दुर्गासप्तशती - दुर्गासप्तशती हिन्दू-धर्मका सर्वमान्य ग्रन्थ है। इसमें भगवतीकी कृपाके सुन्दर इतिहासके साथ अनेक गूढ़ रहस्य भरे हैं। सकाम भक्त इस ग्रन्थका श्रद्धापूर्वक पाठ करके कामनासिद्धि तथा निष्काम भक्त दुर्लभ मोक्ष प्राप्त करते हैं। इस पुस्तकमें पाठ करनेकी प्रामाणिक विधि, कवच, अर्गला, कीलक, वैदिक, तान्त्रिक रात्रिसूक्त, देव्यथर्वशीर्ष, नवार्णविधि, मूल पाठ, दुर्गाष्टोत्तरशतनामस्तोत्र, श्रीदुर्गामानसपूजा, तीनों रहस्य, क्षमा-प्रार्थना सिद्धिकुञ्जिकास्तोत्र, पाठके विभिन्न प्रयोग तथा आरती दी गयी है।
‘दुर्गा सप्तशती’ (जिसे चण्डी पाठ या देवी महात्म्य भी कहा जाता है) मार्कण्डेय पुराण का एक अत्यंत महत्वपूर्ण भाग है, जो अध्याय 81 से 93 तक (कुल 13 अध्याय) में विस्तृत है। इसमें कुल 700 श्लोक हैं, इसी कारण इसे “सप्तशती” कहा गया है। यह ग्रंथ शक्ति की आराधना का सर्वोच्च ग्रंथ है, जो देवी दुर्गा को सर्वव्यापी शक्ति — सृष्टि, स्थिति और संहार की अधिष्ठात्री — के रूप में प्रतिष्ठित करता है!
‘दुर्गा सप्तशती’ तीन मुख्य चरित्रों या प्रसंगों में विभाजित है — 1. प्रथम चरित्र (मधुकैटभ वध) — ब्रह्मा की प्रार्थना से विष्णु के शरीर से उत्पन्न योगनिद्रा रूपिणी देवी जागृत होती हैं और मधु-कैटभ नामक असुरों का संहार करती हैं। यह तामस शक्ति (महाकाली) का रूप है।
2. द्वितीय चरित्र (महिषासुर मर्दिनी) — देवताओं की सामूहिक ऊर्जा से उत्पन्न देवी महालक्ष्मी महिषासुर का वध करती हैं। यह राजस शक्ति का प्रतीक है, जो अन्याय, अहंकार और अत्याचार का अंत करती है।
3. तृतीय चरित्र (शुम्भ-निशुम्भ वध) — देवी महासरस्वती या कात्यायनी रूप में प्रकट होकर शुंभ, निशुंभ और उनके अनुचरों का संहार करती हैं। यह सात्त्विक शक्ति का प्रतिनिधित्व करती है, जो ज्ञान, सत्य और धर्म की विजय का द्योतक है।
🌺 पहला अध्याय – माधु और कैटभ का वध (माधुकैटभ वध)
इस अध्याय में वर्णन आता है कि सृष्टि की उत्पत्ति के आरम्भ में भगवान विष्णु योगनिद्रा में सो रहे थे। तभी उनके कान के मैल से उत्पन्न दो असुर—मधु और कैटभ—ने ब्रह्मा पर आक्रमण किया। ब्रह्मा ने देवी योगनिद्रा की स्तुति की। देवी ने विष्णु को जाग्रत किया, और तब विष्णु ने दोनों असुरों का संहार किया। ➡️ यह अध्याय देवी की महामाया स्वरूपिणी शक्ति* के प्रथम प्राकट्य को दिखाता है।
🌺 दूसरा अध्याय – महिषासुर का वध (महिषासुरमर्दिनि)
इस अध्याय में देवताओं को महिषासुर द्वारा पराजित किया जाना वर्णित है। सभी देवता ब्रह्मा, विष्णु और शिव के पास जाते हैं। तीनों देवताओं की तेजोमय शक्तियों से देवी दुर्गा (महिषासुरमर्दिनि) का प्राकट्य होता है। देवी ने शुंभ, निशुंभ, चंड-मुंड और महिषासुर के साथ भयंकर युद्ध किया और अंत में महिषासुर का वध किया। ➡️ यह अध्याय देवी के उग्र रूप और दैवी शक्ति के विजय का प्रतीक है।
🌺 तीसरा अध्याय – देवताओं द्वारा देवी की स्तुति (देव्या स्तुति)
महिषासुर के वध के बाद देवता देवी की महिमा का गान करते हैं। वे देवी को सृष्टि की आदि शक्ति, त्रिगुणात्मिका (सत्व, रज, तम) और सम्पूर्ण जगत की अधिष्ठात्री बताते हैं। ➡️ यह अध्याय शक्ति की सर्वव्यापकता और महिमा को दर्शाता है।
🌺 चौथा अध्याय – दुर्गा की महिमा का वर्णन (देवताओं का आशीर्वाद)
इस अध्याय में देवी देवताओं को वरदान देती हैं कि जब-जब असुर अत्याचार करेंगे, वह उनका विनाश करने के लिए विभिन्न रूपों में प्रकट होंगी। ➡️ यह अध्याय भविष्य में होने वाले दैत्यसंहारों का संकेत देता है।
🌺 पाँचवाँ अध्याय – शुम्भ-निशुम्भ की उत्पत्ति और अत्याचार
यहाँ वर्णित है कि महिषासुर के मारे जाने के बाद दो नए दैत्य शुम्भ और निशुम्भ ने देवताओं पर अधिकार कर लिया। उन्होंने इन्द्र, अग्नि, वरुण आदि देवताओं को स्वर्ग से निकाल दिया। देवताओं ने हिमालय में जाकर देवी की स्तुति की।
🌺 छठा अध्याय – कात्यायनी का प्राकट्य (कौशिकी देवी)
देवताओं की प्रार्थना सुनकर परमशक्ति पार्वती के शरीर से कौशिकी देवी का उद्भव होता है। इसी रूप में देवी ने शुम्भ-निशुम्भ का संहार किया। ➡️ यह अध्याय देवी के कौशिकी रूप और शक्ति के विभाजन का प्रतीक है।
🌺 सातवाँ अध्याय – चण्ड-मुण्ड वध (चामुंडा का प्राकट्य)
शुम्भ के मंत्री चण्ड और मुण्ड ने देवी पर आक्रमण किया। तब देवी के भ्रूविलास से कालिका (चामुंडा) उत्पन्न हुईं और उन्होंने चण्ड और मुण्ड का वध किया। ➡️ इसलिए देवी को चामुंडा देवी कहा गया।
🌺 आठवाँ अध्याय – रक्तबीज का संहार
इस अध्याय में असुर रक्तबीज का वर्णन है, जिसकी एक-एक बूँद से एक नया दैत्य उत्पन्न हो जाता था। देवी ने काली को बुलाया, जिन्होंने रक्त को पीकर उसे पुनर्जन्म से रोक दिया और रक्तबीज का संहार हुआ। ➡️ यह अध्याय अज्ञान और कामना रूपी रक्तबीज का नाश दर्शाता है।
🌺 नौवाँ अध्याय – शुम्भ-निशुम्भ का युद्ध
देवी ने शुम्भ और निशुम्भ के साथ भयंकर युद्ध किया। निशुम्भ का वध पहले हुआ और उसके बाद शुम्भ का वध हुआ। देवी ने कहा कि वे और कोई नहीं, सम्पूर्ण जगत में व्याप्त शक्ति ही हैं। ➡️ यह अध्याय दैवी और आसुरी शक्तियों के संघर्ष का चरम रूप है।
🌺 दसवाँ अध्याय – देवताओं की पुनः स्तुति
देवता पुनः देवी की स्तुति करते हैं और देवी उन्हें आशीर्वाद देती हैं। देवी कहती हैं कि जो इस कथा का श्रवण करेगा, वह भय, रोग और शत्रुओं से मुक्त होगा। ➡️ यह अध्याय भक्ति और श्रद्धा के फल का द्योतक है।
🌺 ग्यारहवाँ अध्याय – देवी का भविष्यवाणी रूपी वरदान
देवी कहती हैं कि कलियुग में जब-जब अधर्म बढ़ेगा, तब-तब वे दुर्गा, काली, भद्रकाली, भवानी आदि रूपों में प्रकट होंगी। जो व्यक्ति नवरात्र में इनका पाठ करेगा, उसे समृद्धि और विजय प्राप्त होगी।
🌺 बारहवाँ अध्याय – फलश्रुति (सप्तशती पाठ का फल)
इस अध्याय में देवी सप्तशती के पाठ और श्रवण के फलों का वर्णन है। इससे मनुष्य के सभी पाप नष्ट होते हैं, भय दूर होता है, और जीवन में सुख-समृद्धि आती है। ➡️ यह अध्याय भक्ति और साधना के प्रतिफल का प्रतिपादन करता है।
🌺 तेरहवाँ अध्याय – निष्कर्ष और उपसंहार
अंतिम अध्याय में राजा सुरथ और वैश्य समाधि की कथा आती है। वे दोनों दुर्गा की आराधना कर संसारिक और आत्मिक मुक्ति प्राप्त करते हैं। ➡️ यह अध्याय दिखाता है कि देवी उपासना से सांसारिक और आध्यात्मिक दोनों सिद्धियाँ प्राप्त होती हैं
1. देवी एक ही शक्ति का त्रिविध स्वरूप हैं — दुर्गा सप्तशती यह स्पष्ट करती है कि काली, लक्ष्मी और सरस्वती वास्तव में एक ही आदिशक्ति के तीन रूप हैं। यह सृष्टि के तीन गुणों — तमस, रजस और सत्व — की प्रतीक हैं।
2. संसार में ईश्वर की शक्ति ‘स्त्री’ रूप में प्रकट होती है यह ग्रंथ यह सिद्ध करता है कि परम शक्ति स्त्री रूपा है। वह ब्रह्मा, विष्णु और महेश की भी प्रेरक और जननी है।
3. धर्म की विजय और अधर्म का अंत — प्रत्येक कथा में असुर शक्तियाँ (अहंकार, क्रोध, लोभ आदि) नष्ट होती हैं और देवता (सद्गुण) पुनः स्थापित होते हैं। यह सद्गुणों की विजय और दुष्ट प्रवृत्तियों के विनाश का प्रतीक है।
4. आत्मिक शुद्धि का संदेश — देवी का बाह्य युद्ध वास्तव में मनुष्य के अंतर्मन का युद्ध है। देवी का आह्वान स्वयं के भीतर की शक्ति, विवेक और साहस को जगाने का प्रतीक है।
5. भक्ति और श्रद्धा का महत्व — सप्तशती में कहा गया है कि जो व्यक्ति श्रद्धापूर्वक देवी की उपासना करता है, वह सांसारिक भय, दुःख और पाप से मुक्त होकर मुक्ति को प्राप्त करता है।
‘दुर्गा सप्तशती’ केवल देवासुर संग्राम का वर्णन नहीं है, बल्कि यह अंधकार (अज्ञान) और प्रकाश (ज्ञान) के संघर्ष की कथा है। देवी का रूप इस बात का प्रतीक है कि जब भी संसार में या मनुष्य के जीवन में अधर्म, अहंकार और अन्याय बढ़ता है, तब शक्ति का उदय होता है। यह ग्रंथ मनुष्य को यह शिक्षा देता है
*अपने भीतर की शक्ति को पहचानो, *अपने भय और भ्रम का नाश करो, *और जीवन में धर्म, सत्य तथा न्याय की स्थापना करो।
1. अन्याय और अत्याचार के विरुद्ध उठना ही शक्ति का सच्चा रूप है। 2. स्त्री केवल सृजन की प्रतीक नहीं, बल्कि संरक्षण और संहार की भी शक्ति है। 3. समाज में नारी का स्थान सर्वोच्च है, क्योंकि वही सृष्टि की मूल ऊर्जा है। 4. श्रद्धा, संयम और आत्मविश्वास से जीवन में किसी भी बाधा को जीता जा सकता है।
अतः, ‘दुर्गा सप्तशती’ का निष्कर्ष यह है कि सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड में शक्ति (देवी) ही मूल कारण है। वह सृजन, पालन और संहार — तीनों की अधिष्ठात्री है। यह ग्रंथ केवल धार्मिक नहीं, बल्कि दार्शनिक, मनोवैज्ञानिक और नैतिक रूप से भी मानव जीवन के लिए मार्गदर्शक है। देवी की उपासना के माध्यम से मनुष्य अपने भीतर की नकारात्मक शक्तियों को पराजित कर दिव्यता, शांति और आत्मज्ञान प्राप्त करता है।
जहाँ शक्ति है, वहीं सृष्टि है; जहाँ श्रद्धा है, वहीं सिद्धि है; ‘दुर्गा सप्तशती’ हमें यह सिखाती है कि हर मनुष्य के भीतर एक चण्डी बसती है, जो अन्याय, भय और अंधकार को मिटाकर सत्य और प्रकाश की स्थापना करती है 🌹🌺🙏🏻
An indispensable book for devotees, this edition of Durga Saptshati from Gita Press provides a comprehensive guide with authentic rituals and a clear Hindi translation. It is the perfect resource for anyone seeking to understand and properly perform the sacred recitations of this powerful scripture.
বইটির নাম দুর্গা সপ্তশতী হলেও বাংলায় এটি বিশেষত শ্রীশ্রী চণ্ডী নামে পরিচিত। দেবীমাহাত্ম্যম্ বা দেবীমাহাত্ম্য নামেও পরিচিত। শুরুতেই সুরথ নামে এক রাজ্যচ্যুত রাজা, সমাধি নামে নিজ পরিবার কর্তৃক বিতাড়িত এক বৈশ্য এবং উভয়কে সকল জাগতিক দুঃখ জয়ের পথ দেখানো এক ঋষির কাহিনির অবতারণা করা হয়েছে। মেধা ঋষি নামে এই ঋষি দেবী ও অসুরগণের মধ্যে সংঘটিত তিনটি মহাকাব্যিক যুদ্ধের কাহিনি বর্ণনা করেন। এই তিন কাহিনির অধ্যায়গুলির অধিষ্ঠাত্রী দেবীরা হলেন মহাকালী (প্রথম অধ্যায়), মহালক্ষ্মী (দ্বিতীয়-চতুর্থ অধ্যায়) ও মহাসরস্বতী (পঞ্চম-ত্রয়োদশ অধ্যায়), এই উপাখ্যানগুলির মধ্যে সর্বাপেক্ষা প্রসিদ্ধ কাহিনিটি হল মহিষাসুরমর্দিনীর কাহিনি। এই কাহিনির মূল উপজীব্য দেবী দুর্গা কর্তৃক মহিষাসুর বধের ঘটনা।
Though I read through the Sanskrit edition, the book displayed here in the list was in Hindi. It was a pleasure to finally read through all the passages dedicated to Devi and to learn how to pronounce them correctly. Will highly recommend this book to those who want to learn how to sing praises and odes to the Devi in the correct format and be mesmerised by her beautiful characterisation through the various forms of art and nature.
Had to read this entire text for long time. I have grown up hearing it from Pandit Ji, Dadi and Maa. Also, in all of my lows I have always gravitated to Mata more than any other God. The book is basically a Hrishi helping a king and a commoner find their peace back by telling them the stories of Maa Durga fighting demons and devilish powers like Mahishasura, Madhu Kaitabh, Chand Mund, Shumbh Nishumbh, Raktbeej, Durgam and many more.