चम्पारण में निलहे (नील प्लांटर्स) के अत्याचारों के खिलाफ रैयतों का संघर्ष और इस संघर्ष में महात्मा गांधी की भूमिका हमेशा से चर्चा का विषय रही है और इस किताब के माध्यम से लेखक पुष्यमित्र जी ने इस पूरे संघर्ष का बहुत ही व्यापक चित्रण किया है।
किताब शुरू होती है 1916 के कांग्रेस के लखनऊ अधिवेशन से जिसमे बिहार के बड़े वकील और स्वतंत्रता संग्राम सेनानी बृजकिशोर बाबू के साथ चम्पारण के किसान राजकुमार शुक्ला भी गए थे और उनके जाने का एकमात्र उद्देश्य था मालवीय, तिलक और गांधी जैसे नेताओं को चम्पारण की किसान समस्या से अवगत कराना और उन्हें अपने साथ चम्पारण ले जाना था। तिलक और मालवीय अपनी व्यस्तताओं के कारण चम्पारण जाने को तैयार नहीं हुए मगर शुक्ल ने गांधी से चम्पारण जाने का वादा ले किया और रामचन्द्र शुक्ल तब तक गांधी का पीछा करते रहे जब उन्होंने गांधी ने चम्पारण आने का पक्का समय नहीं बता दिया। कानपुर के पत्रकार गणेश शंकर विद्यार्थी ने राजकुमार शुक्ल से कहा था कि "पंडित जी, गांधी को पकड़कर चम्पारण ले आइए। उन्ही से काम बनेगा, इस गुजराती वकील को अंग्रेजों को हराना आता है।"
यह पुस्तक गांधी के चम्पारण आगमन से पहले की उन परिस्थितियों का बारीक ब्यौरा भी देती है, जिनके कारण वहाँ के किसानों को अन्तत: नीलहे अंग्रेजों का रैयत बनना पड़ा। इसमें हमें अनेक ऐसे लोगों के चेहरे दिखलाई पड़ते हैं, जिनका शायद ही कोई जिक्र करता है, लेकिन जो सम्पूर्ण अर्थों में स्वतंत्रता सेनानी थे।
फिर गांधी जी का बिहार आगमन, उनके चम्पारण तक पहुंचने के सफर, प्लांटर्स और स्थानीय प्रशासन द्वारा गांधी को रोकने और वापस भेजने की कोशिशों, गांधी के सत्याग्रह के प्रयोग, सरकारी जांच आयोग के गठन, जांच - पड़ताल, रिपोर्ट वा नील की खेती के खात्मे की कहानी को लेखक ने बेहद व्यवस्थित ढंग से प्रस्तुत किया है।
वैसे तो चम्पारण के किसान आंदोलन का आज़ादी की लड़ाई से सीधा सरोकार नहीं था मगर चम्पारण के संघर्ष ने आज़ादी के लड़ाई में बड़ी भूमिका निभाई जैसे ये आंदोलन भारत में गांधी का पहला सत्याग्रह था, इस आंदोलन के माध्यम से गांधी बड़े वकीलों का समूह कहे जाने वाली कांग्रेस पार्टी को आम जनमानस तक ले जाने में सफल हुए, इस संघर्ष ने ही भारत को बाबू राजेंद्र प्रसाद, कृपलानी जी, बाबू बृजकिशोर आदि स्वतंत्रता संग्राम सेनानी दिए तथा इसी संघर्ष ने लोगों में ये विश्वास जगाया कि सत्याग्रह और अहिंसा के माध्यम से भी अंग्रेजों की शक्तिशीली सत्ता को कमजोर किया जा सकता है।
इस किताब का एक रोचक पक्ष उन किम्वदन्तियों और दावों का तथ्यपरक विश्लेषण है, जो चम्पारण सत्याग्रह के विभिन्न सेनानियों की भूमिका पर गुजरते वक्त के साथ जमी धूल के कारण पैदा हुए हैं जिसकी छाप इस किताब के बैक कवर में ही दिख जाती है जिसमे गांधी जी के बराबर में गांधी को चम्पारण लाने वाले किसान राजकुमार शुक्ला की तस्वीर दी गई है। सीधी-सादी भाषा में लिखी गई इस पुस्तक में किस्सागोई की सी सहजता से बातें रखी गई हैं, लेकिन लेखक ने हर जगह तथ्यपरकता का खयाल रखा है।
लेखक पुष्यमित्र जी को ये किताब लिखने के लिए बहुत आभार और साधुवाद। ये किताब इतिहास का एक महत्वपूर्ण दस्तावेज है।
ज़रूर पढ़ें।