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मेरी प्रिय कहानियाँ

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Meri Priya Kahaniyaan

120 pages, Paperback

Published January 1, 2018

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Upendranath Ashk

25 books12 followers
Upendra Nath Ashk is acclaimed as one of the most controversial authors of the Hindi–Urdu tradition. He has written over a hundred books in almost all genres of literature. His magnum opus, Girti Deewaaren, written in seven volumes, is hailed as an epic of Indian middle- class life. Ashk has been widely translated. He was the first Hindi dramatist to receive the Sangeet Natak Akademi Award in 1965. He also received the Soviet Land Nehru Award (1972) and Iqbal Award (1996).

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January 11, 2025
लेखक उपेंद्रनाथ अश्क की लघु कथाओं का संकलन।

पुस्तक की भूमिका में लेखक द्वारा अपनी जीवन यात्रा के बीच गूँथी गयी कहानियों का बड़ा रोचक विवरण है। कहानियों का चुनाव उपयुक्त है। हर कहानी विभिन्न विधा का प्रतिनिधित्व करती है। कुछ कहानियाँ हल्की फुल्की हैं तो कुछ व्यंजनापूर्ण और भारी भरकम ।

"एक उदासीन शाम" में लेखक ने अपने शब्दों से जूहु के तट, वहाँ के सुहावने माहौल और उसकी 'निवासी' का सुंदर खाँचा खींचा है तो "काकड़ा का तेली" के मौलू तेली की सपरिवार भरी गर्मी में जबरन पदयात्रा भी पाठक तो उस कष्टपद यात्रा में सहयात्री बना देती है। "मनुष्य - यह!" में पंडित परसराम के मानसिक पसोपेश, "डाची" की सुंदर सांडनी, सूरजीत और ईश्वर के अंदर की ओर बढ़ते हुए "नासूर" और लहना सिंह की "चारा काटने के मशीन" सभी कहानियाँ पठनीय हैं। "अजगर" के बचवा का जीवन चक्र और दमघोंटू वातावरण या फिर कहा जाए कायरतापूर्ण व्यवहार भी लीक से हटकर प्रस्तुत की गई कृति है।

"आकाशचारी" कुछ अजब ही कथा थी। मैं अभी भी पूर्णतः समझ नहीं पाया हूँ।

पहले सोचा कि यह लेखक का एक दुस्वप्न है जिसमें वो आकाशचारी हो उठता है। या कुछ और गहरा और जटिल मनोवैज्ञानिक परीक्षण? या शायद हिंदी साहित्य जगत की विभिन्न हस्तियों और आलोचकों (जो शायद एक ही हैं?) के व्यवहार पर कटाक्ष है? फिर लेखक का २३ अगस्त १९६६ को लेखक गंगा प्रसाद विमल को लिखा गया एक पत्र पढ़ा जिसमें इस कहानी पर चर्चा की गयी है। इस पृष्ठभूमि के उजागर होने के बाद इस बाद कहानी को मैंने दोबारा पढ़ा।

इस पत्र के उस हिस्से को नीचे उद्धृत कर रहा हूँ:
मुहावरे की भाषा में कहें तो यह कहानी मैंने “दून की लेने वालों” यानी डींग मारने अथवा आसमान में उड़ने वालों पर लिखी है (और डींग आदमी स्वयं अपने सामने भी मारता है और दूसरों के सामने भी) और यह आकाशचारीपन हम सब में किसी न किसी मात्रा में मौजूद है | उन डींगों के पीछे छिपा सत्य, संत्रास और खोखलापन भी मैंने कहानी में दिखाया हैं । कहानी का नायक लंच के बाद तकिये लगा कर जरा अखबार देख रहा है कि अपने शत्रु आचार्य का लेख पढ़ने के बाद उसके मन में क्रोध उभरने लगता हैं और आँखें बन्द कर वह मन-ही-मन डींग मारने (आसमानों में उड़ने) लगता है।दूसरे खण्ड में उसकी आँखें झपक जाती हैं और वह अर्धजागृतावस्था में उस आकाशचारीपन के पोछे छिपी यथार्थता को देखता है। इसी बीच वह सो जाता है और यथार्थ स्वप्न से मिल जाता है। तीसरे खण्ड में वह दुःस्वप्न देखता है, जिसके माध्यम से उसके अंतर का भय उसके सामने आ जाता है। चौथे में वह जग गया हैं और तत्काल उसने फिर महानता का खोल चढ़ा लिया है। मैं नहीं जानता किसी ने कहानी को इस तरह पढ़ा हैं कि नहीं, पर मैंने ऐसे ही लिखा है ।

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