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मातोश्री [Matoshree]

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अहिल्याबाई होलकर एक बेटे, एक परिवार की नहीं, समस्त प्राणिमात्र की माँ बन गईं और प्रजा ने उन्हें प्रातः स्मरणीय, पुण्यश्लोका, देवी, लोकमाता मान अपनी आत्मा में स्थान दे रखा है। प्रस्तुत नाटक ‘मातोश्री’ उसी चरित्र की नाटकीय प्रस्तुति है। लेखिका ने इसे देवी की प्रेरणा से लिपिबद्ध किया है। नाटक पठनीयता के स्थान पर प्रभावी अभिनयता के कारण अधिक गहरा और लंबे समय तक प्रभाव कायम रखता है। सुमित्राजी लेखिका नहीं हैं, लेकिन देवी के प्रति श्रद्धा एवं पूजाभाव ने उनसे नाटक लिखवा सिद्धहस्त नाटककार बना दिया।नाटक ‘मातोश्री’ देवी अहिल्याबाई के मातृत्व के श्रेष्ठ गुणों का परिचायक है। नाटक न केवल पठनीय है, वरन् मंचनी&

59 pages, Kindle Edition

Published January 6, 2018

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3 (3%)
Displaying 1 - 3 of 3 reviews
Profile Image for Ashish Iyer.
871 reviews635 followers
September 4, 2020
सत्य कहूँ तो मुझे नाटक पढ़ने में कोई आनंद नहीं आता है परन्तु यह पुस्तक मातोश्री अहिल्या बाई पर थी इसलिये उन पर पढने क लिए बड़ी जिज्ञासा हुई| अच्छी और छोटी पुस्तक है|
Profile Image for Pooja  Banga.
839 reviews97 followers
December 14, 2018
अहिल्याबाई होलकर एक बेटे, एक परिवार की नहीं, समस्त प्राणिमात्र की माँ बन गईं और प्रजा ने उन्हें प्रातः स्मरणीय, पुण्यश्लोका, देवी, लोकमाता मान अपनी आत्मा में स्थान दे रखा है।
प्रस्तुत नाटक ‘मातोश्री’ उसी चरित्र की नाटकीय प्रस्तुति है। लेखिका ने इसे देवी की प्रेरणा से लिपिबद्ध किया है। नाटक पठनीयता के स्थान पर प्रभावी अभिनयता के कारण अधिक गहरा और लंबे समय तक प्रभाव कायम रखता है। सुमित्राजी लेखिका नहीं हैं, लेकिन देवी के प्रति श्रद्धा एवं पूजाभाव ने उनसे नाटक लिखवा सिद्धहस्त नाटककार बना दिया।
नाटक ‘मातोश्री’ देवी अहिल्याबाई के मातृत्व के श्रेष्ठ गुणों का परिचायक है। नाटक न केवल पठनीय है, वरन् मंचनीय भी है, क्योंकि इसमें नाटक एवं मंचन की दृष्टि से सारे तत्त्व मौजूद हैं।
105 reviews21 followers
February 13, 2019
इस नाटक की नायिका इंदौर की राजमाता अहिल्याबाई होल्कर हैं, जिन्हें प्रजा प्रेमवश "मातोश्री" कहकर बुलाती थी और आज 200 वर्ष बाद भी उसी रूप में याद रखती है. इस नाटक का लेखन श्रीमती सुमित्रा महाजन ने किया है, जिनका स्वयं इंदौर से लंबा परिचय है. यह नाटक उन्होंने सत्तर के दशक में लिखा था और गत वर्ष (2018) पुनः संशोधित कर प्रकाशित किया. जैसा की उन्होंने भूमिका में लिखा है, उन्होंने इस नाटक का लेखन आदर्श माता अहिल्याबाई के चित्रण के लिए किया था, जिसका सञ्चालन प्राथमिकतः राष्ट्र सेविका समिति की स्वयंसेविकाओं द्वारा किया गया था, जिससे जन-मानस को माता अहिल्याबाई से परिचित करवाया जा सके. अतः नाटक में जो छवि उभरती है वह एक आदर्श माता की ही है.

नाटक की शुरुआत में आदर्श पुत्री रुपी अहिल्या शीघ्र ही आदर्श पत्नी बन जाती है. उसके उपरान्त कैसे वो सिर्फ अपने पुत्र की माता से समस्त प्रजा की माता बनती हैं, अच्छे से चित्रित है. उनकी ईश्वर भक्ति, सात्विक प्रवृति, प्रजा हेतु ममता, राजकीय कर्तव्यों के लिए समर्पण, व्यवहारिकता का लोप किए बिना सभी के पवित्रत्व को देखना, आदि गुण बहुत ही प्रेरणादायक हैं. हालांकि उनके द्वारा किए गए अन्य कार्य जैसे सड़कों, धर्मशालाओं का निर्माण/जीर्णोद्धार, इस्लामी हमलावरों द्वारा तोड़े गए मंदिरों का पुनर्निर्माण, आदि नाटक में वर्णित नहीं हैं, संभवतः समय के अभाव के कारण. कुछ-कुछ जगहों पर संवाद अत्यधिक सरल या बहुत कृत्रिम हैं.

इन चंद चीज़ों के अतिरिक्त नाटक पठनीय है, विशेषतः बच्चों के लिए और मंचनीय भी है (मंचन किया जा चुका है).
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