यह पुस्तक ग्राम-स्वराज्य के विभिन्न अंगों पर प्रकाश डालने वाले गांधी जी के विचारों का संग्रह है।
स्वराज्य को अंग्रेजी शब्द "इंडिपेंडेंस" से अलग बताते हुए कहते हैं कि स्वराज्य एक पवित्र शब्द है; वह एक वैदिक शब्द है, जिसका अर्थ आत्म-शासन और आत्म-संयम है, जबकि इंडिपेंडेंस निरंकुश आज़ादी का या स्वच्छंदता का अर्थ देता है ।
गांधीजी के सपने का भारत एक आत्मनिर्भर आदर्श गांवों का समूह था। उनका मानना था कि ऐसे ग्राम-स्वराज्य में न तो जातियां होंगी, न वर्ग होंगे; न अस्पृश्यता रहेगी, न हिन्दू-मुसलमानों के झगड़े रहेंगे। इस स्वप्न की धुरी है -- चरखा। उन्होंने विस्तार से बताया है कि कैसे चरखे से न केवल आत्मनिर्भरता आएगी बल्कि लोगों का नैतिक उत्थान भी होगा। सन् 1945 में नेहरू को लिखे एक पत्र में उन्होंने लिखा था कि सत्य और अहिंसा का दर्शन हम देहातों की सादगी में ही कर सकते हैं। वह सादगी चरखा में और चरखा में जो चीज़ भरी है उसी पर निर्भर है।
भारत के गांवों को "घूरे का ढेर" कहा गया था। गांधीजी इस तस्वीर को बदलकर भारत को एक आदर्श गांवों का समूह बनाना चाहते थे। स्वच्छता और प्राकृतिक चिकित्सा द्वारा ग्रामवासियों को स्वस्थ, नई तालीम द्वारा अक्षर ज्ञान से पहले ही रोजगारोन्मुख ज्ञान देकर विद्यार्थियों और विद्यालयों को आत्मनिर्भर , और सभी पेशा वालों के लिए समान वेतन की व्यवस्था कर गरीब-अमीर का भेद मिटाना चाहते थे।
"अगर भारत को स्वाधीनता का ऐसा आदर्श जीवन व्यतीत करना है जिससे संसार ईर्ष्या करे, तो तमाम भंगियों, डॉक्टरों, वकीलों, शिक्षकों, व्यापारियों और दूसरे लोगों को दिनभर के प्रमाणिक काम का एक-सा वेतन या एक-सी मज़दूरी मिलनी चाहिए। संभव है भारतीय समाज यह ध्येय कभी सिद्ध न कर सके। परंतु यदि भारतवर्ष को सुखी देश बनना है, तो प्रत्येक भारतीय का कर्तव्य है कि वह इस लक्ष्य की ओर बढ़ने का प्रयत्न करे।"
शहरीकरण के धुर विरोधी थे। उन्होंने शहरों को भारत की राज्य संस्था पर उठे हुए फोड़े-फुन्सी कहा था।
बौद्धिक श्रम के बदले वेतन के विरोधी थे और उनका मानना था कि शारीरिक श्रम द्वारा ही खुद के भोजन की व्यवस्था करनी चाहिए।
"शरीर की आवश्यकताएं शरीर द्वारा ही पूरी होनी चाहिए। केवल मानसिक और बौद्धिक श्रम आत्मा के लिए और स्वयं अपने ही संतोष के लिए है। उसका पुरस्कार नहीं माँगा जाना चाहिए। आदर्श राज्य में डॉक्टर , वकील और ऐसे ही दूसरे लोग केवल समाज के लाभ के लिए काम करेंगे; अपने लिए नहीं। शारीरिक श्रम से धर्म का पालन करने से समाज की रचना में एक शांत क्रांति हो जाएगी। "
खेती, पशुपालन, खाद बनाने आदि के बारे में भी उनहोंने जो विचार लिखे/दिए थे, उनका भी संकलन इस पुस्तक में है।
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मेरा व्यू तो यही है कि भाषण देने के लिए या एक आदर्श विश्व का चित्र बनाने के लिए ये विचार काफी उपयोगी है, नहीं तो बहुत से विचार आउट डेटेड हैं और बहुत सारे इम्प्रैक्टिकल हैं।