Jump to ratings and reviews
Rate this book

आराधना

Rate this book
आराधना के गीत निराला-काव्य के तीसरे चरण में रचे गए हैं, उनके इस चरण के धार्मिक काव्य की विशेषता यह है कि वह हमें उद्विग्न करता है, आध्यात्मिक शांति निराला को कभी मिली भी नहीं, क्योंकि इस लोक से उन्होंने कभी मुँह नहीं मोड़ा बल्कि इस लोक को अभाव और पीड़ा से मुक्त करने वे कभी सामाजिक और राजनीतिक आंदोलनों की ओर देखते रहे और कभी ईश्वर की ओर। उनकी यह व्यकुलता ही उनके काव्य सबसे बड़ी शक्ति है। दुख हर दे, जल-शीतल सर दे! वरदे! पावन उर को कर दे! शून्य कोष ओसों से भर दे, तरु को रश्मी, पत्र-मर्मर दे, मौन तूलि को मूर्ति मुखर दे, पग-पग को जग के तग तर दे! पारण को गोधूम-चूर्ण, घृत, सुरभि सुचारण को सौरभ-सृत, निर्धारण को नाम अलंकृत, मारण को कलि-कल्मष, वर दे!

107 pages, Kindle Edition

First published January 1, 1998

14 people are currently reading
37 people want to read

About the author

निराला का जन्म बंगाल में मेदिनीपुर ज़िले के महिषादल गाँव में हुआ था। उनका पितृग्राम उत्तर प्रदेश का गढ़कोला (उन्नाव) है। उनके बचपन का नाम सूर्य कुमार था। बहुत छोटी आयु में ही उनकी माँ का निधन हो गया। निराला की विधिवत स्कूली शिक्षा नवीं कक्षा तक ही हुई। पत्नी की प्रेरणा से निराला की साहित्य और संगीत में रुचि पैदा हुई। सन्‌ १९१८ में उनकी पत्नी का देहांत हो गया और उसके बाद पिता, चाचा, चचेरे भाई एक-एक कर सब चल बसे। अंत में पुत्री सरोज की मृत्यु ने निराला को भीतर तक झकझोर दिया। अपने जीवन में निराला ने मृत्यु का जैसा साक्षात्कार किया था उसकी अभिव्यक्ति उनकी कई कविताओं में दिखाई देती है।

सन्‌ १९१६ में उन्होंने प्रसिद्ध कविता जूही की कली लिखी जिससे बाद में उनको बहुत प्रसिद्धि मिली और वे मुक्त छंद के प्रवर्तक भी माने गए। निराला सन्‌ १९२२ में रामकृष्ण मिशन द्वारा प्रकाशित पत्रिका समन्वय के संपादन से जुड़े। सन १९२३-२४ में वे मतवाला के संपादक मंडल में शामिल हुए। वे जीवनभर पारिवारिक और आर्थिक कष्टों से जूझते रहे। अपने स्वाभिमानी स्वभाव के कारण निराला कहीं टिककर काम नहीं कर पाए। अंत में इलाहाबाद आकर रहे और वहीँ उनका देहांत हुआ।

छायावाद और हिंदी की स्वच्छंदतावादी कविता के प्रमुख आधार स्तंभ निराला का काव्य-संसार बहुत व्यापक है। उनमें भारतीय इतिहास, दर्शन और परंपरा का व्यापक बोध है और समकालीन जीवन के यथार्थ के विभिन्‍न पक्षों का चित्रण भी ।भावों और विचारों की जैसी विविधता, व्यापकता और गहराई निराला की कविताओं में मिलती है वैसी बहुत कम कवियों में है। उन्होंने भारतीय प्रकृति और संस्कृति के विभिन्‍न रूपों का गंभीर चित्रण अपने काव्य में किया है। भारतीय किसान जीवन से उनका लगाव उनकी अनेक कविताओं में व्यक्त हुआ है।

यद्यपि निराला मुक्त छंद के प्रवर्तक माने जाते हैं तथापि उन्होंने विभिन्‍न छंदों में भी कविताएँ लिखी हैं। उनके काव्य-संसार में काव्य-रूपों की भी विविधता है। एक ओर उन्होंने राम की शक्ति पूजा और तुलसीदास जैसी प्रबंधात्मक कविताएँ लिखीं तो दूसरी ओर प्रगीतों की भी रचना की। उन्होंने हिंदी भाषा में गज़लों की भी रचना की है। उनकी सामाजिक आलोचना व्यंग्य के रूप में उनकी कविताओं में जगह-जगह प्रकट हुई है।

निराला की काव्यभाषा के अनेक रूप और स्तर हैं! राम की शक्ति पूजा और तुलसीदास में तत्समप्रधान पदावली है तो शिक्षुक जैसी कविता में बोलचाल की भाषा का सुजनात्मक प्रयोग। भाषा का कसाव, शब्दों की सितव्ययिता और अर्थ की प्रधानता उनकी काव्य-धाषा की जानी-पहचानी विशेषताएँ हैं।

निराला की प्रमुख काव्य कृतियाँ हैं-परिमल, गीतिका, अनामिका, तुलसीदास, कुकुरमुत्ता, अणिमा, नए पत्ते, बेला, अर्चना, आराधना, गीतगुंज आदि। निराला ने कविता के अतिरिक्त कहानियाँ और उपन्यास भी लिखे। उनके उपन्यासों में बिल्लेसुर बकारिहा विशेष चर्चित हुआ।उनका संपूर्ण साहित्य निराला रचनावली के आठ खंडों में प्रकाशित हो चुका है।

Ratings & Reviews

What do you think?
Rate this book

Friends & Following

Create a free account to discover what your friends think of this book!

Community Reviews

5 stars
6 (40%)
4 stars
5 (33%)
3 stars
2 (13%)
2 stars
2 (13%)
1 star
0 (0%)
Displaying 1 of 1 review
Profile Image for Bharat.
1 review
April 6, 2022
Loved it!

Liked it. A tad bit difficult for my acumen. Need to raise my hindi vocabulary and my intellect to this book's level. But Kindle helped. Will come back to it. Soon.
Displaying 1 of 1 review

Can't find what you're looking for?

Get help and learn more about the design.