पुस्तक : कर्मभूमि
रचनाकार : प्रेमचंद जी
पात्र : अमरकान्त , सुखदा, सलीम, समरकान्त, नैना, सकीना, रेणुकादेवी, शान्तिकुमार, पठानिन, मुन्नी, काले खां
उपन्यास का सारांश : संसार में बाप और बेटे के बीच का द्वंद और फिर दोनों को समय के साथ बदलते देखने का अनुभव वाह ! इस उपन्यास के बारे में लिखना आसां नहीं है । यह एक परिवार की कहानी है जहाँ सिद्धान्तों को लेकर बाप बेटे, पत्नी पत्नी आपस में टकराते रहते हैं पर दिल में सभी ने एक अनमोल मोती छुपा कर रखा होता है । यहाँ क़दम क़दम पर लोग एक दूसरे के विरुद्ध जा कर बोलते हैं, लड़ते हैं और फिर भी उनका लक्ष्य एक होता है । एक मंज़िल होना और अलग अलग रास्तों का चयन करना सभी पात्रों द्वारा बहुत सरल तरीक़े से दिखाया है "प्रेमचन्द" जी ने । उपन्यास एक समाजिक मुद्दे पर लिखा गया है और साथ में पारिवारिक दिक़्क़तों को हमारे सामने दर्शाया गया है । कहानी है अमरकान्त की जो धन को किसी वस्तु मात्र से ज़्यादा नहीं समझता , सुखदा की जो अमरकान्त की पत्नी है जिनके आदर्श अमरकान्त के हिसाब से उनसे बहुत अलग हैं , नैना की जो सब कुछ हार जाती है यहाँ तक की अपना जीवन, सलीम और अमरकान्त के दोस्ती की , मुन्नी की और पठानिन कि । हर किरदार इतना शश्क्त , इतना स्वाभिमानी, इतना गौरवशाली कि ये तह करना मुश्किल हो जाये ग़लत कौन सही कौन ?
कहानी : अमरकान्त को बचपन से ही माँ का स्नेह नहीं मिला । उसके पिता से उसकी बनती नहीं और उसकी पत्नी में उसे स्नेह कम रौब ज़्यादा नज़र आता है । सलीम उसके बचपन का दोस्त । समरकान्त चाहते हैं उनका बेटा उनके बनाये व्यापार को आगे ले जाये पर वो समाज में रह कर समाज के लिए काम करना चाहते हैं । जब अमरकांत डॉक्टर शान्ति कुमार के सेवाश्रम में काम करने लगता है तो उससे निराश होकर समरकान्त उसे घर से अलग कर देते हैं । अमरकान्त अपने परिवार ,बहन नैना और बूढ़ी नौकरानी सिल्लो के साथ दस रूपये किराए के मकान में रहने लगता है । वह खादी बेचकर तथा सुखदा बालिका विद्यालय में नौकरी करके घर का खर्चा चलाने लगते हैं । नैना का विवाह रईस लाला धनी राम की पुत्र मनीराम से होता हैजोव्यसनी तथादुराचरी है । गृहस्थी के सुख से वंचित नैना समाज सेवा में लगा जाती है । निर्धनों को जमीन औए मकान देने के लिए आयोजित आन्दोलन का नेतृत्व करते हुए अपने पति की गोली का शिकार हो जाती है । मुन्नी का बलात्कार होना उसके लिए सुखदा का लड़ना । अमरकान्त का सकीना की और एक खिंचाव महसूस करना अंततः उसका घर को छोड़ कर चला जाना और लगातार समाज के हित के बारे में सोचना और कार्यरत रहना । ठाकुरद्वारे में चमारों को जाने की इज़्ज़ाज़त ना थी और सुखदा ने यहाँ इसका विरोध करते हुए इस संघर्ष में हिस्सा लिया । वो जन के लिए देवी बन गयी । मुन्नी का परिवार उसके पति और बेटे दोनों मौत के घाट उतर गए । फ़िर जीवन में एक ऐसा मोड़ आया जैसा देश में क्रांति के समय आया था । हर कोई अपने प्रांत से लड़ रहा था ग़लत के ख़िलाफ़, सरकार के विरुद्ध और ऐसा ही करते मिले अमरकान्त, समरकान्त, नैना, सुखदा, सलीम , शान्तिकुमार और अंततः सब मिलते हैं जेल में और उनकी मेहनत रंग लाती है ।
उपन्यास के कुछ संवाद जो दिल में घर कर जाते हैं और उपन्यास की भाषा शैली से आपको पता लगेगा "प्रेमचंद" जी सिर्फ़ एक हिंदी उपन्यासकार न थे अपितु उर्दू में उनकी पकड़ बहुत शानदार थी । कुछ पंक्तियां जो जीवन के सत्य को हमारे सामने रखती है पेश करना चाहूँगा
1-" सुखिदा और नैना दोनों उसके अनंतस्थल के दो कूल
थ। सुखिदा ऊंची, दुगर्यम और विशाल थी। लहरें उसके चरणों ही तक पहुंचकर रह जाती थीं। नैना समतल, सुलभ और समीप। वायु का थोड़ा वेग पाकर भी लहरें उसके ममर्यस्थल तक पहुँचती थी" ।
2- "रमणी की नम्रता और सलज्ज अननुरोधा का स्वाद पा जाने के बाद अनब सुखिदा की प्रितभा और गिरमा उसे बोझ-सी लगती थी। वहां हरे-भरे पत्तों में रूखिी-सूखिी सामग्री थी यहां सोने-चांदी के थालों में नाना व्यंजन सजे हुए थ। वहां सरल स्नेह था, यहां गवर्य का दिखिावा था। वह सरल स्नेह का प्रसाद उसे अनपनी ओर खिींचता था, यह अनमीरी ठाट अनपनी ओर से हटाता था।
3- डरना मनुष्य के लिये स्वाभािवक है जिसमें पुरुषाथर्य है, ज्ञान है, बल है, वह बाधाआं को तुच्छ समझ सकता है। जिसके पास व्यंजनों से भरा हुआ थाल है, वह एक टुकड़ा कुत्तो के सामने फेंक सकता है,जिसके पास एक ही टुकड़ा हो वह उसी से चिमटेगा ।
©® तरुण पाण्डेय