...आठ भागों में लिखे गए उपन्यास का प्रथम भाग है यह 'नारद की भविष्यवाणी'... कथा का आरंभ भी यहीं से... मथुरा पीड़ित है कंस के अत्याचारों से, नारद भविष्यवाणी करते हैं कि देवकी की आठवीं संतान मथुरा को कंस से मुक्ति दिलाएगी... कृष्ण का जन्म होता है, कहानी को गति मिलती है... आठ भागों में होने से मेरा अनुमान था कि कहानी बहुत ही मंथर गति से चलेगी किन्तु पहले ही भाग में कृष्ण तृणावर्त, पूतना, अघ, बकासुर और कालिय नाग का वध कर चुके हैं, गोवर्धन पूजा से क्रोधित हुए इन्द्र के वर्षा प्रकोप से ब्रजवासियों को बचा चुके हैं, राधा प्रसंग तो है ही और पुस्तक समाप्त होते-होते मथुरा भी बुलाए जा चुके हैं...
आत्मकथा शैली में लिखे इस उपन्यास में सूत्रधार कृष्ण ही हैं और अधिकतम उन्हीं की मनःस्थिति का वर्णन है, उन्हीं का चिंतन है...
कृष्ण जीवन प्रबंधन की पाठशाला हैं, इस पुस्तक के माध्यम से कृष्ण कहते हैं कि मेरा जन्म मनुष्य के रूप में ही हुआ और मनुष्य की तरह ही मैं जिया भी किंतु नारद की भविष्यवाणी ने मुझपर जन्म से ही ईश्वरत्व की परत चढ़ा दी फिर मैंने जो कुछ भी किया उसे चमत्कार कहा गया यद्यपि ऐसा तो कुछ था ही नहीं... कृष्ण कहते हैं कि मेरा जन्म कारा (अंधकार) में हुआ किंतु जन्म के तुरंत पश्चात मैं राका (दूधिया प्रकाश) में आ गया और पूरा जीवन आनंदित ही रहा, यही सबके जीवन का उद्देश्य होना चाहिए, अंधकार से प्रकाश की ओर...
जीवन दर्शन के काफी सूत्रों के साथ किताब कृष्ण जीवन के काफी रहस्य खोलती है, कुछ रहस्य ऐसे भी होंगे जो आपने शायद ही सुने / पढ़े हों.. मैंने तो नहीं ही... जैसे पूतना का वास्तविक नाम महादेवी था और वह कंस के महामंत्री प्रद्योत की धर्मपत्नी थी, मूलतः वह राक्षसी तो नहीं ही थी...
कुल मिलाकर अवश्य पढ़ी जाने वाली किताब है यह, मेरी दृष्टि में काफी सारे best seller से better written किताब, पहले भाग पर प्रतिक्रिया लिखने से पहले इसका दूसरा भाग 'दुरभिसंधि' पढ़ना शुरू कर चुका हूँ मैं...
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इसी किताब से -
"ईश्वर ने मनुष्य को बनाया है या नहीं, यह विवाद का विषय हो सकता है; पर मनुष्य ने ईश्वर को बनाया है, यह निर्विवाद है"
"कैसी विडंबना है कि हर निरंकुश शासक के अत्याचार की पराकाष्ठा एक ईश्वर को जन्म देती है"
"प्रेम करना, प्रेम को विस्तार देना; पर उसके घनत्व में कभी मत उलझना | प्रेम के विस्तार में मोहकता होती है और घनत्व में मोह | विस्तार में स्वतंत्रता होती है, घनत्व में पराधीनता |"
"आश्चर्य है, गीता मेरा प्रतीक नहीं बनी | वंशी मेरा प्रतीक है | गीता में चिंतन है, बौद्धिकता है ; वंशी में हार्दिकता | गीता दर्शन है, वंशी कला | कला जीवन को रस देती है, दर्शन विचार करता है | कला सुन्दरम है, दर्शन सत्यम | सुन्दरम हमारा आकर्षण होता है, सत्यम के प्रति अरुचि भी हो सकती है | वंशीधर, मुरलीधर मेरे नाम हैं पर गीता के साथ मेरा कोई सार्थक नाम नहीं जन्मा |"
"विष में सबकुछ हो सकता है, जीवन की सम्भावना भी हो सकती है, पर ममता नहीं हो सकती"
"हमारे ऐसे कर्तव्य, जो हमारे व्यक्तित्व में समा नहीं पाते, चमत्कार की संज्ञा लेते हैं"
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पढ़िए, पढ़िए, जरूर पढ़िए...
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