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सृष्टि पर पहरा

केदारनाथ सिंह का यह नया संग्रह कवि के इस विश्वास का ताजा साक्ष्य है कि अपने समय में प्रवेश करने का रास्ता अपने स्थान से होकर जाता है ! यहाँ स्थान का सबसे विश्वसनीय भूगोल थोडा और विस्तृत हुआ है, जो अनुभव के कई सीमांतों को छूता है ! इन कविताओं में कवि की भाषा और पारदर्शी हुई है-और संवादधर्मी भी ! संग्रह की लम्बी कविता 'मंच और मचान' इस दृष्टि से उल्लेखनीय है कि यहाँ कटते हुए वृक्ष के विरुद्ध एक व्यक्ति (चीना बाबा) का प्रतिरोध 'घर' के लिए आदमी के बुनियादी संघर्ष का रूपक बन जाता है ! यहाँ तुच्छ कीचड़ भी दुनिया बचाने के लिए सक्रिय दीखता है और घास की एक छोटी-सी पट्टी भी बैनर उठाये हुए मैदान में कड़ी है ! पानी,कपास, लकड़ी और धुल जैसी छोटी-छोटी चीजों की बेचैनी से भरी ये कविताएँ कोई दावा नहीं करतीं ! वे सिर्फ आपसे बोलना-बतियाना चाहती हैं-एक ऐसी भाषा में जो जितनी इनकी है उतनी ही आपकी भी !

120 pages, Hardcover

Published January 1, 2014

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About the author

Kedarnath Singh

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Displaying 1 - 1 of 1 review
Profile Image for Amit Tiwary.
478 reviews44 followers
January 16, 2018
Kedarnath Singh is brilliant. He should be introduced to young minds at right age. I am so late on picking his work but still I am so satisfied that I got to read him.
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