शब्दों और ख़यालों का एक अनोखा रिश्ता होता है.. कभी ख्याल कलम से निकल,शब्दों मे बदल जाते हैं और कभी कोई शब्द किसी ख़याल को जन्म देता है. इस अनोखे रिश्ते का मैने अक्सर अवलोकन किया है, और अपनी निजी सोच और कल्पनायों से व्याख्या करने की एक अल्प कोशिश की है.इस संग्रह में जहाँ एक ओर आपको सोचने पर मजबूर करने वाली कविताएँ जैसे “बग़ावती कतरे लहू के”, “24 घंटे” और “कब्रिस्तान” हैं , वहीँ दूसरी ओर आपको भावुक करने वाली रचनायें भी शामिल हैं जैसे “बचपन की शाम”, "जे के की यादें” और “माँ. मेरा ये मानना है की ये कवितायें, ये पंक्तियाँ तो सिर्फ़ शब्दों का मेला हैं, इन्हे अर्थ तो आप जैसे पढ़ने वाले देते हैं. इसी आशा के साथ, पेश करता हूँ- "हसरतें", ज़िंदगी के अलग अलग पहलुओं को दर्शाने वाला कविताओं का संग्रह.