निर्मल वर्मा की कथा में ‘पढ़ने’ का कोई विकल्प नहीं है; न ‘सुनना’, न ‘देखना’, न ‘छूना’। वह पढ़ने की शर्तों को कठिन बनाती है तो इसी अर्थ में कि हम इनमें से किसी भी रास्ते से उसे नहीं पढ़ सकते। हमें भाषा पर एकाग्र होना होगा क्योंकि वही इस कथा का वास्तविक घातांक है; वही इस कि’स्से की कि’स्सागो है। जब कभी से और जिस किसी भी कारण से इसकी शुरुआत हुई हो पर आज के इस अक्षर-दीप्त युग में विडम्बनापूर्ण ढंग से ‘पढ़ने’ की हमारी क्षमता सर्वाधिक क्षीण हुई है। हम वाक् से स्वर में, दृश्य में, स्पर्श में, रस में एक तरह से निर्वासित हैं। भाषा को अपनी आत्यन्तिक, चरम और निर्विकल्प भूमि बनाती निर्मल वर्मा की कथा इस निर्वासन से बाहर आकर सबसे अधिक क्रियाशील और समावेशी संवेदन वाक् में हमारे पुनर्वास का प्रस्ताव करती है। -मदन सोनी
About The Writer NIRMAL VERMA
निर्मल वर्मा (1929-2005) भारतीय मनीषा की उस उज्ज्वल परम्परा के प्रतीक-पुरुष हैं, जिनके जीवन में कर्म, चिन्तन और आस्था के बीच कोई फाँक नहीं रह जाती। कला का मर्म जीवन का सत्य बन जाता है और आस्था की चुनौती जीवन की कसौटी। ऐसा मनीषी अपने होने की कीमत देता भी है और माँगता भी। अपने जीवनकाल में गलत समझे जाना उसकी नियति है और उससे बेदाग उबर आना उसका पुरस्कार। निर्मल वर्मा के हिस्से में भी ये दोनों बखूब आये। स्वतन्त्र भारत की आरम्भिक आधी से अधिक सदी निर्मल वर्मा की लेखकीय उपस्थिति से गरिमांकित रही। वह उन थोड़े से रचनाकारों में थे जिन्होंने संवेदना की व्यक्तिगत स्पेस और उसके जागरूक वैचारिक हस्तक्षेप के बीच एक सुन्दर सन्तुलन का आदर्श प्रस्तुत किया। उनके रचनाकार का सबसे महत्त्वपूर्ण दशक, साठ का दशक, चेकोस्लोवाकिया के विदेश प्रवास में बीता। अपने लेखन में उन्होंने न केवल मनुष्य के दूसरे मनुष्यों के साथ सम्बन्धों की चीर-फाड़ की, वरन् उसकी सामाजिक, राजनैतिक भूमिका क्या हो, तेजी से बदलते जाते हमारे आधुनिक समय में एक प्राचीन संस्कृति के वाहक के रूप में उसके आदर्शों की पीठिका क्या हो, इन सब प्रश्नों का भी सामना किया। अपने जीवनकाल में निर्मल वर्मा साहित्य के लगभग सभी श्रेष्ठ सम्मानों से समादृत हुए, जिनमें साहित्य अकादेमी पुरस्कार (1985), ज्ञानपीठ पुरस्कार (1999), साहित्य अकादेमी महत्तर सदस्यता (2005) उल्लेखनीय हैं। भारत के राष्ट्रपति द्वारा तीसरा सर्वोच्च नागरिक सम्मान, पद्मभूषण, उन्हें सन् 2002 में दिया गया। अक्तूबर 2005 में निधन के समय निर्मल वर्मा भारत सरकार द्वारा औपचारिक रूप से नोबल पुरस्कार के लिए नामित थे।
A well-known name in Hindi literature, Nirmal Verma is known mainly for his fictional works. Born on April 3, 1929, he obtained a M.A. in history from Delhi University. He studied Czech at the Oriental Institute in Prague, and has been a Fellow with the International Institute for Asian Studies. Nirmal Verma is a recipient of India's highest literary award, the Jnanpith, and his short stories Kavve aur kala pani won the Sahitya Akademi Award in 1985. Some of his more popular novels are Antim aranya, Rat ka riportar, Ek Chithra Sukh, and Lal tin ki chat.
Vedina, his first novel, is set in Prague, Czechoslavakia. Like all his works, it is rich in symbolism with a style that is simple yet sophisticated. As one of the most important prose Hindi writers of our times, Nirmal Verma's creativity extends to the description and travel to places in Europe especially on Czechoslovakia and literary criticism. Among his nonfiction writings is Kal ka jokhim an investigation of the Indic arts in the 20th century. His diary, Dhundh se uthati dhun, describes his life in detail while addressing issues related to Hindi literature. His works have been widely translated into English and Gujarati.
कुछ है निर्मल वर्मा में जो बांध देता है। बहुत दिनों बाद उनके पास लौटा हूं। ऐसी भाषा जो भाषा से परे जाती है। उनकी कहानियां पढ़ते हुए पात्र पीछे चले जाते हैं और बचा रह जाता है एक संसार, सिर्फ छाया, धूप और महसूस होने के बीच। जैसे सितंबर की शाम में महसूस होता है। सितंबर में अक्टूबर के आने की दस्तक है और निर्मल वर्मा की कहानी उस पूरी शाम का एक लंबा खिंचा हुआ जीने से परे जाता हुआ संसार। हर एक सांस का पूरा कच्चा चिट्ठा जो इतना विशाल है कि उसके भीतर देर तक तैरना सारा झूठ झाड़ देता है। क्या बचता है? पानी के बाद का गीलापन जो बूंद बूंद होकर सूख रहा है...
बावली पढ़ी और देर तक तोषी के होने को छूता रहा। जितना हाथ नहीं आया उससे ज्यादा छूटता रहा और वही उसका होना है... जैसे कविता पढ़ो तो असल में कुछ हाथ नहीं आता... ठोस से परे कुछ भीतर जाता रहता है... बूंद बूंद कर सांसों से भीतर घुसता हुआ, वैसा ही तोषी की कहानी पढ़कर हुआ। वो खड़ी है और धीमे बहुत धीमे दरवाजा खुलता है, उसके चेहरे पर रोशनी की लकीर खिंचती जाती है, उसके होने को बांधती हुई और लगा मैं इस समय तोषी के चेहरे को छू सकता हूं, सामने होकर... उसकी फटी बड़ी सी आंखें असल में मेरी आंखें हैं, सब कुछ पूरे चरम पर जीते हुए... सुनने की परिभाषा को छूती हुई... सुनना असल में कैसे होता है वो असल में आज जाना है...
क्या मैं इतना साफ जी सकता हूं... डर का इतना उजला रूप... रोशनी में नहाया हुआ, चमचमाता हुआ, जैसे तोषी की अठन्नी जो पानी से भीगकर चमक रही है और जमीन में गिरे होकर भी इसके नाचने का संगीत लगातार बजता रहता है जब तक कि अगली उसांस के साथ मैं अपने कान बंद नहीं कर लेता। क्या हम कभी अपने जीवन के सच से सामना कर पाते हैं? क्या ऐसे ही पल होते हैं जब कहानी अपने आप तुम्हें असल में नंगा कर सामने कर देती है और तुम अपने से बचने के लिए उसी के भीतर छिपना चाहते हो पर असल में अंधेरे में भी सब दिखता है... बस आंखें चाहिए... निर्मल वर्मा वो आंखें देते हैं...
अगर समय हो तो ये कहानियां preisner के संगीत के साथ पढ़ना...
जीवन कितना छोटा है और कला कितनी लंबी... क्या इसमें ऐसा कुछ है जो अर्थ है... मैं नई भाषा तलाश करने के बीच असल में अपने आप को खोज रहा था लेकिन भाषा वही रहती है... बस हमारा उससे संबंध बदल जाता है... क्या मैं पुराने संबंध की दहलीज को लांघ रहा हूं? और नए संबंध को फिरसे शुरू करने से पहले सब साफ कर देना चाहता हूं?
इसमें कुल जमा 9 कहानियाँ हैं। Review जैसा कुछ नहीं लिख सकता जो निर्मल वर्मा को पढ़ते हैं/पढ़े हैं, उन्हें अलग से कुछ कहने की जरुरत नहीं। जिन्होंने अब तक उन्हें नहीं पढ़ा वे इस संग्रह की एक कहानी "किसी अलग रोशनी में" को एक बार जरूर पढ़ें। इन्हें पढ़ने का मतलब है कि खुद के भीतर...हर एक कोने को झाँकने के लिए एक प्रकाशपुंज पाना। ये कोने में छुपे और अनछुए जालों को साफ़ करने का मौका भी देता है तो उन जालों के साथ रहने का टीस भी।
कई बार कुछ ऐसी lines मिल जाती हैं कि किताब बंद और आप कहीं और की सैर में चले जाते हैं।
"देखो, इन्हें अकेला मत छोड़ा करो...और...अगली बार डॉक्टर के पास जाओ, तो पूछना...." वह एक क्षण झिझकीं, मेरी ओर देखा, धीरे से कहा, "ऐसे कब तक चलेगा ?"
कहीं कुछ छूट गया सा, पन्नों के बीच बिखरा हुआ मिलता है। निर्मल स्थिर कर देते हैं और साथ ही साथ आपको किसी धुंधले स्वप्न के बीचों बीच छोड़ जाते हैं। शब्दों को इतनी खूबसूरती से लगाना और समय के कांटो को बिल्कुल रोक देना जब तक कहानी आगे न बढ़े, सिर्फ निर्मल ही कर सकते हैं। करीब २ साल बाद इनको पढ़ने जितना साहस जुटा पाया हूं, आखिरी बार किसी तूफान के बहाव से छतिग्रस्त था और तब भी निर्मल ने एक कोना सहेज कर रखा था। इतने वक्त बाद भी इनको पढ़ते हुए ऐसा लगा कि इन्हे हमारे आने का अंदेशा था और किसी अनजान घर के गेस्ट हाउस में केतली से निकलने वाली गर्म भाप आपका ही इंतजार कर रही होती है जहां निर्मल की दुनिया के सारे पात्र आपसे एक एक करके मिलने आते हैं जैसे वो आपको बरसों से जानते हों या कई बार तो ऐसा लगता है कि आप स्वयं इनकी कहानी के पत्र हैं। कोई भी शब्द अभी यह नहीं बता सकता की मैं इनको पढ़कर कैसा महसूस करता हूं लेकिन कोशिश करने पर मैं सिर्फ इतना कहना चाहूंगा कि इनकी लिखाई में मुझे अपना एक छूटा हुआ घर दिखाई देता है जो कभी था ही नहीं लेकिन जहां मैं हमेशा लौटना चाहता हूं।