कुछ किताबें होती हैं जो आपको कहानी सुनाती हैं, और कुछ किताबें होती हैं जो कहानी के बहाने आपको समाज की पूरी अलमारी खोलकर दिखा देती हैं कपड़े, जूते, पुरानी रसीदें, धूल, गंध… और वो सब कुछ जो हम “ज़रूरी” बताकर सहेजते रहते हैं। भालचंद्र नेमाड़े का उपन्यास ‘हिन्दू’ भी इसी तरह की किताब है। यह कोई धार्मिक ग्रंथ नहीं है, बल्कि भारतीय समाज, संस्कृति और इतिहास का एक तरह से सजीव दस्तावेज है एक ऐसा दस्तावेज जो मंदिर की घंटियों की आवाज़ में नहीं, बल्कि गाँव की गलियों, घर के आँगन, जाति की आदतों, रीति-रिवाजों, डर, गर्व और स्मृतियों के धुएँ में लिखा गया है, और वह धुआँ आँखों में नहीं, सोच में भरता है।
मुझे याद है, जब मनीष सर ने यह उपन्यास पढ़ने के लिए अनुशंसित किया था, तो सच कहूँ इसके उपशीर्षक ‘जीने का एक समृद्ध कबाड़’ (जगण्याचं समृद्ध आडगळ) ने मुझे वहीं पकड़ लिया था। मतलब कबाड़ भी? और वो भी समृद्ध? कबाड़ तो हम आमतौर पर बेकार, अनुपयोगी और फेंक देने योग्य समझते हैं, पर इस उपन्यास का सबसे आकर्षक और विचारोत्तेजक हिस्सा ‘कबाड़’ का दर्शन है। किताब का एक बहुत प्रसिद्ध विचार है “संस्कृति एक कबाड़खाना है।” यह वाक्य सुनने में साधारण है, पर भीतर उतरकर यह बहुत कुछ खोल देता है, क्योंकि नेमाड़े (खंडेराव के जरिए) कहते हैं कि यह कबाड़ ‘समृद्ध’ है; जैसे हमारे घरों में पुरानी चीजें पड़ी रहती हैं बचपन की किताबें, पुरानी चिट्ठियाँ, दादी का संदूक, टूटे बर्तन, पुरानी रस्में, पुरानी मान्यताएँ वे कई बार काम की नहीं होतीं, फिर भी हम उन्हें फेंकते नहीं, क्योंकि उनमें हमारा एक हिस्सा पड़ा होता है, और अपना हिस्सा कौन फेंक पाता है।
इस कहानी का नायक खंडेराव है एक पुरातत्वविद्, पर वह मिट्टी में दबे पत्थर नहीं खोजता; वह अपने गाँव और समाज के भीतर दबे हुए सच को निकालने की कोशिश करता है। वह खुदाई करता है, लेकिन जमीन की नहीं समाज की परतों की। इसी वजह से इस उपन्यास का कथानक एक जगह टिकता नहीं; यह लगातार वर्तमान से अतीत और फिर अतीत से वर्तमान की ओर झूलता रहता है, और इसलिए मुझे कई बार पढ़ते समय खुद आगे-पीछे जाना पड़ा, कभी पन्नों में, कभी अपने भीतर जैसे किताब भी कह रही हो कि ठहरो, देखो, लौटो, फिर चलो।
निमाड़े का लेखन अपनी देशीयता के लिए जाना जाता है, और इस उपन्यास में यह बात एकदम साफ दिखती है। यहाँ भूगोल केवल नक्शा नहीं है भूगोल खुद एक पात्र है। उपन्यास का केंद्र ‘मोरगाँव’ है खानदेश (महाराष्ट्र) का वह गाँव, जो सतपुड़ा की पहाड़ियों और ताप्ती-नर्मदा की घाटियों के पास स्थित है। खेत, मिट्टी, पहाड़, घाटियाँ, पानी की किल्लत या भरपूरता सब कुछ यहाँ मनुष्य के स्वभाव और समाज के रिश्तों में घुला हुआ है। लेखक ने बहुत गहराई से दिखाया है कि खेतिहर समाज में जमीन के रिश्ते ही असल में सामाजिक रिश्तों को तय करते हैं किसके पास कितनी जमीन है, किसके हिस्से में क्या आया, कौन किसका हक मारकर बैठा है, कौन श्रम करता है और कौन श्रम पर मालिकाना जमाता है और इसी से जाति, सत्ता और सम्मान की पूरी व्यवस्था खड़ी होती है। मोरगाँव इसलिए केवल एक गाँव नहीं रह जाता; वह भारत के किसी भी पारंपरिक गाँव का प्रतीक बन जाता है जहाँ आधुनिकता दस्तक दे रही है, लेकिन पुराने सामंती मूल्य अभी भी जिंदा हैं, और कई बार तो ऐसे जिंदा हैं कि वे नए जमाने को भी अपनी ही भाषा में बोलने पर मजबूर कर देते हैं।
नेमाड़े का इतिहास-बोध सबसे अलग दिखता है। वे इतिहास को राजा-रानियों की कहानियों की तरह नहीं देखते, बल्कि आम जनता की स्मृति की तरह देखते हैं उस स्मृति की तरह, जो किताबों के पन्नों में नहीं, लोगों के व्यवहार में, गाँव की कहावतों में, जाति के नियमों में, डर में, और रोज़मर्रा के अपमान में दर्ज होती है। इसीलिए पुस्तक में पेशवाकालीन व्यवस्था की तीखी आलोचना मिलती है। लेखक यह साफ दिखाते हैं कि उस समय की सामाजिक व्यवस्था ने जातिगत भेदभाव को और गहरा किया, और सत्ता को कुछ खास वर्गों तक सीमित करके बाकी समाज को लगातार “नीचे” बने रहने की आदत सिखाई। इसी क्रम में होलकर शासन का संदर्भ भी एक अलग कोण से आता है। होलकर, जो धनगर/चरवाहा समुदाय से थे, उन्हें मराठा इतिहास के एक अलग पहलू की तरह देखा गया है जहाँ सत्ता का संघर्ष भी है और आंतरिक राजनीति भी। यहाँ किताब यह भी समझाती है कि शासक बदल जाएँ, झंडे बदल जाएँ, राजधानी बदल जाए लेकिन आम आदमी का शोषण कई बार अपनी जगह स्थिर रहता है, बस उसका तरीका बदल जाता है। और फिर अंग्रेज़ आते हैं लेकिन इस उपन्यास में अंग्रेज़ केवल “शासक” नहीं हैं; वे एक ऐसी नई व्यवस्था लेकर आते हैं जो भारतीय समाज की रीढ़ मानी जाने वाली ग्राम व्यवस्था को तोड़ती है, स्थानीय ज्ञान को कमजोर करती है और लोगों के आत्मविश्वास को कुचल देती है; यह औपनिवेशिक काल यहाँ केवल सत्ता परिवर्तन नहीं लगता, बल्कि समाज की पूरी बनावट में की गई तोड़-फोड़ जैसा लगता है।
और यह सब किताब में केवल विचार बनकर नहीं आता, बल्कि ‘समय’ यानी ‘काल’ की अवधारणा में उतर जाता है। इस उपन्यास में काल सीधी रेखा की तरह नहीं चलता, जैसे शहरों की घड़ियों में चलता है; यहाँ समय बहता नहीं, घूमता है, लौटता है, उलटता है। एक ही पल में खंडेराव वर्तमान में होता है, और अगले ही पल किसी ऐतिहासिक स्मृति में पहुँच जाता है जैसे इतिहास कोई बीती हुई चीज़ नहीं, बल्कि वर्तमान की जेब में रखा हुआ सिक्का है, जब चाहा, निकाल लिया। और गाँव में तो समय जैसे ठहरा हुआ लगता है; वहाँ घड़ी की सुइयों का महत्व नहीं है, वहाँ ऋतुओं और फसलों का महत्व है; वहाँ “कब” का मतलब तारीख नहीं, मौसम है; समय नहीं, स्थिति है। यही बात शहरी पाठकों को बहुत आकर्षित करती है कि भारत के गाँवों में समय की परिभाषा शहरों से कितनी अलग है, और शायद कितनी पुरानी भी।
नेमाड़े की भाषा सुंदर गाने जैसी नहीं है वो सीधा काम करती है। कभी-कभी तो लगता है जैसे लेखक कह रहा हो सच सुनना है? ठीक है, बैठो… कटेगा। यहाँ शालीनता कम है, ईमानदारी ज़्यादा। यहाँ “वाह-वाह” वाले वाक्य नहीं, यहाँ सच के नुकीले टुकड़े हैं। यही वजह है कि यह किताब पढ़ते हुए कई बार आप ठिठकेंगे और सोचेंगे ये तो मेरे घर का सीन है, ये तो मेरे समाज का चेहरा है, ये तो मेरे भीतर बैठा डर है। और फिर आप किताब बंद करके थोड़ी देर अपने भीतर देखेंगे मैं कहाँ-कहाँ झूठ को सच मानकर जी रहा हूँ?
कहा जाता हैं की अनुवाद किसी भी कृति की दूसरी जिंदगी होता है। और सच कहूँ तो गोरख थोराट ने इस जिम्मेदारी को बखूबी निभाया है। मराठी और हिंदी की भाषाई निकटता का लाभ उन्होंने बहुत समझदारी से उठाया है, इसलिए भाषा का प्रवाह बना रहता है। खानदेश की बोली और वहाँ की मिट्टी की गंध हिंदी अनुवाद में भी महसूस होती है। अनुवाद अकादमिक होते हुए भी बोझिल नहीं है। थोराट ने मूल मराठी मुहावरों और सांस्कृतिक संदर्भों को हिंदी पाठक के लिए बहुत सहजता से रूपांतरित किया है। पढ़ते समय कई बार ऐसा लगता ही नहीं कि हम अनुवाद पढ़ रहे हैं, और यही ‘हिन्दू’ के हिंदी संस्करण की सबसे बड़ी जीत है।
सच बताऊँ तो यह किताब पढ़ते हुए आप एक साथ दो काम करेंगे ताली भी बजाएँगे कि वाह क्या लिखा है, और गुस्सा भी होंगे कि ये इतना सही कैसे है! कभी यह किताब भारी लगेगी, कभी कटु लगेगी, कभी आप सोचेंगे यार थोड़ा प्रेम भी डाल देते, फिर याद आता है यह नेमाड़े हैं… यहाँ प्रेम भी सवाल बनकर आता है। इस किताब को पढ़ना इसलिए जरूरी है क्योंकि यह आपके “विश्वास” पर हमला नहीं करती, यह आपके विश्वास के उपयोग पर सवाल करती है। यह धर्म को नहीं, धर्म के नाम पर बनने वाली सत्ता, पाखंड, सुविधा और चालाकी को खोलती है, और यह खोलना बहुत शोर नहीं करता यह बस धीरे-धीरे परतें हटाता है।
‘हिन्दू: जीने का समृद्ध कबाड़’ ऐसा उपन्यास है जिसे पढ़ना आसान नहीं है, लेकिन उसे न पढ़ना आज के समय में और भी मुश्किल है, क्योंकि जो सवाल यह किताब पूछती है, वो सवाल बाहर भी हैं और भीतर भी। यह किताब पढ़कर आप धर्म नहीं छोड़ेंगे, पर शायद अंधभक्ति छोड़ने की कोशिश ज़रूर करेंगे। ज़रूर पढ़िए। बस एक बात याद रखिए यह किताब जल्दी में नहीं पढ़ी जाती। आगे बढ़ने के लिए संयम चाहिए, और कई बार पीछे लौटकर फिर से पढ़ने की आदत भी। लेकिन यकीन मानिए, अगर आपने धैर्य रखा, तो यह किताब आपको केवल कहानी नहीं देगी आपको सोच देगी।