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Vidur Neeti

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महाभारत हिंदू सभ्यता और संस्कृति का एक पावन धर्मग्रंथ है। इसका आधार अधर्म के साथ धर्म की लड़ाई पर टिका है। इसे पाँचवाँ वेद भी कहा जाता है। महाभारत में ही समाहित ‘श्रीमद‍्भगवद‍्गीता’ एवं ‘व‌िदुर नीति’ इसके दो आधार-स्तंभ हैं। एक में भगवान् श्रीकृष्ण अधर्म के विरुद्ध अर्जुन को युद्ध के लिए प्रेरित करते हैं तो दूसरे में महात्मा विदुर युद्ध टालने के लिए धृतराष्‍ट्र को अधर्म (दुर्योधन) का साथ छोड़ने के लिए उपदेश करते हैं। यहाँ श्रीकृष्ण तो अपने उद‍्देश्‍य में सफल हो जाते हैं; लेकिन विदुर के उपदेश धृतराष्‍ट्र का हृदय-परिवर्तन नहीं कर पाते; जिसका परिणाम महाभारत के युद्ध के रूप में सामने आता है।लेकिन इसके लिए हम विदुरजी की नीति को विफल नहीं ठहरा सकते। उनका प्रत्येक

133 pages, Kindle Edition

Published January 1, 2012

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Satyaketu

1 book

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Displaying 1 - 4 of 4 reviews
Profile Image for Rajan.
637 reviews42 followers
January 30, 2021
शीलं प्रधानं पुरुषे तद् यस्येह प्रणश्यति। न तस्य जीवितेनार्थो न धनेन न बन्धुभिः।।48।।
शील (उत्तम स्वभाव व उत्तम आचरण) ही मनुष्य का प्रमुख गुण है। जिस व्यक्ति का शील नष्ट हो जाता है-धन, जीवन और रिश्तेदार उसके किसी काम के नहीं रहते; अर्थात् उसका जीवन व्यर्थ हो जाता है।







सूक्ष्मोऽपि भारंनृपते स्यन्दनो वै शत्तक्ताह्यवोढुं न तथान्ये महीजाः। एवंयुत्तक्ता भारसहा भवन्ति महाकुलीना न तथान्ये मनुष्याः।।36।।

राजन! जैसे रथ छोटा होने पर भी भार को सँभाल सकता है, लेकिन काठ के बड़े-बड़े लट्ठे वैसा नहीं कर सकते। इसी प्रकार उत्तम कुल में जनमें मनुष्य भी भार वहन कर सकते हैं; दूसरे लोग वैसा नहीं कर सकते। अर्थात् उत्तम कुल में जनमें लोग दूसरों के लिए कष्ट सह सकते हैं; लेकिन अन्य लोग यह नहीं कर सकते।







अपण्डितो वापि सुहृत् पण्डितो वाप्यनात्मवान्।। नापरीक्ष्य महीपालः कुर्य्यात् सचिवमात्मनः।।18।।

महाराज! जो मित्र न हो, उसे अपनी गुप्त नीति न बताएँ। इसी प्रकार मूर्ख मित्र तथा चंचल स्वभाव वाले विद्वान को भी अपनी गुप्त नीति न बताएँ। इसलिए राजा जिसे भी मंत्री बनाए, उसकी अच्छी तरह जाँच-परख कर ले।






सुखं च दुखं च भवाभवौ च लाभालाभौ मरणं जीवितं च। पर्यायशः सर्वमेते स्पृशन्ति तस्माद् धीरो न हृष्येन्न शोचेत्।।47।।

सुख-दुख, लाभ-हानि, जीवन-मृत्यु, उत्पत्ति-विनाश-ये सब स्वाभाविक कर्म समय-समय पर सबको प्राप्त होते रहते हैं। ज्ञानी पुरुष को इनके बारे में सोचकर शोक नहीं करना चाहिए। ये सब शाश्वत कर्म हैं। ܀܀܀

चलानि हीमानि षडिन्द्रियाणि तेषां यद् यद् वर्धते यत्र यत्र। ततस्ततः स्रवते बुद्धिरस्य छिद्रोदकुम्भादिव नित्यमम्मः।।48।।

मनुष्य की छह इंद्रियाँ बहुत बेलगाम हैं, ये जितनी अधिक विषय-भोगों में लिप्त होती जाती हैं; मनुष्य उतना ही विवेकहीन होता जाता है, जैसे छेद हुए घड़े से सारा पानी निकल जाता है।
Profile Image for Karan joshi.
95 reviews
July 17, 2024
"Vidur Neeti," a discourse by Vidura in the Mahabharata, is a profound guide on ethics, governance, and life wisdom. It offers timeless principles on leadership, duty, and moral conduct, making it an essential read for anyone interested in ancient Indian philosophy and ethical teachings.
2 reviews
January 26, 2021
Amazing book.

Very Useful book for our day to days life. One can learn lot of things from Vidur niti with open mind.
Displaying 1 - 4 of 4 reviews

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