2017 में ‘पद्मश्री’ और 2012 में ‘व्यास सम्मान’ से नवाज़े गये नरेन्द्र कोहली की गणना हिन्दी के प्रमुख साहित्यकारों में होती है। 1947 के बाद रचित हिन्दी साहित्य में उनका योगदान अमूल्य है। उन्होंने प्राचीन महाकाव्यों को आधुनिक पाठकों के लिए गद्य रूप में लिखने का एक नया चलन शुरू किया और पुराणों पर आधारित अनेक साहित्यिक कृतियाँ रचीं।नरेन्द्र कोहली ने अपनी चिरपरिचित छवि से हटकर वरुणपुत्री की रचना की है। इसमें पौराणिक कथाएँ, इतिहास, समकालीन घटनाएँ, कल्पित विज्ञान-कथा और फ़ैंटेसी का एक अद्भुत ताना-बाना रचा है। इसकी कथा वस्तु का फ़लक इतना व्यापक है कि इसमें उन्होंने धरती के सभी देशों के अतिरिक्त अन्य ग्रहों और आकाश गंगा को भी सम्मिलित किया है। राजनीति, पर्यावरण सुरक्षा, विश्व-शांति को समेटे हु
Padmashree Narendra Kohli is one of the most eminent and well-known Hindi writers of our times. His novel based on the Ram-Katha, Abhyuday, shifted the course of Hindi novel-writing. Another of his novels, Mahasamar, based on the Pandava-katha went on to become just as popular. His novel-series, Todo Kara Todo is considered the greatest and foremost novel in any language on the life of Swami Vivekananda. Abhigyan, Vasudev, Sharnam, Aatmaswikriti, Varunaputri, Sagar-Manthan, Ahalya etc. are his other well-known works. Apart from the Padmashree, he has also been awarded the Hindi Akademi award; Delhi Salaka Samman; Uttar Pradesh Hindi Sansthaan award; Pandit Deen Dayal Upadhyay Samman, Lucknow; K.K. Birla Foundation award; Vyasa Samman, New Delhi; Madhya Pradesh government and Bhopal’s Maithili Sharan Gupt Rashtriya Samman, among numerous other honours.
डॉ॰ नरेन्द्र कोहली (जन्म ६ जनवरी १९४०, निधन १७ अप्रैल २०२१, चैत्र शुक्ल पंचमी, नवरात्रि) प्रसिद्ध हिन्दी साहित्यकार हैं। उन्होंने साहित्य के सभी प्रमुख विधाओं (यथा उपन्यास, व्यंग्य, नाटक, कहानी) एवं गौण विधाओं (यथा संस्मरण, निबंध, पत्र आदि) और आलोचनात्मक साहित्य में अपनी लेखनी चलाई है। उन्होंने शताधिक श्रेष्ठ ग्रंथों का सृजन किया है। हिन्दी साहित्य में 'महाकाव्यात्मक उपन्यास' की विधा को प्रारंभ करने का श्रेय नरेंद्र कोहली को ही जाता है। पौराणिक एवं ऐतिहासिक चरित्रों की गुत्थियों को सुलझाते हुए उनके माध्यम से आधुनिक सामाज की समस्याओं एवं उनके समाधान को समाज के समक्ष प्रस्तुत करना कोहली की अन्यतम विशेषता है। कोहलीजी सांस्कृतिक राष्ट्रवादी साहित्यकार हैं, जिन्होंने अपनी रचनाओं के माध्यम से भारतीय जीवन-शैली एवं दर्शन का सम्यक् परिचय करवाया है। जनवरी, २०१७ में उन्हें पद्मश्री से सम्मानित किया गया।
‘वरुणपुत्री’ की शुरुआत बहुत मजबूत है। द्वारका और भेट द्वारका के ऐतिहासिक संदर्भ इतने सहज और रोचक ढंग से आते हैं कि पाठक तुरंत कहानी में खिंच जाता है। यहाँ लगता है कि लेखक ने सिर्फ़ कल्पना नहीं की, बल्कि इतिहास को महसूस करके लिखा है। यही हिस्सा उपन्यास की सबसे बड़ी ताक़त बनता है।
आगे चलकर विज्ञान, मिथक और रहस्य का मेल दिलचस्प बना रहता है। वरुणपुत्री का चरित्र जिज्ञासा जगाता है और यह विचार आकर्षित करता है कि जिन्हें हम चमत्कार कहते हैं, वे शायद उन्नत ज्ञान का ही रूप हों। कई जगह कहानी सोचने पर मजबूर भी करती है।
लेकिन अंत तक पहुँचते-पहुँचते कहीं न कहीं गहराई की कमी खलने लगती है। जिस स्तर की भावनात्मक और वैचारिक पकड़ की उम्मीद शुरुआत जगाती है, वह पूरी तरह विकसित नहीं हो पाती। ऐसा लगता है कि कहानी को और विस्तार, और ठहराव दिया जा सकता था ताकि प्रभाव ज़्यादा गहरा बन सके।
मैं यह भी मानता हूँ कि नरेंद्र कोहली मेरे पसंदीदा लेखकों में से हैं, इसलिए थोड़ा पूर्वाग्रह होना स्वाभाविक है। फिर भी निष्पक्ष रूप से देखें तो ‘वरुणपुत्री’ एक अच्छा और साहसी प्रयोग है, बस उतना प्रभावशाली नहीं बन पाती, जितनी नरेंद्र कोहली बना सकते थे।
कुल मिलाकर यह किताब रोचक विचारों और शानदार शुरुआत के लिए याद रहती है, लेकिन अंत में थोड़ी अधूरी-सी महसूस होती है
It's not the traditional Narendra Kolhi book, but it does give the delightful feeling of listening to Kohli sahab talk about religion, nature and human psychology.
Good book but not one of the best of Narendra Kohli, especially after reading Mahasamar. This book however links the mythology with modern science and contemporary issues.