आज पुस्तकालय के हिंदी खंड में विचरण करते समय अनायास ही एक पतली पुस्तक दिखी, पतली पुस्तके मुझ जैसे अदृढ़ निश्चयी छात्रों के लिए अत्यंत उत्साहवर्धक होती है क्योंकि उन्हें शीघ्र ही पूरी पढ़ जाने से सार्थकता का कुछ थोड़ा बोहोत बोध हो ही जाता है। पुस्तक की लेखिका कृष्णा सोबती है। मैंने इनकी एक प्रसिद्ध पुस्तक मित्रो मरजानी के विषय में सुना अवश्य था किन्तु कभी इनकी किसी रचना को पढ़ने का सौभाग्य प्राप्त नहीं हुआ था।
इस पुस्तक का शीर्षक है "ऐ लड़की", यही स्वर इस पुरे कथा में गूँज भी रहा है, कभी प्रेम वश, कभी क्रोध वश, कभी असहाय भाव से, कभी प्रकांड विद्वान की तरह किन्तु स्वर यही है। स्वर एक वृद्धा एवं रोगग्रस्त माँ का है और यह मामूली सम्बोधन वह अपने पुत्री के लिए प्रयोग करती है। प्रेमचंद ने एक जगह कहा था कि "वृद्धावस्था बचपन का पुनरागमन है", यह पुस्तक इस धारणा को पुष्ट करती है। माँ और पुत्री के अतिरिक्त इस कथा में केवल एक ही तृतीय मुख्य पात्र है जो वृद्धावस्था माँ की सेवा में नियुक्त एक साधारण सेविका जान पड़ती है।
माँ के पैर किसी हादसे में टूट गए है जिस कारण से वह चल सकने में असमर्थ हो गयी है। अपने शय्या पर पड़े पड़े वह अपने अतीत के मधुर विस्मृतियों को संजोने के प्रयास में लगी रहती है। वह अपनी जीवन के संचित ज्ञान का अधिक से अधिक मर्म अपने पुत्री को देने हेतु अधीर जान पड़ती है। वह एक क्षण के लिए भी अपने पुत्री को अपने कक्ष से जाने नहीं देना चाहती, यदि पुत्री ऐसा करने का दुस्साहस करे तो वह अपने भावमूलक एवं आद्र करुणापूर्ण वाक्यों से उसे तुरंत खींच लाती है। माँ का चरित्र ही संभवतः ऐसा है अथवा पूरा जीवन एक गृहिणी के रूप में अपनी भावना व्यक्त करने का जिसे कभी अवकाश ही प्राप्त न हुआ वह स्त्री अब अपनी सर्वस्व जमा पूँजी को उड़ेलना चाहती है।
यद्यपि उनकी पुत्री अत्यंत सुशीला एवं मातृभक्त है। वह अपने माँ से एकदम रुष्ट नहीं होती चाहे उसकी माँ कितने ही तीक्ष्ण कटाक्षों से, विषाक्त उलाहनों से अपने पुत्री के ह्रदय छेदन का प्रयास करे, पुत्री उसे अपनी परीक्षा मान और अधिक कर्तव्यपरायणता से माँ की सेवा में तत्पर जान पड़ती है। वह घंटो अपनी माँ के अतीत की कथाएँ सुनती है, वह भी एक थके श्रोता की भांति नहीं अपितु एक तत्पर एवं जिज्ञासु श्रोता की भांति। ऐसा जान पड़ता है कि वह माँ के कथाओं में से कुछ आर्ष खोजना चाहती है अथवा वह ऐसी तन्मयता मात्र अपनी माँ के प्रसन्नता हेतु प्रदर्शित करती है। यह भाव स्वाभाविक ही है, हम सभी को अपनी माताओं की कथा सुनने में आनंद आता है किन्तु जिस स्तर की श्रोता इस कथा की यह पात्र वह अवश्य ही वांछनीय है।
माँ भी अपनी पुत्री से अथाह प्रेम करती है। इस बात की साक्षी वह मात्र सूसन को बनाती है जो उसकी सेविका है। मैंने यह स्वयं भी पाया है कि वृद्ध लोग प्रायः उन्हीं पर अधिक क्रोध प्रकट करते है जिनसे उन्हें अधिक आसक्ति होती है। यहाँ स्नेह के स्थान पर आसक्ति का उपयोग करने का प्रयोजन इस कथा में ही है। इस कथा की मुख्य पात्र अर्थात रोगग्रस्त माँ जीवन से मोहग्रस्त नहीं है। वह निर्भय होकर मृत्यु की प्रतीक्षा कर रही है। उसने अपने जीवन में जो पाया उसका उसे अपार सुख है परन्तु उसे साथ ही साथ अपने कई इच्छाओं का त्याग करना पड़ा इसका उसे दुःख भी है। इसका दोष वह अपने नारी विग्रह को ही मानती है परन्तु उसके लिए वह उदासीन नहीं है और न ही वह समाज के प्रति विद्रोह का बिगुल फूंकना चाहती है। यह संभवतः लेखिका की एक व्यावहारिक जीवन दृष्टि का प्रतीक है। एक स्थान पर माँ कहती है, "नावों पर आरूढ़ परिवार मजे मजे में घूमते है और चप्पू चलाती है औरत, उम्र भर चलाती जाती है। उसका वक्त तभी सुधरेगा जब वह अपनी जीविका आप कमाने लगेगी", ऐसे अनेक वाक्य इस कथा में आये है जिससे से हम कृष्णा सोबती की नारीवादी दृष्टि को समझ सकते हैं।
शैय्याग्रस्त माँ स्वयं में दार्शनिक भी बन चली है। दार्शनिक पात्र मैंने सदैव भारतवर्ष के ग्राम के बड़े बूढ़े में पाया है, सभी के दर्शन एक से भले न हो किन्तु जीवनदर्शन होता अवश्य है। ऐसी ही इस कथा की माँ का भी अपना एक जीवन दर्शन है। यह दर्शन नियतिवाद सा जान प���़ता है किन्तु यह कर्म को उपेक्षा के भाव से देखने का समर्थक नहीं है। एक स्थान पर माँ कहती है, "एक बात समझने की है। जो पोत बनाएंगे, वही सागर में उतरेंगे। श्रम करेंगे वही फल पाएंगे। यही उत्स है। जीनेवालों की प्राप्ति। " अनेक स्थानों पर माँ महाभारत के भीष्म के जैसे अपनी प्रिय पुत्री को उपदेश देकर उसे जीवन की चुनौतियों से जूझने हेतु तैयार करना चाहती है। वह अपनी पुत्री को लेकर चिंतित है क्योंकि अभी तक उसका विवाह नहीं हो सका है और उसे किसी के साथ की आवश्यकता भी नहीं प्रतीत होती। एक स्थान पर तो माँ कहती है "इसे अकेले रहने का भी अहंकार है" ।
कुल मिलाकर यह कथा जिजीविषा का महाकाव्य है। प्राण शक्ति पर श्रद्धा का अप्रितम उदाहरण है। शारीरिक दुर्बलताओं से लड़ने वाली प्राचीन भारतीय चित्त का उदाहरण है। इसके अतिरिक्त मातृभक्ति, माता-पिता के प्रति सेवा परायणता एवं समर्पण जैसे बड़े मूल्यों को इस कथा के माध्यम से लेखिका ने यह प्रकट किया है। माता पिता को पूज्य मानने की भावना का अब भारतवर्ष में लोप हो चला है यह अत्यंत चिंता का विषय है। ऐसी स्थिति में इस प्रकार की साहित्य की अत्यंत आवश्यकता है जो भारतीय युवको में पुनः माता पिता को ईश्वर के विग्रह रूप में पूजने वाली भावना को सहज ही ग्राह्य बना दे। पुस्तक की भाषा आम बोलचाल की भाषा है और हर वर्ग के पाठको के लिए सुलभ है। पुस्तक १०० पृष्टों से भी कम की है इसलिए मेरे जैसे अनुद्योगी छात्रों के लिए भी इसे पढ़ना कठिन नहीं है, यदि आप उद्योगी है तब तो क्या ही कहना।