ध्रुवस्वामिनी प्रसाद जी का लघु नाटक है। इसमें स्त्री-पुरुष एवम पति-पत्नी के संबंध को आचार और धर्मशास्त्र की कसौटी पर परखा गया है।
शकों से घिर जाने पर सम्राट रामगुप्त युद्ध से बचने के लिए पत्नी ध्रुवस्वामिनी को शकराज के शर्तों के अनुसार उसे सौंप देने के लिए तैयार हो जाता है। ध्रुवस्वामिनी इसका प्रतिकार करती है और इसे आर्यों के आचरण और गौरव के विपरीत कायरतापूर्ण व्यवहार बतलाकर स्वाभिमान की भीख मांगती है। परंतु रामगुप्त शासन का हवाला देकर उसे भेजने के निर्णय पर अटल रहता है। ऐसे में रामगुप्त का बंदी भाई चंद्रगुप्त भी स्त्री वेश धारण कर ध्रुवस्वामिनी के साथ जाता है और युद्ध में शकराज का वध करता है। विजय के बाद पुरोहित, रामगुप्त के नीच आचरण के कारण, रामगुप्त से ध्रुवस्वामिनी के विवाह को निरस्त करार देता है। परिषद भी यह निर्णय करती है कि अनार्य, पतित और क्लीब रामगुप्त, गुप्त-साम्राज्य के पवित्र राज-सिंहासन पर बैठने के योग्य नहीं। उसे निष्कासित किया जाता है और चंद्रगुप्त और ध्रुवस्वामिनी क्रमशः राजाधिराज और महादेवी बनाए जाते हैं।
इस नाटक में यह दर्शाया गया है कि किस प्रकार और किन परिस्थितियों में पत्नी से अनादरपूर्ण व्यवहार पर उसे विवाह के बंधन से मुक्त किया जा सकता है। धर्म भी इसे शास्त्र-सम्मत बतलाता है। इस तरह प्रसाद जी का यह नाटक प्राचीन भारत में सामाजिक सुधार की परंपरा के विद्यमान होने और स्त्रियों के गौरव को महत्व देने वाली संस्कृति का गुणगान है। वर्तमान परिप्रेक्ष्य में भी यह नाटक इसीलिए प्रासंगिक है।