राजा शूद्रक द्वारा रचित इस संस्कृत नाट्य का रचनाकाल प्रथम सदी के आसपास माना जाता है। मैंने रांगेय राघव द्वारा किया गया हिंदी अनुवाद पढ़ा।
इस तरह के संस्कृत क्लासिक हम जैसों के रिव्यु से परे की चीज़ है। कई प्रकांड विद्वानों ने कई भाषाओं में अनुवाद और टीका लिखा है।
यह नाटक एक दानवीर ब्राह्मण, जो अपने दानी स्वाभाव के कारण कंगाल हो चुका है, और शहर की सबसे *प्रतिष्ठित वेश्या की प्रेम कहानी है। साथ ही साथ इसमें दुष्ट और अकर्मण्य राजा का तख़्त पलटने की कहानी भी है।
मृच्छकटिक यानि मिट्टी की गाड़ी -- इस शीर्षक के पीछे दो कारण है --- कहानी में एक जगह खिलौने वाली मिट्टी की गाड़ी की चर्चा होती है और उसी से जुड़ा घटनाक्रम कहानी का टर्निंग पॉइंट साबित होता है, और दूसरा कारण ये कि इस नश्वर देह को मिट्टी की गाड़ी समझा गया है और कई बार गाड़ी और उसमे यात्रा कर रही आत्मा में साम्यता नहीं होती यानि कि उच्च कुल में जन्मे व्यक्ति के अंदर निकृष्ट गुणों का होना और नीच कुल वालों के अंदर उत्कृष्ट गुणों का होना। इसी नाटक से एक संवाद उद्धरित करना चाहूँगा --- "कुल की प्रशंसा करने से क्या लाभ ! शील ही सबसे मुख्य वस्तु होती है। अच्छे खेत में कंटीले पेड़ भी खूब फैलते हैं।"
ऐसी पुस्तकें ऐतिहासिक महत्त्व की भी होती हैं -- इनसे हमें उस समय के समाज का परिचय मिलता है। इस नाटक से भी हम पहली सदी के समय की वर्णव्यवस्था, राजव्यवस्था, दासप्रथा, धार्मिक व्यवस्था, समाज के विभिन्न अंगों के बीच का तालमेल आदि का अंदाजा लगा सकते हैं।
वस्तुतः ऐसे क्लासिक्स देश की धरोहर हैं, और अवश्य पढ़े जाने चाहिए।
*वेश्या/गणिका को कहीं भी नीचा नहीं दिखाया गया है।