'कामायनी' जयशंकर प्रसाद जी का सर्वश्रेष्ठ काव्य है। 1935 का यह काव्य भाव, प्रज्ञा, प्रेम और सौंदर्य की प्रेरणा से रचित है। 'कामायनी' में मानव की चित्तवृत्तियों का क्रमिक विकास है। इसे विभिन्न पाठ द्वारा व्यक्त किया गया है जैसे - चिंता, आशा, श्रद्धा, काम, वासना, लज्जा, कर्म, ईर्ष्या, इड़ा, स्वप्न, संघर्ष, निर्वेद, दर्शन, रहस्य तथा आनंद।
अपने अंतर्विरोधों से संतप्त, स्वयं दुखी होकर भी परपीड़न के लिए व्याकुल, भाव का तिरस्कार कर बुद्धि के रास्ते पर झंझा की तरह निकल पड़ने वाले आज के मानव को प्रसाद जी समरसता के साथ आनंद की ओर अग्रसर करते हैं। वहां भाव और बुद्धि, अधिकार और अधिकारी, स्त्री और पुरुष तथा जीवन के हर क्षेत्र में समरसता का द्वार खुलता है।
काव्य की भाषा क्लिष्ट है। पाठकों की हिंदी बहुत अच्छी होनी अपेक्षित है। 'कामायनी' में प्रसाद जी ने मानव के आंतरिक और बाह्य द्वंदों के भीतर से उसका विकास दिखाया है। मानव के द्वंदों का निराकरण समरसता करती है। मानव के जीवन का उद्देश्य संघर्ष नहीं आनंद है। इसी आशय को समेटे मनु, श्रद्धा और इड़ा (बुद्धि) पर केंद्रित यह काव्य छायावाद की ही नहीं, सम्पूर्ण हिंदी काव्य की अनुपम उपलब्धि है।