‘मणिकर्णिका’ डॉ. तुलसी राम की आत्मकथा का दूसरा खंड है ! पहला खंड ‘मुर्दहिया’ शीर्षक से प्रकाशित हुआ था ! यह कहना अतिश्योक्ति नहीं कि ‘मुर्दहिया’ को हिंदी जगत की महत्तपूर्ण घटना के रूप में स्वीकार किया गया ! साहित्य और समाज विज्ञान से जुड़े पाठकों, आलोचकों व् शोधकर्ताओं ने इस रचना के विभिन्न पक्षों को रेखांकित किया ! शीर्षस्थ आलोचक डॉ. नामवर सिंह के अनुसार ग्रामीण जीवन का जो जिवंत वर्णन ‘मुर्दहिया’ में है, वैसा प्रेमचंद की रचनाओ में भी नहीं मिलता ! ‘मणिकर्णिका’ में ‘मुर्दहिया’ के आगे का जीवन है ! आजमगढ़ से निकलकर लेखक ने करीब 10 साल बनारस हिन्दू यूनिवर्सिटी में बिताये ! बनारस में आने पर जीवन के अंत की प्रतीक ‘मणिकर्णिका’ से ही लेखक का जैसे नया जीवन शुरू हुआ ! लेखक के शब्दों में ‘गंगा के घाटो
पुस्तक पढ़ते समय ऐसा लगता है जैसे लेखक अपने जीवन के अनुभव हमारे सामने बैठकर सुना रहे हों। गरीबी, अभाव, जातिगत भेदभाव और सामाजिक उपेक्षा के बीच भी उनका आगे बढ़ने का साहस प्रेरणा देता है। जीवन में कई बार ऐसी परिस्थितियाँ आती हैं जब मनुष्य हार मानने लगता है, लेकिन तुलसीराम का जीवन बताता है कि दृढ़ इच्छाशक्ति और शिक्षा के बल पर कठिन से कठिन रास्ते भी पार किए जा सकते हैं। मणिकर्णिका का सबसे मार्मिक पक्ष इसकी सच्चाई है। लेखक ने अपने जीवन के सुख-दुख, अपमान और संघर्ष को बिना किसी बनावट के प्रस्तुत किया है। यही कारण है कि पाठक उनके दर्द को अपना दर्द और उनकी सफलता को अपनी सफलता की तरह महसूस करता है। पुस्तक के कई प्रसंग ऐसे हैं जो मन को विचलित कर देते हैं और सोचने पर मजबूर करते हैं कि समाज में समानता और मानवता की कितनी आवश्यकता है।
अब तक मेरे जीवन की फेवरेट पुस्तक में से एक पुस्तक में हर पेज में ऐसी डीटेलिंग है जो आपको सोचने और समझने में मजबूर कर देती है
मुर्दहिया’ में आजमगढ़ में 16-17 साल तक की अवस्था का लेखा-जोखा था। उसके आगे करीब 10 साल डॉक्टर तुलसीराम बनारस हिंदू यूनिवर्सिटी (बी.एच.यू.) में बिताया, जिसका परिणाम ‘मणिकर्णिका’ है। बनारस की ‘मणिकर्णिका’ किसी के भी अस्तित्व को हमेशा के लिए मिटा देती है। किंतु लेखक के साथ एकदम उल्टा हुआ। बनारस में ही उनका जीवन शुरू हुआ, बनारस में अड्मिशन से लेकर खुद के लिए कई रूम बदलने तक के अनुभव को साझा किया है लेखक ने।
बढ़ते उम्र के साथ विचारों में तब्दीलियाँ और उन तब्दीलियों के साथ खुद पर जीत हासिल करना भी उनके जीवन का बेहतरीन हिस्सा रहा है। उनके अपने अनुभव से उन्होंने जो शब्दों से किताब को गढ़ा है वो कमाल है।
घटनायें मुर्दहिया की तरह ही मार्मिक और मच्योर है पढ़ते- पढ़ते उदासी के शब्दों के चादर ऐसे आपके ऊपर जगह बनाते है जैसे ठण्ड में ओस कब बॉर्फ़ में तब्दील होती है पता नहीं चलता है। शेरपुर की घटना को पहले भी मैंने न्यूज़ में पढ़ा था लेकिन लेखक के ख़ुद के अनुभव को पढ़ना मानों सारी घटना की तस्वीर आँखों के सामने किसी ने क्लिक की हो।
“प्राचीन ग्रीक कवि होमर के बारे में जार्ज ग्रीफिन द्वारा कही गई यह पंक्ति याद आती है कि पानी या बालू पर हजारों शब्द लिखने से बेहतर है पत्थर पर सिर्फ एक शब्द लिखना।” मुझे लगता है मुर्दहिया और मणिकर्णिका वैसे ही है जैसे पत्थरों पर लिखे गए शब्द ।
Tulasiram’s book ,Very nice autobiography , enjoyed thoroughly ,present a visual representation of 1970s Varanasi ,bhu student life.struggle of a student from underprivileged section of society
मणिकर्णिका डॉ. तुलसी राम द्वारा लिखित मुर्दहिया का दूसरा भाग है, जो न केवल एक व्यक्तिगत यात्रा है, बल्कि भारतीय समाज की जटिलताओं, आस्थाओं और संघर्षों का गहन अध्ययन भी है। इस उपन्यास में डॉ. तुलसी राम ने अपनी जिंदगी के विभिन्न पहलुओं को बयां किया है, जिनमें बनारस में उनके अनुभव, दलित होने के कारण सामने आईं कठिनाइयाँ, और उनके जीवन पर बौद्ध धर्म, बनारस की संस्कृति, साम्यवाद और नक्सलवाद का प्रभाव प्रमुख रूप से शामिल हैं। इसके साथ ही, उन्होंने अपनी जिंदगी के प्रेम प्रसंगों को भी छुआ है, जो किताब को और भी मानवीय और संवेदनशील बनाते हैं।
डॉ. तुलसी राम की लेखन शैली में एक अद्वितीय ईमानदारी और संवेदनशीलता है। उन्होंने अपनी ज़िंदगी के संघर्षों को बिना किसी आंचलिक हंसी-ठिठोली के बहुत सटीक रूप से प्रस्तुत किया है। उनके शब्द न केवल दिल से निकलते हैं, बल्कि हर पंक्ति में समाज की कड़वी सच्चाइयों और उनके निजी अनुभवों की गहरी छाप दिखाई देती है।
यदि आप भारतीय समाज की सच्चाईयों और दलितों के संघर्षों को समझना चाहते हैं, तो मणिकर्णिका को पढ़ना आपके लिए एक अमूल्य अनुभव होगा।
Murdahiya and Manikarnika form a powerful autobiographical account by Tulsi Ram, tracing a life shaped by caste, poverty, and resistance.
Murdahiya captures his childhood in rural India — raw, grounded, and marked by social exclusion and hardship. Manikarnika moves into his adult life, following his education, growing political awareness, and engagement with wider social and ideological struggles.
Together, they form a lived narrative of inequality and awakening, told from within the experience itself.