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Lokpriya Shayar Aur Unki Shayari - Faiz Ahmad Faiz

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इस अत्यंत लोकप्रिय पुस्तक-माला की शुरुआत 1960 के दशक में हुई जब पहली बार नागरी लिपि में उर्दू की चुनी हुई शायरी के संकलन प्रकाशित कर राजपाल एण्ड सन्ज़ ने हिन्दी पाठकों को उर्दू शायरी का लुत्फ़ उठाने का अवसर प्रदान किया। इस पुस्तक-माला का संपादन उर्दू के सुप्रसिद्ध संपादक प्रकाश पंडित ने किया था। हर पुस्तक में शायर के संपूर्ण लेखन में से बेहतरीन शायरी का चयन है और पाठकों की सुविधा के लिए कठिन शब्दों के अर्थ भी दिए हैं। प्रकाश पंडित ने हर शायर के जीवन और लेखन पर - जिनमें से कुछ समकालीन शायर उनके परिचित भी थे - रोचक और चुटीली भूमिकाएं लिखी हैं।आज तक इस पुस्तक-माला के अनगिनत संस्करण छप चुके हैं। अब इसे एक नई साज-सज्जा में प्रस्तुत किया जा रहा है जिसमें उर्दू शायरी के जानकार सुरेश सलिल ने हर प

130 pages, Kindle Edition

Published January 1, 2019

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Prakash Pandit

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Profile Image for Amrendra.
349 reviews15 followers
May 13, 2023
कैसी आश्चर्यजनक वास्तविकता है कि केवल चंद नज्मों और चंद गजलों का शायर होने पर भी 'फैज़' की शायरी एक बकायदा स्कूल-ऑफ-थॉट का दर्जा रखती है और नई पीढ़ी का कोई उर्दू शायर अपनी छाती पर हाथ रखकर इस बात का दावा नहीं कर सकता कि वह किसी न किसी रूप में 'फैज़' से प्रभावित नहीं हुआ। रूप और रस, प्रेम और राजनीति, कला और विचार का जैसा सराहनीय समन्वय 'फैज़' अहमद फैज़ ने प्रस्तुत किया है और प्राचीन परम्पराओं पर नवीन परंपराओं का महल उसारा है, निस्संदेह वह उसी का हिस्सा है और आधुनिक उर्दू शायरी उनकी इस देन से और निखरी है।

1911 में सियालकोट में जन्मे इस शायर में बगावत और अंतरराष्ट्रीयता के भी स्वर हैं। उनकी शायरी में अफ्रीका और लेबनान, बेरूत के संघर्ष के लिए भी जगह है। इन्हीं कारणों से फैज़ को जो शोहरत मिली वह बढ़ती चली गई और वो पांचवे से नौवें दशक में अपने इंतेकाल तक उर्दू शायरी के आसमान में छाए रहे।

मता-ऐ-लौहो कलम छिन गई तो क्या गम है
कि खून-ऐ-दिल में डूबो ली है उंगलियां मैंने...
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