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सुखन सराय

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शिकस्तो-रेख़्त की मनाजिल से गगुज़रकर जो ग़जल नमूदार हुई वो ज़िन्दगी से बहुत करीब थी। ग़ज़ल के इस बदले हुए मिजाज़ को जिन शायरों ने समझा और बरता उनमें मुनव्वर राना को इम्तियाजी हैसियत हासिल है। उनकी शायरी न सिर्फ जिन्दगी के तमाम दीगर मुआमलात व मसाइल का एहाता करती है बल्कि वो इंसानी रिश्तों की हकीकत , लताफत व नजाकत और पकिजगीयों का इदराक भी रखती है। उसमें जज़्बों की आँच, मुहब्बत का वज़्दान और रिवायत व अकदार की पासदारी की जुस्तुजू है। मुनव्वर राना का पैकर हकीकत उनकी शायरी का आईनादार है जिसने इस वहम को बहुत हद तक दूर कर दिया है कि उर्दू शायरी सिर्फ हुस्न और इश्क गिर्द चक्कर लगाती रहती है और ‘साहिर’ के इस मिसरे की तस्दीक करती है ‘और भी ग़म है ज़माने में मुहब्बत के सिवा’।

Paperback

Published July 4, 1905

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Profile Image for Amrendra.
348 reviews15 followers
May 18, 2025
इस किताब में मुनव्वर राना की लगभग 90 शायरी है। मुनव्वर (1952-2024) आधुनिक समय के सर्वश्रेष्ठ शायरों में से एक रहे। वे जहां अपनी शायरी से समाज के ज्वलंत मुद्दे उठाते हैं, वहीं दूसरी ओर पारिवारिक संबंधों का भी मार्मिकता से वर्णन करते हैं।

दुनिया की हवस दिल से मेरे दूर हुई है
तब जा के फकीरी मेरी मशहूर हुई है
यादें कई बचपन की जुड़ी रहती थी इससे
शीशे की ये गुड़िया जो अभी चूर हुई है

फकीरी और मुफलिसी के प्रयोग से शायर में उदारता आती है और राना इस फन के भी कलंदर हैं। वे अपने कलाम में रेशमी भाषा के साथ साथ पथरीली जमीन भी परोसते हैं, जो हमें झकझोड़ती है और सोचने पर मजबूर करती है।

जितने भी घर जले हैं तेरे हुक्म से जले
जो भी सितम हुआ है तेरे नाम पर हुआ
हम जानवर को काट कर कस्साब हो गए
इंसान जिसने काट दिए डाक्टर हुआ
कोई सबूत और नहीं चाहिए उन्हें
उर्दू अफीम हो गई खत पाउडर हुआ।
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