महाकवि शूद्रक द्धारा रचित ' मृच्छकटिक' एक यथार्थवादी नाटक है । मृच्छकटिक का अर्थ है 'मिटटी की गाडी' । सारा नाटक मिटटी की गाडी पर केन्दित होने के कारण लेखक ने इसी पर नाटक का नामकरण कर दिया । नाटक में यथार्थ जीवन की गतिशीलता एवं रसमयता है । भाषा सरल व नाटक के पात्रों के अनुकूल है । अभिनय की ट्टष्टि से यह नाटक सर्वथा उपयुक्त है इसीलिए इसका रंगमंच पर सर्वाधिक मंथन हुआ है । यहीं तक कि यह नाटक फिल्म निर्माताओं के आकर्षण से भी नहीं बच सका और इस पर एक फिल्म भी बन चुकी है ।
राजा शूद्रक द्वारा रचित इस संस्कृत नाट्य का रचनाकाल प्रथम सदी के आसपास माना जाता है। मैंने रांगेय राघव द्वारा किया गया हिंदी अनुवाद पढ़ा।
इस तरह के संस्कृत क्लासिक हम जैसों के रिव्यु से परे की चीज़ है। कई प्रकांड विद्वानों ने कई भाषाओं में अनुवाद और टीका लिखा है।
यह नाटक एक दानवीर ब्राह्मण, जो अपने दानी स्वाभाव के कारण कंगाल हो चुका है, और शहर की सबसे *प्रतिष्ठित वेश्या की प्रेम कहानी है। साथ ही साथ इसमें दुष्ट और अकर्मण्य राजा का तख़्त पलटने की कहानी भी है।
मृच्छकटिक यानि मिट्टी की गाड़ी -- इस शीर्षक के पीछे दो कारण है --- कहानी में एक जगह खिलौने वाली मिट्टी की गाड़ी की चर्चा होती है और उसी से जुड़ा घटनाक्रम कहानी का टर्निंग पॉइंट साबित होता है, और दूसरा कारण ये कि इस नश्वर देह को मिट्टी की गाड़ी समझा गया है और कई बार गाड़ी और उसमे यात्रा कर रही आत्मा में साम्यता नहीं होती यानि कि उच्च कुल में जन्मे व्यक्ति के अंदर निकृष्ट गुणों का होना और नीच कुल वालों के अंदर उत्कृष्ट गुणों का होना। इसी नाटक से एक संवाद उद्धरित करना चाहूँगा --- "कुल की प्रशंसा करने से क्या लाभ ! शील ही सबसे मुख्य वस्तु होती है। अच्छे खेत में कंटीले पेड़ भी खूब फैलते हैं।"
ऐसी पुस्तकें ऐतिहासिक महत्त्व की भी होती हैं -- इनसे हमें उस समय के समाज का परिचय मिलता है। इस नाटक से भी हम पहली सदी के समय की वर्णव्यवस्था, राजव्यवस्था, दासप्रथा, धार्मिक व्यवस्था, समाज के विभिन्न अंगों के बीच का तालमेल आदि का अंदाजा लगा सकते हैं।
वस्तुतः ऐसे क्लासिक्स देश की धरोहर हैं, और अवश्य पढ़े जाने चाहिए।
शुद्रक द्वारा रचित मृच्छकटिक संस्कृत के उत्कृष्ट नाटको में से एक है। इसकी रचना ईसा पूर्व दूसरी शताब्दी की मानी जाती है। शुद्रक के बारे में सिर्फ इतना ही पता चलता है कि वे क्षत्रिय राजा,कवि एवं भगवान शिव के भक्त थे। उज्जयिनी नगरी की पृष्ठभूमि में लिखी "मृच्छकटिक" ब्राह्मण चारूदत्त और गणिका वसंतसेना की कथा है। निर्धन चारूदत्त के गुणों पर वसंतसेना मोहित है लेकिन राजा का साला, षड्यंत्रकारी संस्थानक हर हाल में वसंतसेना को पाना चाहता है। नियति के खेल में नायक नायिका किस प्रकार उलझते है नाटक में उसी का वर्णन है। मृच्छकटिक का अर्थ होता है ' मिट्टी की गाड़ी'। यूं तो नाटक में मिट्टी की गाड़ी मामूली सा प्रसंग प्रतीत होती है परंतु यही पूरी कथा को बदलता है। नाटक में संस्कृत और प्राकृत भाषा का प्रयोग किया गया है। अपने समय की सामाजिक स्थिति का वर्णन शुद्रक ने बारीकी से किया है। सनातन धर्म और बौद्ध धर्म के सह-अस्तित्व का भी उदाहरण मिलता है। नाटक "प्रकरण" होने पर भी यथार्थवादी है। कमी लगी तो बस एक - पात्रों की भावनाओं को यदि थोड़ा और विस्तार से दर्शाया जाता तो अच्छा होता। इस अभाव के कारण पात्रों के सुख- दुख से थोड़ी दूरी बनी रहती है। रांगेय राघव द्वारा अनुवादित इस संकरण में भी मूल भाषा की सुंदरता का बोध होता है। रोचक कथानक, सुंदर भाषा और नाटक के पात्र इसे बेहद पठनीय बनाते हैं। (पढ़ा हो तो अपने विचार सांझा कीजिए, अगर नही पढ़ा तो जरूर पढ़िए)
This isn’t a review about the original play as such, because the play and its story need no review. And the very fact that we are still reading such classics today is the testament to its perennial relevance.
Instead, I want to comment on the translation. I have not read the original play (because I don’t know Sanskrit). However, after reading this translation I can only imagine (and marvel) at how rich the original play must have been. This translation is a gift in the sense that it is written in simple language (with helpful annotations throughout).
This translation will definitely be helpful to students who are pursuing their BA/MA in music, dance, and drama. Many a thesis is available on the play (along with one popular Hindi movie adaptation). However, if you intend to analyse and review this play academically (all the while enjoying it in the process) I will recommend this translation by Raagay Raaghav strongly.
Enjoy the timeless classic and study it to further improve yourself! Happy Reading. :-)