दौड़कर उसने कृष्ण के पाँव से तीर खींचने के लिए हाथ बढ़ाया । कृष्ण उसकी व्यग्रता को निमिष- भर ताकते रहे, फिर निषेध में दाहिना हाथ उठाया । जरा ठिठक गया- '' क्यों, नाथ, क्यों?'' '' रहने दो, भाई! माता गांधारी के वचन में व्यवधान बनने का व्यर्थ प्रयत्न मत करो!'' बड़ी धीरता से वे बोले । '' मैंने महापातक किया है! मुझे क्षमा करो, नाथ! मैंने.. .मैंने आपको जंगली प्राणी समझकर आप पर तीर चलाया । यह मैंने क्या किया, नाथ!'' जरा भूमि पर लोटकर करुण क्रंदन करने लगा । '' उठो वत्स!'' करुणार्द्र स्वर में कृष्ण बोले, '' तुम्हारा नाम क्या है?'' '' मेरा नाम ?. .जरा ! '' '' जरा !. .ठीक!'' कृष्ण का मधुर हास्य छलका । तलवे से बहकर रक्तधारा भूमि पर काफी दूर चली गई थी । '' जरा, तुम्हारा नाम सार्थक है, तात ! ' जरा ' कभी किसीको नहीं छोड़ती ! अमरत्व के अभिशाप ने जिसे घेरा हो, उसí
It is always wonderful to read about Shri Krishna, But this one is a bit different. This book reminds me "Madhav Kahin Nahin Hain" by Harindra Dave.
This book talks about all the characters, closest and dearest, to Krishna's heart; Radha, Udddhava, Arjuna, Balrama, Vasudeva-Devki etc. When Krishna leaves his body, he is embraced by the nature. Radha finds him in the stone, Vidhura finds him in the River Yamuna, Uddhava finds him in Badrinath Temple. Krishna is now everywhere.
An awesome book. A must read for all Krishna lovers.
After reading Upsanhar by Kashinath Singh, this was one mandatory read. Both books deal with the period after Mahabharata war and both are unique in their own way. It is indeed a pleasure to get so many different views on topics which were never discussed. This book is a kind of flashback and happenings after war. What a wonderful read! Language and content is absolutely award worthy. Book is not too long or too short. Loved few sentences. Just the guiding light we need in these difficult days...
‘‘ना, नाथ! ना! हमारा परलोक हमारे इस इहलोक जैसा न हो, ऐसी प्रार्थना करें। एकमात्र कृष्ण, बस केवल वे, उनके सिवाय हमारे इहलोक का कोई तत्त्व हमारे परलोक में प्रवेश न करे, ऐसी कामना हम सब करें। इहलोक की तमाम स्मृतियाँ जहाँ साथ छोड़ दें, सारे क्षोभ गिर जाएँ, ऐसे किसी महाप्रस्थान की ओर मुझे ले चलो, अर्जुन...! शरीरधारी अश्वत्थामा अपने कुकर्मों की पीड़ा भोगते हुए महाकाल में अविरत भटकता रहेगा, उसका मैं क्या करूँ? किंतु हम सबको ऐसी किसी पीड़ा के बीच जीना न पड़े, ऐसे किसी धाम में मुझे ले चलो, परंतप! अब देहमुक्ति नहीं, स्मृति-मुक्ति के प्रदेश में जाने की व्याकुलता है, स्वामी!’’ द्रौपदी भावावेश में बोलती गई।
स्मरण सुखद होते हैं, वैसे ही विस्मरण भी तो कम सुखद नहीं होते, तात!
‘‘वत्स, रुको! दया करके ऐसे शब्द तुम मुझसे न कहो!’’ अक्रूर भरी आवाज में बोले, ‘‘कृष्ण के सामर्थ्य पर अंदर-अंदर श्रद्धा अवश्य थी और कृष्ण कंस का नाश कर डाले, ऐसी शुभ भावना भी अंतर में आपूर्ण भरी थी, किंतु इतिहास कोई भावनाओं से नहीं लिखा जाता। वह तो आचरण देखता है न, उद्धव! मेरे आचरण में तो वैसी शुद्धि नहीं थी...
‘उद्धव! प्रेम और करुणा से अधिक मूल्यवान् और कोई धर्म नहीं! यही नीति है, यही धर्म है! स्नेह आसक्ति है और आसक्तिरहित प्रेम ही करुणा है...’ कृष्ण ने कहा था और वह तो आर्षद्रष्टा थे।
A must read and recommended for immediate addition to your library.
A very interesting book which shows the feelings/inner thoughts of people survived Krishna. What each of them did, thought and said to him in times of distress but how Krishna remained uninfluenced by those words/actions and performed his rightful duties. Such a great learning from the life of lord Krishna.
श्री कृष्ण के विराट व्यक्तित् का अंदाज़ा हम इस बात से लगा सकते हैं की, लगभग कोई भी भारतीय भाषा ऐसी नहीं होगी जिनमे श्री कृष्ण को केंद्र में रखकर काव्य, कहानी, उपन्यास, नाटक, संदर्भ-ग्रंथ आदि साहित्य का सर्जन ना किया गया हो।
यह पुस्तक मूल रूप से गुजराती में लिखा एक उपन्यास है। पुस्तक के लेखक दिनकर जी का गुजराती साहित्य में विशाल योगदान रहा है। में पहले से ही उनकी रचनाओं का प्रशंशक हूँ। इस पुस्तक ने उस सूची में एक नयी कड़ी जोड़ने का काम किया है। मेरी “कृष्ण वंदे जगद्गुरूम” पुस्तक समीक्षा में आप दिनकर जी के बारे में और ज़्यादा पढ़ सकते है।
मैंने जब दिनकर जी को पढ़ना शुरू किया तब सबसे पहले “कृष्ण वंदे जगद्गुरूम” पुस्तक पढ़ी। वह श्री कृष्ण के अस्तित्व और उनके जीवन संदेश के बारे में हैं। इसमें महाभारत के आस-पास की घटनाएँ और श्री कृष्ण के निजी जीवन की ज़्यादा चर्चा है। उसके बाद मैंने उनकी दूसरी रचना “द्वारिका का सूर्यास्त“ पढ़ी। जिसमे समग्र यादव कुल के विनाश और प्रभु के इस पृथ्वी से विदाय का प्रसंग है। अब मैंने “श्याम फिर एक बार तुम मिल जाते!” पुस्तक ली जिसमे श्री कृष्ण के इस धरती से चले जाने के बाद के संसार की चर्चा है।
मैंने संयोगवश ही इन तीनों पुस्तकों को एक के बाद एक पसंद किया था पर सब कुछ मानो एक अनुक्रम में निकला। यह देखकर मुजे लगता है की नवीन जी ठीक ही कह रहे थे। “यह सब अवचेतन मन की माया है।” मेरे लिये शायद यही प्रभु की इच्छा थी ऐसा मुजे प्रतीत होता है।
बिना कृष्ण के द्वारिका कैसी रही होगी? “जैसे आत्मा के महा प्रयाण के बाद शेष बचा शरीर।” तत्कालीन आर्यावर्त में श्री कृष्ण एक विराट व्यक्ति थे। इस व्यक्ति के अनंत में विलीन होने से इस संसार में जो सन्नाटा छा गया, उस सन्नाटे के चीत्कार का आलेखन है यह पुस्तक।
जब श्री कृष्ण इस धरती से विलीन हो गये तब तात वासुदेव, माता देवकी से लेकर अर्जुन, द्रौपदी, सत्यभामा, अश्वत्थामा, अक्रूर, उद्धव और राधा पर्यत पात्रों की सम्भ्रमित मनोदशा को अनूठी ऊँचाई के ऊपर ले जाता उपन्यास है यह।
श्री कृष्ण विलय के समाचार के बाद हर किसी की मनोदशा दयनीय है। समस्त द्वारिकावासी अपने-अपने शोक में है पर इन सबमें केवल एक बात सामान्य है। सभी की यह मंशा थी की काश वे श्री कृष्ण से और एक बार फिर से मिल पाये तो उनसे कुछ कहना था, किसी पाप का प्रायचित करना था। और शायद इसी लिए लेखक ने लिखा है की “श्याम फिर एक बार तुम मील जाते!”
दारुक जब हस्तिनापुर से द्वारिका अर्जुन को लेकर आये तो रथ अंदर आने से पहले ही रुक गया। कृष्ण विहीन द्वारिका में दारुक के रथ के अश्वों ने भी पाँव रखने से मानो मना कर दिया हो। दारुक जब अश्वों को सांत्वना देते हुवे कहते है की “श्री कृष्ण स्वयं महाकाल के निर्णय को पलट नहीं सके, इसीलिए महाकाल के अधीन हुए।” तब आँखें छलक उठती है।
द्वारिका पुहचने के पश्चात अर्जुन जब तात वासुदेव और माता देवकी को सांत्वना देते है, यह प्रसंग ऐसे लिखा गया है मानो अर्जुन ने आंसूओ का पहाड़ आँखो पे अटकाए रक्खा हो। जैसे ही वासुदेव-देवकी अगली सुबह योग समाधि लेने की बात करते है तो अर्जुन के थामे हुए आंसू एकदम फुट पड़ते हैं। उनके सामने अर्जुन को रोना नहीं था पर वो रो पड़ा। क़रीब क़रीब अर्जुन जैसी ही स्थिति इस पाठक की थी। यह कहानी पढ़के कोई भी सामान्य मनुष्य अपनी भावनाओं पर क़ाबू नही रख पाएगा यह सहज है।
कृष्ण ने जिस अश्वत्थामा को तीन हज़ार साल के लिए तड़पता छोड़ दिया उस अश्वत्थामा के अंदर कृष्ण के प्रति कितनी घृणा और द्वेष होगा!? आप जब इस पुस्तक में अश्वत्थामा और उद्धव के मिलन का प्रसंग पढ़ेंगे तो दंग रह जाएँगे।
“पाप आचरण नहीं, भावना है। आचरण कर्म प्रेरित निमित है— भावना ही आत्मप्रेरित है। भावनामुक्त से किए गए कर्म को पाप स्पर्श नहीं करता।”
पुस्तक के शुरू के अंश पढ़के मुजे यह लग नही रहा था की इसमें महाभारत और कुरुक्षेत्र की घटनाएँ भी होगी। में इतना ���ृष्णमय था की मुजे कुरुक्षेत की इन कहानीओ में कोई रुचि नही थी। में जल्दबाज़ी में बस पन्ने ख़त्म कर रहा था।😀 पर जहाँ श्री कृष्ण हो वहाँ कुरुक्षेत ना हो वह कैसे संभव है!?
इसमें कंस का लगभग पूरा जीवन वर्णन कर लिया गया है। इसे पढ़ना मेरे लिए एक बहुत ही लंबा सफ़र था। मुजे इसमें इतना मज़ा नहीं आया पर कंस को पहली बार बारीकी से जानने का मोका भी मिला।
और आख़िर में वह पन्ना आ ही गया जहाँ तक पुहचने के लिये मैंने अभी तक १३० पनों का सफ़र तैय किया था। वो आख़िरी ३० पन्ने पे लिखी घटना जिनकी सोच मात्र से मेरी धड़कने बढ़ जाती है। यह कहानी है जब उद्धव, राधा को श्री कृष्ण विलय का संदेश देने गोकुल पुहचते है। उन दोनों के बीच का संवाद, गोकुल में उद्धव की व्यथा, राधा का पागलपन और श्रीकृष्ण विलय की खबर सुनकर राधा का संवाद। बेहद खूबसूरत। बेहद रोमांचक। यह हिस्सा पढ़ कर राधा रानी के चरणो में नतमस्तक करने को दिल करता है।🙏🏻
“कृष्ण को हम एक रूप या एक स्थान पर नहीं देखते। कृष्ण तो हमारे अस्तित्व के प्रत्येक अंश में, हमारे साथ ही जीवित है।”
कृष्ण विलय की इति से अंतः तक की कहानी पढ़ने की मेरी अभिलाषा का यहाँ ख़त्म हुई। दिनकर जी के कृष्ण विलय पे लिखे एक एक शब्द आजीवन मेरी स्मृति में रहेंगे।
I read this in Hindi, which means it was a translation. Nice read in mythological fiction, very non-preachy (& very good translation). It deals with various characters of the Mahaabhaarata right after the death of Krishna. What struck me was that except for Uddhav & Raadhaa, every person described has regrets ... unresolved differences...