लाल टीन की छत – निर्मल वर्मा
निर्मल वर्मा धुन्ध से उठती धुन मे लिखते है की साहित्य हमें पानी नहीं देता, वह हमें सिर्फ अपनी प्यास का बोध कराता है। जब तुम स्वप्न मे पानी पीते हो, तो जागने पर सहसा एहसास होता है की तुम सचमुच कितने प्यासे थे।
लाल टिन की छत पढ़ते समय उसी प्यास का बोध होता है पर उस प्यास को बुझाने के लिए पानी नहीं मिलता है बस एक स्वप्निल सा एहसास होता है, एक अजीब सा एहसास जिसमे न सुख है, न दुख है, न बेचैनी है, न हताशा है बस एक एहसास है कुछ खाली खाली सा एहसाह।
25 जुलाई 2022 को जयशंकर जी की किताब गोधुली की इबारतें मे लाल टिन की छत के बारे मे पढ़ा था, तब अफसोस हुआ था की निर्मल जी की इतनी अद्भुत रचना अभी भी पढ़ने के लिए बाकी है। अब जब लाल टिन की छत पढ़ चुका हूँ तो पुनः गोधुली की इबारते उलट कर जयशंकर जी की समीक्षा पढ़ रहा हूँ। जयशंकर जी लिखते है की कभी वीर्जीनिया वूल्फ ने शब्द के एकान्त, मौन, रहस्य और इस शब्द की अपनी निजता, सत्ता और पवित्रता को फिक्शन के लिए अत्यंत जरूरी चीज समझा था। उसका एहसास मुझे ‘ लाल टिन की छत ‘ को पढ़ते हुए मिलता रहा है। वे अपनी कृतियों मे शब्द की अनेक संभावनाओं को खोजते रहे। वो अपनी कृतियों में शब्द उसकी वैभवपूर्ण अस्मिता दिलाने के लिए प्रयत्नशील बने रहे और उनका पाठक उनको पढ़ते हुए शब्द की अपनी शक्तियों, संभावनाओं और वासनाओं से रु-ब-रु होता चला जाता है। इस उपन्यास ने मुझे इस बात को समझाना चाहा था की किसी भी यथार्थ के नीचे या पीछे उसी यथार्थ की दूसरी सतहें सांस लेती रहती है, पलटी बढ़ती है और एक अच्छा और सच्चा लेखक यथार्थ के किसी भी आयाम से, यथार्थ के एक भी तत्व से, यथार्थ को किसी भी सतह से लिखते हुए मुँह नहीं चुराता है।
लाल टिन की छत मे काया नाम की लड़की केंद्रीय पात्र है, उसके इर्द गिर्द जिन पात्रों के सहारे एक जादुई संसार की रचना की गयी है उन सभी पात्रों की अपनी अपनी विशेषता है, अकेलापन है, अवसाद है, चाहते है और निजी खालीपन है। पहाड़ी जीवन, अकेलापन, रिश्तों के बीच की दूरी, ज़िंदगी की कश्मकश, कम उम्र की आत्मिक बेचैनी, अनसुलझे रिश्ते, जीवन के जाल मे छटपटाते हुए पात्रों की कहानी है लाल टिन की छत। निर्मल वर्मा को पढ़ते हुए पता चलता है की हमारे अंदर एक आदिम अकेलापन है, अवसाद है, चाहत है, बेचैनी है जिसके बारे मे हम खुद नहीं जानते। वर्मा जी किसी जादूगर की तरह पन्ने दर पन्ने हमे हमारी ही दुनिया के अंदर ले जाते है और चकित करते है, वो बताते है की कैसे हम अपने आप को ही नहीं जानते है। आवाज़े, धूप, पहाड़, चाँद, मौसम, दरवाजो का पल्ला, दरी का दरिया बन जाना, धूप का गरीब हो जाना, तारो का टिमकना और लेटर बॉक्स की अपनी आंखे होना। हम अपनी दैनिक जीवन मे इन चीजों को न देखते है, न सुनते है और ना ही ध्यान देते है।
‘बाहर बरामदे का फर्श गुर्राया था। वह अंधेरे मे चुपचाप गुर्राता रहता था। लकड़ी का फर्श था, जो जरा सा भी दबाव सहन नहीं कर सकता था। यो तो सारी कोठी लकड़ी की बनी थी। जब कभी हवा ऊपर उठती, सब कमरो के ढांचे हिलने लगते और बरामदा – वह हिलता इतना नहीं था, जितना गुर्राता था।’