कुछ है निर्मल वर्मा में जो बांध देता है। बहुत दिनों बाद उनके पास लौटा हूं। ऐसी भाषा जो भाषा से परे जाती है। उनकी कहानियां पढ़ते हुए पात्र पीछे चले जाते हैं और बचा रह जाता है एक संसार, सिर्फ छाया, धूप और महसूस होने के बीच। जैसे सितंबर की शाम में महसूस होता है। सितंबर में अक्टूबर के आने की दस्तक है और निर्मल वर्मा की कहानी उस पूरी शाम का एक लंबा खिंचा हुआ जीने से परे जाता हुआ संसार। हर एक सांस का पूरा कच्चा चिट्ठा जो इतना विशाल है कि उसके भीतर देर तक तैरना सारा झूठ झाड़ देता है। क्या बचता है? पानी के बाद का गीलापन जो बूंद बूंद होकर सूख रहा है...
बावली पढ़ी और देर तक तोषी के होने को छूता रहा। जितना हाथ नहीं आया उससे ज्यादा छूटता रहा और वही उसका होना है... जैसे कविता पढ़ो तो असल में कुछ हाथ नहीं आता... ठोस से परे कुछ भीतर जाता रहता है... बूंद बूंद कर सांसों से भीतर घुसता हुआ, वैसा ही तोषी की कहानी पढ़कर हुआ। वो खड़ी है और धीमे बहुत धीमे दरवाजा खुलता है, उसके चेहरे पर रोशनी की लकीर खिंचती जाती है, उसके होने को बांधती हुई और लगा मैं इस समय तोषी के चेहरे को छू सकता हूं, सामने होकर... उसकी फटी बड़ी सी आंखें असल में मेरी आंखें हैं, सब कुछ पूरे चरम पर जीते हुए... सुनने की परिभाषा को छूती हुई... सुनना असल में कैसे होता है वो असल में आज जाना है...
क्या मैं इतना साफ जी सकता हूं... डर का इतना उजला रूप... रोशनी में नहाया हुआ, चमचमाता हुआ, जैसे तोषी की अठन्नी जो पानी से भीगकर चमक रही है और जमीन में गिरे होकर भी इसके नाचने का संगीत लगातार बजता रहता है जब तक कि अगली उसांस के साथ मैं अपने कान बंद नहीं कर लेता। क्या हम कभी अपने जीवन के सच से सामना कर पाते हैं? क्या ऐसे ही पल होते हैं जब कहानी अपने आप तुम्हें असल में नंगा कर सामने कर देती है और तुम अपने से बचने के लिए उसी के भीतर छिपना चाहते हो पर असल में अंधेरे में भी सब दिखता है... बस आंखें चाहिए... निर्मल वर्मा वो आंखें देते हैं...
अगर समय हो तो ये कहानियां preisner के संगीत के साथ पढ़ना...
जीवन कितना छोटा है और कला कितनी लंबी... क्या इसमें ऐसा कुछ है जो अर्थ है... मैं नई भाषा तलाश करने के बीच असल में अपने आप को खोज रहा था लेकिन भाषा वही रहती है... बस हमारा उससे संबंध बदल जाता है... क्या मैं पुराने संबंध की दहलीज को लांघ रहा हूं? और नए संबंध को फिरसे शुरू करने से पहले सब साफ कर देना चाहता हूं?