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चिट्ठियों के दिन

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निर्मल वर्मा जितना मौन पसन्द थे, उतना ही संवाद-प्रिय- इसे मानने के पर्याप्त कारण हैं, विशेषकर उनके पत्रों की इस तीसरी पुस्तक के अवसर पर। एक आत्मीय स्पेस में लिखे गये ये पत्र अलग-अलग व्यक्तियों को लिखे जाने के बावजूद पारिवारिक ऊष्मा लिये हुए हैं। निस्संग रहते हुए भी निर्मल कितना दूसरों के संग थे, उनकी व्यावहारिक परिस्थितियों से लेकर उनकी सर्जनात्मक आकुलता तक, ये पत्र इसके साक्षी हैं। अधिकतर ये पत्र, विशेषकर रमेशचन्द्र शाह और ज्योत्स्ना मिलन के नाम, सन् अस्सी के दशक में लिखे गये पत्र हैं। यह वह दूसरी दुनिया थी, जो देखने पर बाहर से दिखायी नहीं देती। इसमें उनका अकेलापन था और अपनी व्यक्तिगत लेखकीय नियति का सामना करने की तैयारी। निर्मल वर्मा आज यदि अलग दिखते हैं, तो अपने जीने या सहने में नहीं। इस सब जंजाल के जो अर्थ वह अपने लेखन से दे पाये उसमें। दूसरों से संवाद में ही जीवन का यह अति-यथार्थ सँभल पाता है, सहनीय हो पाता है ये पत्र इसका दस्तावेज़ है। निर्मल वर्मा के शोधार्थियों और पाठकों को इन पत्रों में उनके रचना-संसार के कई नये अन्तःसूत्र मिलेंगे, ऐसा निश्चित है।


About The Writer

NIRMAL VERMA

निर्मल वर्मा (1929-2005) भारतीय मनीषा की उस उज्ज्वल परम्परा के प्रतीक-पुरुष हैं, जिनके जीवन में कर्म, चिन्तन और आस्था के बीच कोई फाँक नहीं रह जाती। कला का मर्म जीवन का सत्य बन जाता है और आस्था की चुनौती जीवन की कसौटी। ऐसा मनीषी अपने होने की कीमत देता भी है और माँगता भी। अपने जीवनकाल में गलत समझे जाना उसकी नियति है और उससे बेदाग उबर आना उसका पुरस्कार। निर्मल वर्मा के हिस्से में भी ये दोनों बखूब आये। स्वतन्त्र भारत की आरम्भिक आधी से अधिक सदी निर्मल वर्मा की लेखकीय उपस्थिति से गरिमांकित रही। वह उन थोड़े से रचनाकारों में थे जिन्होंने संवेदना की व्यक्तिगत स्पेस और उसके जागरूक वैचारिक हस्तक्षेप के बीच एक सुन्दर सन्तुलन का आदर्श प्रस्तुत किया। उनके रचनाकार का सबसे महत्त्वपूर्ण दशक, साठ का दशक, चेकोस्लोवाकिया के विदेश प्रवास में बीता। अपने लेखन में उन्होंने न केवल मनुष्य के दूसरे मनुष्यों के साथ सम्बन्धों की चीर-फाड़ की, वरन् उसकी सामाजिक, राजनैतिक भूमिका क्या हो, तेजी से बदलते जाते हमारे आधुनिक समय में एक प्राचीन संस्कृति के वाहक के रूप में उसके आदर्शों की पीठिका क्या हो, इन सब प्रश्नों का भी सामना किया। अपने जीवनकाल में निर्मल वर्मा साहित्य के लगभग सभी श्रेष्ठ सम्मानों से समादृत हुए, जिनमें साहित्य अकादेमी पुरस्कार (1985), ज्ञानपीठ पुरस्कार (1999), साहित्य अकादेमी महत्तर सदस्यता (2005) उल्लेखनीय हैं। भारत के राष्ट्रपति द्वारा तीसरा सर्वोच्च नागरिक सम्मान, पद्मभूषण, उन्हें सन् 2002 में दिया गया। अक्तूबर 2005 में निधन के समय निर्मल वर्मा भारत सरकार द्वारा औपचारिक रूप से नोबल


http://www.vaniprakashan.in/details.p...

222 pages, Paperback

Published January 1, 2010

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About the author

Nirmal Verma

98 books120 followers
A well-known name in Hindi literature, Nirmal Verma is known mainly for his fictional works. Born on April 3, 1929, he obtained a M.A. in history from Delhi University. He studied Czech at the Oriental Institute in Prague, and has been a Fellow with the International Institute for Asian Studies. Nirmal Verma is a recipient of India's highest literary award, the Jnanpith, and his short stories Kavve aur kala pani won the Sahitya Akademi Award in 1985. Some of his more popular novels are Antim aranya, Rat ka riportar, Ek Chithra Sukh, and Lal tin ki chat.

Vedina, his first novel, is set in Prague, Czechoslavakia. Like all his works, it is rich in symbolism with a style that is simple yet sophisticated. As one of the most important prose Hindi writers of our times, Nirmal Verma's creativity extends to the description and travel to places in Europe especially on Czechoslovakia and literary criticism. Among his nonfiction writings is Kal ka jokhim an investigation of the Indic arts in the 20th century. His diary, Dhundh se uthati dhun, describes his life in detail while addressing issues related to Hindi literature. His works have been widely translated into English and Gujarati.

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Profile Image for Arun Singh.
252 reviews13 followers
June 8, 2021
कुछ पढ़ी हुई किताबें हमेशा साथ लेकर चलता हूं। सोचता हूं कि उन्हें जरूरत पड़ने पर पढूंगा। पर ऐसा बहुत कम हो पाता है। फिर लगता है उनका पढ़ना शायद उतना जरूरी नहीं, पर उनके होने से किसी पुराने आत्मीय संबंध की गर्माहट हर वक्त साथ रहती है। जो कभी कभी बहुत अकेले पड़ने पर जो ठिठुरन होती है, उस किताब को देख लेने भर से दूर हो जाती है।

***

बदलता क्या है सखी? मैने लिखा दुख, तुमने भी लिखा दुख। बदला क्या? मेरे आज के लिखे दुख से सालों पहले किसी ने लिखा होगा दुख? बदला क्या? अक्षर वही रहे। अर्थ वही रहा... बदला क्या?

***

जिस लेखक से प्रेम में पड़ते हैं उसकी physical closeness पाने की बहुत जोर से इच्छा होती है। तब non fiction की तरफ बढ़ जाते हैं। पत्र, निबंध... इनमें कहानी लिखने वाला कब रोजमर्रा का इंसान बन जाता है और मुझे घेर लेता है - अपने पूरे होने में... ये जादू है। और शब्दों के जरिए। ये पत्र,... निर्मल वर्मा 'लेखक' के साथ निर्मल वर्मा 'मित्र', 'हितैषी', 'अपने रोज के कामों में व्यस्त एक सामान्य आदमी ' और ना जाने जाने कौन कौन से रूप मिले हैं। मैने घेर लिया इन सबसे खुदको। अब लगता है मैं बात कर सकता हूं, क्योंकि मैंने उनका लिखा भी पढ़ा है और उनके लिखे के पीछे जो घट रहा था जब वो लेखक नहीं थे वो भी... क्या ये एक संबंध को और गाढ़ा नहीं कर देता? मेरे मन में उनकी को मूर्ति थी उसे और सजीव कर देता? थोड़ा सा उन्हें और इंसान बना देता है जिसके पास मैं पहुंच सकता हूं... एक ठंडी मूर्ति धीमे धीमे जीवंत होकर एक इंसान की गर्माहट देती है... क्या हम इसलिए ही पत्र नहीं पढ़ते? क्या ऐसे ही मौकों पर किसी ने उनसे अपने लिखे में बात करना शुरू किया होगा? जब आप एक कहानीकार की आवाज को अपने निजी जीवन जीते हुए सुनते हो... तब क्या वो आपका मित्र नहीं बन जाता जिसे घर बैठकर या एक ही कमरे में ले आकर घंटों बातें कर सकते हैं... सुख.

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Profile Image for Harshit Gupta.
287 reviews35 followers
February 23, 2017
It was a different kind of book. The read was good not for the quality of reading, though there was matter to be read considering these were letters, but for I was able to peep into the writer's life, and even got some recommendations on books and a couple of movies as well.
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