सन् 1917 का चम्पारण सत्याग्रह भारतीय स्वतंत्रता आन्दोलन में महात्मा गांधी के अवतरण की अनन्य प्रस्तावना है, जिसका दिलचस्प वृत्तान्त यह पुस्तक प्रस्तुत करती है। गांधी नीलहे अंग्रेजों के अकल्पनीय अत्याचारों से पीडि़त चम्पारण के किसानों का दु:ख-दर्द सुनकर उनकी मदद करने के इरादे से वहाँ गए थे। वहाँ उन्होंने जो कुछ देखा, महसूस किया वह शोषण और पराधीनता की पराकाष्ठा थी, जबकि इसके प्रतिकार में उन्होंने जो कदम उठाया वह अधिकार प्राप्ति के लिए किए जानेवाले पारम्परिक संघर्ष से आगे बढक़र 'सत्याग्रह’ के रूप में सामने आया। अहिंसा उसकी बुनियाद थी। सत्य और अहिंसा पर आधारित सत्याग्रह का प्रयोग गांधी हालाँकि दक्षिण अफ्रीका में ही कर चुके थे, लेकिन भारत में इसका पहला प्रयोग उन्होंने चम्पारण में ही किया। यह सफल भी रहा। चम्पारण के किसानों को नील की जबरिया खेती से मुक्ति मिल गयी, लेकिन यह कोई आसान लड़ाई नहीं थी। नीलहों के अत्याचार से किसानों की मुक्ति के साथ-साथ स्वराज प्राप्ति की दिशा में एक नए प्रस्थान की शुरुआत भी गांधी ने यहीं से की। यह पुस्तक गांधी के चम्पारण आगमन के पहले की उन परिस्थितियों का बारीक ब्यौरा भी देती है, जिनके कारण वहाँ के किसानों को अन्तत: नीलहे अंग्रेजों का रैयत बनना पड़ा। इसमें हमें अनेक ऐसे लोगों के चेहरे दिखलाई पड़ते हैं, जिनका शायद ही कोई जिक्र करता है, लेकिन जो सम्पूर्ण अर्थों में स्वतंत्रता सेनानी थे। इसका एक रोचक पक्ष उन किम्वदन्तियों और दावों का तथ्यपरक विश्लेषण है, जो चम्पारण सत्याग्रह के विभिन्न सेनानियों की भूमिका पर गुजरते वक्त के साथ जमी धूल के कारण पैदा हुए हैं। सीधी-सादी भाषा में लिखी गई इस पुस्तक में किस्सागोई की सी सहजता से बातें रखी गई हैं, लेकिन लेखक ने हर जगह तथ्यपरकता का खयाल रखा है।
A very nuanced description of the first successful experiment of non-violence and non-cooperation movement in India by Gandhi. The book revolves around the history of the District of Champaran, Bihar which became the bedrock of the many aspects of Mahatma Gandhi which we celebrate today like cleanliness, hygiene, primary education and of course the non-cooperation and non-violence. The mention of people who made this possible, by bringing Gandhi into the fold of this movement is also very detailed and sheds light on those who worked in the background and are mainly forgotten under the shadow of the Mahatma. A must read to understand how the phenomenon Mahatma Gandhi started on the Indian soil.
चम्पारण में निलहे (नील प्लांटर्स) के अत्याचारों के खिलाफ रैयतों का संघर्ष और इस संघर्ष में महात्मा गांधी की भूमिका हमेशा से चर्चा का विषय रही है और इस किताब के माध्यम से लेखक पुष्यमित्र जी ने इस पूरे संघर्ष का बहुत ही व्यापक चित्रण किया है।
किताब शुरू होती है 1916 के कांग्रेस के लखनऊ अधिवेशन से जिसमे बिहार के बड़े वकील और स्वतंत्रता संग्राम सेनानी बृजकिशोर बाबू के साथ चम्पारण के किसान राजकुमार शुक्ला भी गए थे और उनके जाने का एकमात्र उद्देश्य था मालवीय, तिलक और गांधी जैसे नेताओं को चम्पारण की किसान समस्या से अवगत कराना और उन्हें अपने साथ चम्पारण ले जाना था। तिलक और मालवीय अपनी व्यस्तताओं के कारण चम्पारण जाने को तैयार नहीं हुए मगर शुक्ल ने गांधी से चम्पारण जाने का वादा ले किया और रामचन्द्र शुक्ल तब तक गांधी का पीछा करते रहे जब उन्होंने गांधी ने चम्पारण आने का पक्का समय नहीं बता दिया। कानपुर के पत्रकार गणेश शंकर विद्यार्थी ने राजकुमार शुक्ल से कहा था कि "पंडित जी, गांधी को पकड़कर चम्पारण ले आइए। उन्ही से काम बनेगा, इस गुजराती वकील को अंग्रेजों को हराना आता है।"
यह पुस्तक गांधी के चम्पारण आगमन से पहले की उन परिस्थितियों का बारीक ब्यौरा भी देती है, जिनके कारण वहाँ के किसानों को अन्तत: नीलहे अंग्रेजों का रैयत बनना पड़ा। इसमें हमें अनेक ऐसे लोगों के चेहरे दिखलाई पड़ते हैं, जिनका शायद ही कोई जिक्र करता है, लेकिन जो सम्पूर्ण अर्थों में स्वतंत्रता सेनानी थे।
फिर गांधी जी का बिहार आगमन, उनके चम्पारण तक पहुंचने के सफर, प्लांटर्स और स्थानीय प्रशासन द्वारा गांधी को रोकने और वापस भेजने की कोशिशों, गांधी के सत्याग्रह के प्रयोग, सरकारी जांच आयोग के गठन, जांच - पड़ताल, रिपोर्ट वा नील की खेती के खात्मे की कहानी को लेखक ने बेहद व्यवस्थित ढंग से प्रस्तुत किया है।
वैसे तो चम्पारण के किसान आंदोलन का आज़ादी की लड़ाई से सीधा सरोकार नहीं था मगर चम्पारण के संघर्ष ने आज़ादी के लड़ाई में बड़ी भूमिका निभाई जैसे ये आंदोलन भारत में गांधी का पहला सत्याग्रह था, इस आंदोलन के माध्यम से गांधी बड़े वकीलों का समूह कहे जाने वाली कांग्रेस पार्टी को आम जनमानस तक ले जाने में सफल हुए, इस संघर्ष ने ही भारत को बाबू राजेंद्र प्रसाद, कृपलानी जी, बाबू बृजकिशोर आदि स्वतंत्रता संग्राम सेनानी दिए तथा इसी संघर्ष ने लोगों में ये विश्वास जगाया कि सत्याग्रह और अहिंसा के माध्यम से भी अंग्रेजों की शक्तिशीली सत्ता को कमजोर किया जा सकता है।
इस किताब का एक रोचक पक्ष उन किम्वदन्तियों और दावों का तथ्यपरक विश्लेषण है, जो चम्पारण सत्याग्रह के विभिन्न सेनानियों की भूमिका पर गुजरते वक्त के साथ जमी धूल के कारण पैदा हुए हैं जिसकी छाप इस किताब के बैक कवर में ही दिख जाती है जिसमे गांधी जी के बराबर में गांधी को चम्पारण लाने वाले किसान राजकुमार शुक्ला की तस्वीर दी गई है। सीधी-सादी भाषा में लिखी गई इस पुस्तक में किस्सागोई की सी सहजता से बातें रखी गई हैं, लेकिन लेखक ने हर जगह तथ्यपरकता का खयाल रखा है।
लेखक पुष्यमित्र जी को ये किताब लिखने के लिए बहुत आभार और साधुवाद। ये किताब इतिहास का एक महत्वपूर्ण दस्तावेज है।
Must read book to know of intricacies in Champaran of that time and the process Gandhi used to help farmers come out of continued oppression. Loved the flow and fact-based reporting. Thanks for sharing this window to the time then, Pushyamitr! Going to read his next writing Ruktapur too.