लिया, उसी पर कभी भगतसिंह भी जन्मे थे यह भाव गर्व से भर देता है।
इस संग्रह में कुल 21 लेख हैं कुछ भगतसिंह द्वारा स्वयं लिखित, और कुछ जिनमें उनके विचारों की झलक है। यह किताब इतिहास का दस्तावेज़ नहीं, एक वैचारिक संघर्ष का जीवंत साक्ष्य है।
"मैं नास्तिक क्यों हूँ?" यह लेख भगत सिंह ने लाहौर सेंट्रल जेल में लिखा था और 27 सितम्बर 1931 को "द पीपल" अख़बार में प्रकाशित हुआ। इसमें वह धर्म, ईश्वर और प्रार्थना जैसे विषयों को निर्भीक और तार्किक दृष्टिकोण से देखते हैं। वे लिखते हैं:
"विश्वास कष्टों को हल्का कर देता है... ईश्वर में मनुष्य को अत्यधिक सांत्वना देने वाला एक आधार मिल सकता है। उसके बिना मनुष्य को अपने ऊपर निर्भर होना पड़ता है।"
"ईश्वर में विश्वास और रोज-ब-रोज की प्रार्थना को मैं मनुष्य के लिए सबसे स्वार्थी और गिरा हुआ काम मानता हूँ।"
यह लेख नास्तिकता की वकालत नहीं करता, बल्कि जिम्मेदार विवेक और तर्कशील जीवन दृष्टि की वकालत करता है।
जुलाई 1928 में लिखे एक लेख में भगतसिंह ने सुभाषचंद्र बोस और जवाहरलाल नेहरू के विचारों की तुलना की है। यह केवल नेताओं की विचारधारा का विश्लेषण नहीं, बल्कि एक युवा क्रांतिकारी की राजनीतिक परिपक्वता का सशक्त उदाहरण है। भगतसिंह केवल हथियार नहीं, विचारों से भी लड़ते थे और उस लड़ाई में वे कहीं ज़्यादा गहरे उतरते थे।
30 सितम्बर 1930 को अपने पिता सरदार किशन सिंह को लिखा गया पत्र इस संग्रह का एक भावनात्मक और वैचारिक शिखर है। पिता ने ट्रिब्यूनल में एक याचिका देकर भगतसिंह को बचाव का अवसर दिलाने की कोशिश की थी। इस पर भगतसिंह ने स्पष्ट असहमति जताई। वे लिखते हैं:
"मेरी जिंदगी इतनी कीमती नहीं जितनी कि आप सोचते हो। कम से कम मेरे लिए तो इस जीवन की इतनी कीमत नहीं कि इसे सिद्धांतों को कुर्बान करके बचाया जाए।"
"यदि कोई अन्य व्यक्ति मुझसे ऐसा व्यवहार करता, तो मैं इसे गद्दारी से कम न मानता। लेकिन आपके संदर्भ में मैं इतना ही कहूंगा कि यह एक कमजोरी है — निचले स्तर की कमजोरी।"
"यह एक ऐसा समय था जब हम सबका इम्तिहान हो रहा था... आप इस इम्तिहान में नाकाम रहे हैं।"
यह पत्र दर्शाता है कि भगतसिंह के लिए उनके आदर्श किसी भी पारिवारिक या भावनात्मक संबंध से ऊपर थे।
इस पुस्तक में भगतसिंह द्वारा अपने भाइयों को लिखे पत्र भी हैं जो उनकी मानवीय गहराई, स्नेह और संघर्षशीलता का सुंदर समन्वय प्रस्तुत करते हैं।
और फिर आता है वह अंतिम पत्र 22 मार्च 1931, शहादत से ठीक पहले। उसमें वह अपने साथियों से कहते हैं:
"देश और मानवता के लिए जो कुछ करने की हसरतें मेरे दिल में थीं, उनका हजारवाँ भाग भी पूरा नहीं कर सका।"
यह वाक्य एक अधूरी क्रांति की वेदना नहीं, बल्कि आने वाली पीढ़ियों को सौंपा गया अधूरा सपना है।
"मैं नास्तिक क्यों हूँ? और अन्य लेख" सिर्फ़ एक किताब नहीं है यह विवेक की मशाल है, आत्मा का आईना है, और विचार की वो चिंगारी है जो समय की किसी भी दीवार को फाँद सकती है।
यह किताब अपने पाठकों को शांत नहीं छोड़ती यह उन्हें हिला देती है। और शायद यही इसकी सबसे बड़ी उपलब्धि है।
इन लेखों को केवल पढ़ा नहीं जाना चाहिए, इन्हें पीढ़ियों तक पहुँचाया जाना चाहिए। स्कूलों में, पाठ्यपुस्तकों में, युवा मनों के कोनों में जहाँ आदर्शों की नींव रखी जाती है। क्योंकि भगतसिंह की कलम हमें सिर्फ़ इतिहास नहीं बताती, वह हमें सोचने की आज़ादी, सवाल करने का साहस,और अपने विचारों के लिए अडिग खड़े रहने का हुनर सिखाती है।
यह लेख पढ़ना केवल इतिहास से संवाद नहीं है, यह आत्मा से साक्षात्कार है।
How were a person and his comrades living under hunger strike over than 60 days! I am saluting this intrepid and great soul and all the revolutionaries.