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मैंने और अधिक उत्साह से बोलना शुरू किया, ‘‘भाईसाहब, मैं या मेरे जैसे इस क्षेत्र के पच्चीस-तीस हजार लोग लामचंद से प्रेम करते हैं, उनकी लालबत्ती से नहीं।’’ मेरी बात सुनकर उनके चेहरे पर एक विवशता भरी मुसकराहट आई, वे बहुत धीमे स्वर में बोले, ‘‘प्लेलना (प्रेरणा) की समाप्ति ही प्लतालना (प्रतारणा) है।’’ मैं आश्चर्यचकित था, लामचंद पुनः ‘र’ को ‘ल’ बोलने लगे थे। इस अप्रत्याशित परिवर्तन को देखकर मैं दंग रह गया। वे अब बूढ़े भी दिखने लगे थे। बोले, ‘‘इनसान की इच्छा पूलती (पूर्ति) होना ही स्वल्ग (स्वर्ग) है, औल उसकी इच्छा का पूला (पूरा) न होना नलक (नरक)। स्वल्ग-नल्क मलने (मरने) के बाद नहीं, जीते जी ही मिलता है।’’मैंने पूछा, ‘‘फिर देशभक्&#
विशुद्ध हिंदी में रचा गया एक चुनिंदा व्यंग्य संग्रह!
Absolutely loved reading these short laughter bursts! These 27 short stories/episodes are full of satire. The way character names are formed due to their intrinsic habits or qualities is outright funny. Examples - Laamchand ki Laalbatti (a stammering of Ramchand), Gappi aur Pappi (derived from Gajendra Prasad Pichhodi - GPP and Pushpendra Prasad Pichhodi - PPP), Bhakk Narayan Maharaaj, Bhaggu Patel, Aatmaram Vigyaani, Ram Rava Lapta Maharaaj, Bispaat Gudhaulia, Gunchai, Dhappu... i'll stop here :)
Then there are lingual dialects used in conversations which make it so funny to read. For instance - आगे चलबे के लाने तुमे पैले पीछे चलबो सीखने पड़े है। हम तुमाई कदर करत हैं। हमाए नाम पे तुमने कोई घोषणा कर दई तो बा हमाई जुम्मेबारी हो जात है कि ओ खों पूरी करें। सन 14 के पहले आदमी मोन-मोन चिल्ल्याउत हतो, अब नमो-नमो कह रओ है। निबुआ (नींबू) सो मों (मुँह) मीड़ देहैं , सो बीजा से दाँत बाहर निकर आ है!
Even the themes in satire are intelligently placed. Gandhiji's ghost visits on 2nd Oct. Conversation between him and common man. G: करघे का इस्तेमाल करते हो? चरखा चलता है? C: चरखा तो हमारा मूल मंत्र है, पूरा देश ही मन लगाकर चर 'खा' रहा है। G: और खादी? खादी का क्या हुआ? C: बापू आजादी के बाद हमने खादी के नहीं, आबादी के प्रोडक्शन पर ज्यादा ध्यान दिया है। G: रिश्वत लेना अन्याय है, तुम लोग उसको भी भूल गए होगे? C: बिलकुल नहीं, रिश्वत लेना 'अन्य-आय' है। तुम यहाँ कैसे बापू ? G: आज 2 October है। मेरा जन्मदिन है। C: धत्त तेरे की मैं तो भूल ही गया! बोलो तुम्हारी क्या सेवा करुँ ? आज तो कहीं मिलेगी भी नहीं , वरना खूब धमाल करते। वैसे जुगाड़ है - तुम्हारा फोटो मेरी जेब में है, उसको खाकी भण्डार में दे दूँ तो नदियां बह जाएँगी कसम से...
Each story is sprinkled with a liitle hand made illustration, and a doha. तुलसी बिरछा बाग़ के सिंचत से कुम्हलायें। राम भरोसे जो रहें वे पर्वत पे हरियाएँ।।
Quoting another part which made me laugh out loud! चर्चा की शुरुआत ही वे 'अबे तुम चूकीया हो' वाले विस्फोटक वाक्य से करते, जिसे सुनते ही सामनेवाले की चूलें हिल जातीं। भाईसाहब के अनुसार, जो ऐन मौके पर चूक जाए वह चूकीया। आठ प्रकार के चूकीये होते हैं - अक्ल चूकीया, शक्ल चूकीया, फसल चूकीया, असल चूकिया, विकट चूकीया, निकट चूकीया, चमक चूकीया, चटक चूकीया। तुममें साले आठों प्रकार हैं!
This is a very nice debut by Ashutosh Rana ji. Recommended for a funny contemporary Hindi read. At the time of posting this review, the ebook is available in prime free reading, Kindle Unlimited, as well as for INR 15/-
I was already a fan of Ashutosh Rana for his acting, however, this book made me his fan as a writer, the writing is lucid ( maybe not for all owing to the kind of Hindi used), the character feel like people one would meet in real life, the dialogues gave me a homely feel, the stories made me contemplate my opinions, it made me chuckle, made me laugh out loud and increased the respect I had for the author. Had a great time reading it, would definitely recommend it.
मेरा हिंदी साहित्य में रुचि होना, और मेरा स्वयं नाम आशुतोष होना – इतना काफ़ी था मेरे मित्र के लिए जिन्होंने मुझे आशुतोष राणा की यह बेहतरीन रचना ‘मौन मुस्कार की मार’ एक गिफ़्ट रूप में दी।
मेरी जानकारी में आशुतोष जी एक उत्कृष्ट कलाकार और बुद्धिजीवी तो थे ही, पर हिंदी भाषा और व्यंग्य पर इतनी अच्छी पकड़ रखते हैं, यह नहीं पता था।
मौन मुस्कार की मार कुल मिलकर 27 व्यंग्यों का संग्रह है। इनमे सबसे अच्छी बात है कि ये आज की कहानियाँ हैं, और आज की ही भाषा में लिखी गयीं हैं। इन्हें पढ़ने और रस लेने के लिए बस आपको आज में उपस्थित और जाग्रत होने की ज़रूरत है, और कुछ नहीं।
‘आत्माराम विज्ञानी’ इस व्यंग्य-संग्रह से मेरी पसंदीदा रचना है। वैसे तो आप इसे पढ़ कर लोट-पोट हो जाएँगे, पर इसमें आज के समाज की एक बहुत गहरी समीक्षा छुपी हुई है। जिस कटाक्ष से इस कहानी में आज के ‘ट्रोल’ कल्चर का विवरण किया गया है, वो बिलकुल परसाई जी की याद दिलाता है।
“मरी हुई आत्माओं को ढूँढना बड़ा आसान होता है। अमूमन उनका अड्डा क़ब्रिस्तान या शमशान होता है, और ये किसी भी गाँव शहर क़स्बे में सीमित संख्या में होते हैं। लेकिन जीवित आत्माओं को ढूँढना बिलकुल समुद्र में गिरे हुए सुई के पैकेट को ढूँढने जैसा होता है। … जिनके पीछे इसे छोड़ा गया है इधर उन्ने कुछ लिखा और अगले ही पल ये उनपे झूम जाता है, और आठ दस इसके जैसे ही उस भले मानस को घेर लेते हैं,उसकी ख़ूब लानत मलानत करते हैं, उसके कपड़े फाड़ डालते हैं, उसे नरकीय यातना देते हैं और उस भले आदमी को खदेड़ के ही दम लेते हैं, जिसे इनकी भाषा में ट्रोल कहा जाता है। मृत आत्माएँ तो अपनी अतृप्त इच्छा की पूर्ति के लिए किसी जीवित व्यक्ति को अपना साधन बनाती हैं, उनकी एक निश्चित माँग होती है इसलिए उनसे निपटना आसान है। किंतु ये !! अतृप्त नहीं-अशांत आत्माएँ हैं। जिनकी कोई माँग ही नहीं होती सिवाय अशांति के। जो व्यक्ति इनके रडार में है उसे पीढ़ा पहुँचना ही इनका प्रमुख धर्म है।“
चूँकि मैं बुंदेलखंड से सम्बंध रखता हूँ, तो कुछ कहानियों में बुंदेलखंडी के प्रयोग को देखकर मेरा आनंद चरम सीमा पर था। आजकल हिंदी ही कहाँ पढ़ने मिलती है, बुंदेलखंडी तो दूर की बात है। किसी कहानी में दमोह के घंटाघर का भी ज़िक्र था जिसे पढ़कर मेरा मन अपने ननिहाल के तरह गोता लगाते हुए चला गया। मुझे नहीं लगता की बुंदेलखंडी और दमोह के बारे में पढ़ने की ख़ुशी मुझे जल्द ही किसी और पुस्तक में मिलेगी।
हालाँकि इस संग्रह की सारी कहानियाँ उतनी गूढ़ और प्रभावपूर्ण नहीं हैं, लेकिन फिर भी, पहली कोशिश के हिसाब से पूरा संग्रह अत्यंत सराहनीय है। आशुतोष जी की अगली रचना पढ़ने का भी बहुत इंतज़ार रहेगा।
Ashutosh Rana being a profound literarian of hindi language has very well written this ,with subtly yet notedly putting sarcasm in tragic humor. It very well express the good and bad of the society without actually mentioning it.
Celebrated actor Ashutosh Rana's debut novel "Maun Muskaan Ki Maar" is a collection of short stories based on his life experiences. Most of the characters in the stories are from Gadarwada, a small city in Madhya Pradesh, India. The author used "Sarcasm" as the main theme of his stories and described the world we live in and the characters we meet on daily basis in a comical way. His way of writing is old-school and shows the influence of Hindi Literature. A few of the stories I really liked are - "Lamchand Ki Lalbatti", "Abhasi Kranti", "Laathi Gali", "Bispad Gudholiya", "Dhappu" and "Shortcut/cut short". The author has great potential. Looking forward to reading more of his works.
पुस्तक की भाषा अच्छी थी और २-३ कहानियाँ पढ़ के बहुत हसीं आई पर कोई कोई कहानी बिलकुल पसंद नहीं आई |आशुतोष जी की दूसरी पुस्तक राम राज्य भी पढ़ेंगे जो की एक उपन्यास है और संभवतः वो हमें ज्यादा बांध कर रख पाये |
Perfect fit for the contemporary human society and geopolitical scenario. The author has easily conveyed his message through tons of satire. I personally found Chapters 2,3,5,10,11,14,15,18,20,21,22,25,26 most appealing to me.
मैं बड़े दिनों से अपने सामान्य से रीडिंग पैटर्न मैं विविधता लाने के लिए कोई अच्छी हिंदी की किताब खोज रहा था. यह छोटी व्यंगात्मक कहानियों की किताब ने यह काम बहुत ही बखूभी निभाया। मजेदार अंदाज़ मैं लिखी गयी यह किताब पड़ने वाले को बाँधे रखती है। इसमें आज के कीबोर्ड योद्धाओं, स्वघोषित राष्ट्रवादियों, बुद्धिजीवियों और पराक्रमी राजनेताओँ पे किया गया कटाक्ष हास्यप्रद है। लेकिन अच्छी बात यह है यह सब सम्मानित व्यक्ति इस किताब को तो पड़ने से रहे, इसलिए हमारे लेखक जी उनकी तरफ की जा सकती प्रक्रियाओं से सुरक्षित हैं। वरना पता नहीं कौन इनकी नाक काट ले जाता, या इनकी अगली सिनेमा को आने से पहले ही रोक देता. And for those who are more comfortable in english: I had been looking for a good Hindi book to give a break to my usual reading pattern. This collection of short sarcastic stories came handy to break that monotonicity of reading I had been doing. The Tongue in cheek writing in the book keeps reader super engaged. The sarcasm used in the book towards today’s keyboard warriors, self proclaimed nationalists, intellectuals, and revolutionary politicians is humorous. Good thing is that these respected personalities won’t read this book, so our author seems to be safe from the backlash.
इस किताब को पढ़ने से पूर्व आशुतोष राणा जी को एक उत्कृष्ट अभिनेता के रूप में ही देखा और जाना था। एक काफी पुराने मित्र (लंगोटिया यार नहीं कह सकता, क्योंकि तब तो लंगोट पहनना भी प्रारंभ नहीं किया था) ने उनकी इस कृति को पढ़ने का सुझाव कुछ माह पूर्व दिया था और ये कहना अनुचित नहीं होगा की इसे पढ़ने के बाद आशुतोष जी को देखने का नजरिया पूर्ण रूप से परिवर्तित हो जाता है। यदि ४-५ अध्यायों को छोड़ दिया जाए किताब प्रारंभ से लेकर अंत तक बेहद रोचक है, आशुतोष जी की सरल एवं व्यंगात्मक लेखन शैली आपको बांधे रखती है। यदि आप इन व्यंग निबंधों को बुद्धिजीवियों के आस-पास पढ़ रहे हैं तो संभवतः ये उन्हें आपके बावले होने का संकेत कर सकती हैं, वरना कौन अकेले किताब में माथा गड़ाए हँसता है? संभव है कि यदि आप एक ग्रामीण पृष्ठभूमि से संबंध नहीं रखते हैं तो आपको ये रचनाएं उतनी ना भाएं, और ना ही आपके बावले होने का प्रमाण बुद्धिजीवियों को दे पाएं! डॉ. सुरेश आचार्य ने इस पुस्तक की भूमिका में सही कहा है कि "इन व्यंग निबंधों में आशुतोष राणा की सूक्ष्म निरीक्षण शक्ति और हास्य की प्रवृति के साथ ही साहित्यिक विनोद भी दिखाई देता है"।
साल की शुरुआत में मैंने कहा था ना कि अब से हिंदी साहित्य पढ़ने की तरफ़ कदम बढ़ाया जायेगा। उसी संकल्प को ध्यान में रखते हुए मेरे एक प्रिय मित्र ने यह किताब मुझे बताई।
आशुतोष राणा जी एक बेहतरीन व्यक्तिव एवं कलाकार तो हैं ही, परंतु उनकी साहित्य और व्यंग्य पर इतनी अच्छी पकड़ है ये इस किताब को पढ़ के मालूम हुआ।
मैं मध्य प्रदेश से संबंध रखती हूं और राणा जी स्वयं गाडरवारा के हैं और तो और उनकी लगभग सभी कहानियां बुंदेलखंड से जुड़ी हुई हैं, इसलिए एक अलग ही लगाव महसूस हुआ। कहीं कहीं पर थोड़ी बुंदेलखंडी पढ़ कर अच्छा लगा।
किताब में कुल 27 छोटी छोटी कहानियां हैं। हर कहानी उनके व्यक्तिगत जीवन से प्रेरित है। और हर एक कहानी आपको गुदगुदाने के साथ साथ सोचने पर मजबूर कर देगी । इनके व्यंग्य की तो बात ही अलग है। ऐसा धारदार व्यंग्य जो समाज की सच्चाई से अवगत कराता है। हंसी मज़ाक के रूप में उन्होंने हर कहानी के अंत में काफी गूढ़ बातें भी लिखी हैं।
अगर आपको हिंदी किताबें पढ़ने का मन हो तो इसे ज़रूर पढ़ सकते हैं। राणा जी आपको जरा भी हताश नहीं होने देंगे।
मौन मुस्कान की मार अपने शीर्षक के अनुरूप है। यह व्यंग्य विशेषकर राजनीतिक व्यंग्य से भरा है और इसे समझने के लिए बहुत प्रयास की आवश्यकता है। यही बात इस पुस्तक को अद्भुत बनाती है। व्यंग्य सुंदर है और हास्य अद्भुत । यह पुस्तक लोगों के स्थानीय जीवन के करीब है। ऐसा महसूस होता है मानो हम अपने दरवाजे के बाहर सड़क पर होने वाली घटनाओं को देख सकते हैं। यह पुस्तक हिंदी के साथ-साथ बुन्देलखंडी में भी समृद्ध है।
किताब की शुरुआत सामान्य हास्य से होती है लेकिन धीरे-धीरे यह जटिल मामलों की ओर बढ़ती है। कुछ कहानियाँ ऐसी होती हैं जो शायद आपको बाँध नहीं पातीं लेकिन कुछ कहानियाँ ऐसी भी होती हैं जो आपको उन पर चर्चा करने पर मजबूर कर देती हैं।
हिंदी लेखन में व्यंग्य की तलाश करने वाले लोगों के लिए अवश्य पढ़ी जाने वाली पुस्तक।
आशुतोष राणा जी का कहानी-संग्रह: मौन मुस्कान की मार एक व्यंग्य रचना है, जिसमें हर कहानी किसी (या किन्हीं) किरदार पर आधारित है और उस किरदार के ज़रिये समाज और व्यक्ति-विशेष की विशेषताओं का विश्लेषण करती है..
भाषा उत्कृष्ट है इसमें कोई संदेह नहीं, कटाक्ष भी अच्छा है इसमें भी दोराय नहीं, और पात्र भी सजीव और सहज हैं जैसे गांव-देहातों-कस्बों में अक्सर हुआ करते हैं.. लेकिन सब कुछ होते हुए भी राणा जी परसाई जी या श्रीलाल शुक्ल जी के समकक्ष नहीं आ पाए..
इसका बिलकुल ये मतलब नहीं है कि रचना अच्छी नहीं है.. कहानियां बहुत अच्छी हैं, और जल्द ही आशुतोष जी (जो कि एक मंझे हुए कलाकार भी हैं) का काव्य संग्रह भी पढ़ा जायेगा.. शेष शुभ!
It is a satirical novel that cleverly mocks various aspects of society. Through humorous anecdotes, the book sheds light on serious social issues, leaving readers both entertained and thoughtful. It's a witty commentary on human nature and societal norms, making it a must-read for those who appreciate satire and social commentary.
Beautifully written... awesome hindi and related languages.. i am your double fan today Ranaji.. good actor.. good character and now good writer... hats off sirji
आ जिंदगी में कुछ इस तरह की तेरे आने की खबर न मुझे ओर में अंदर ही अन्दर मुस्कुराहु, न जाने किन सदियों में में खुद से मुस्कराया था अब तो कुछ याद ही न रहता। बस एक तेरा ििइंतजार रहता है न जाने वो आज कल आज वाला दिन कब आज बन जायेगा। बस तेरा ही इन्तजार रहता है।
This entire review has been hidden because of spoilers.
Clearly one of the best satire on the current political and social media situations prevalent in the society, not just in the country but around the world. A nice dig at Whatsapp babas, bhakts, Chai-walas and Social Media Sellibrities.
It's a collection of multiple stories which are wise, funny and serious. My personal favourite is 'Bispad'. There are many others which crack you up. It's really refreshing to read such kind of Hindi vocabulary which is rarely seen these days.
As subtly interesting as Ashutosh Rana could be. How a normal conversation or a passing thought makes you connect with your roots essentially and effortlessly. Leisure read. Must read for especially Hindi speakers.
बहुत दिनों के बाद कुछ अच्छे व्यंग्य पढ़ने को मिले। व्यक्ति, समाज और देश के विभिन्न परिस्थितियों पर मज़ेदार और ज़मीनी कथानक । पढ़कर बहुत अच्छा लगा। आशीतोष जी आपका आभार, अभिनय के साथ इस कला में भी आप निपुण है । सधन्यवाद 🙏
This book is a compilation of stories by the author Ashutosh rana.its so surprising and wonderful how Ashutosh sir emerged as a great writer. Most of the stories are satirical with humour content in it.