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120 pages, Paperback
Published January 1, 2018
मुहावरे की भाषा में कहें तो यह कहानी मैंने “दून की लेने वालों” यानी डींग मारने अथवा आसमान में उड़ने वालों पर लिखी है (और डींग आदमी स्वयं अपने सामने भी मारता है और दूसरों के सामने भी) और यह आकाशचारीपन हम सब में किसी न किसी मात्रा में मौजूद है | उन डींगों के पीछे छिपा सत्य, संत्रास और खोखलापन भी मैंने कहानी में दिखाया हैं । कहानी का नायक लंच के बाद तकिये लगा कर जरा अखबार देख रहा है कि अपने शत्रु आचार्य का लेख पढ़ने के बाद उसके मन में क्रोध उभरने लगता हैं और आँखें बन्द कर वह मन-ही-मन डींग मारने (आसमानों में उड़ने) लगता है।दूसरे खण्ड में उसकी आँखें झपक जाती हैं और वह अर्धजागृतावस्था में उस आकाशचारीपन के पोछे छिपी यथार्थता को देखता है। इसी बीच वह सो जाता है और यथार्थ स्वप्न से मिल जाता है। तीसरे खण्ड में वह दुःस्वप्न देखता है, जिसके माध्यम से उसके अंतर का भय उसके सामने आ जाता है। चौथे में वह जग गया हैं और तत्काल उसने फिर महानता का खोल चढ़ा लिया है। मैं नहीं जानता किसी ने कहानी को इस तरह पढ़ा हैं कि नहीं, पर मैंने ऐसे ही लिखा है ।