Set in 1930s India, this book details the political climate of the country by the story of Ramnath Tiwari and his three sons. His three sons and he himself represent the 4 political idealogies - the congress/non violence, the revolutionary terrorism, communism and the imperialism. By means of dialogues between different characters the writer argues to find the philosophy which would be beneficiary for the human civilization in the long run.
The story is set in 1930s India and is predominantly a political novel. We have communists, gandhians, capitalists and revolutionary terrorists who are constantly in discussion with each other to figure out the way forward for humanity. Ramnath, the father, represent the authority or capitalism, his sons represent the congress, revolutionaries and communism. Book has lengthy but illuminating discussions on the feasability of each idealogy and how relevant each is to India. Too much discussion does tend to give an artificial look to the characters. Rather than human beings, they rather seem like Internet bots which are ready to rattle on pouncing the keyword.
For the revolutionary terrorism, Verma fails to give any new insights into the working of revolutionaries, he relies mostly on hearsay and cliches. We have a train robbery identical to Kakori train robbery and even have one character (Prabhakar) who is clear caricature of Chandrashekhar Azad. This group has clearly been given less intellectual importance. They stand out as the people who have lost faith in everything, and have resorted to this form of movement not by reasoning but as an impulsive knee jerk reaction.
Mostly the discussions and arguments are between the non violent means and the communist philosophy. The author has tried his best to remain neutral and has given some good points to even the communist philosophy but his sympathies are definitely with the Gandhian philosophy. Gandhian philosophy is obviously the more morally upright and most ethically strong. Communists throughout the book tend to idolize Russia with a blind faith reserved for religious zealots.
Story is almost non existent, but that is almost always with Verma's novels he focuses little on story development and more on the dialogues of the characters.
PS horrible editing throughout the book. Name of characters are changed mid way a dialogue without any warning. Even the synopsis behind the front cover has the father's name swapped with the son. The character Prabhanath passes the MA examination and announces to another that he did MSc.
यह उपन्यास अवध (आज का उत्तर प्रदेश) के एक छोटे से ताल्लुकेदार रामनाथ तिवारी, उनके तीन बेटों और उन चारों के अलग अलग राजनीतिक विचारों के माध्यम से 1930 के दशक के भारत की स्थिति बयान करती है। प्रमुख पात्रों के माध्यम से लेखक उस दौर के प्रचलित सिद्धान्त - कांग्रेस/अहिंसा, क्रांतिकारी/ आतंकवाद, साम्यवाद, साम्राज्यवाद और यथास्थितिवाद की विवेचना करते हें।
यह नमक सत्याग्रह का समय था और इसलिए बड़े बदलाव और उम्मीदों का दौर था। हालांकि देश की मौजूदा स्थिति और आने वाले समय कि परिस्थितियों की संभावना पर सभी चार प्रमुख पात्रों की अपनी राय और परिप्रेक्ष्य है, लेकिन रामनाथ तिवारी प्रथम दृष्टया अपने अधिक शिक्षित बेटों की तुलना में यथार्थवादी प्रतीत होते हैं । एक बात जो रामनाथ तिवारी अपने बड़े बेटे से बात करने के दौरान कहते हें वह बार-बार पढ़ने लायक है, “तुमने इतना अध्ययन किया, तुमने वकालत पास की लेकिन तुम्हें अक्ल नहीं आई। यह याद रखना, कि गुलामी गुलामी ही है, चाहे वह विदेशियों कि हो चाहे वह अपने देशवालों कि हो। विदेशियों कि ग़ुलामी से लोगों को छुड़ाने कि कोशिश करने वाली संस्था देशवासियों कि ग़ुलामी में लोगों को बंधे रहने देगी – क्या तुम्हें इस पर यकीन है?” देश की स्वतन्त्रता के पश्चात यह बयान सही साबित हुआ जब शुरू में रियासतों को भारत में विलय कर उनका स्वतंत्र अस्तित्व समाप्त कर दिया गया, जमींदारी प्रथा समाप्त कर दी गयी और अंत में भूतपूर्व राजाओं को दिया जाने वाला प्रिवी पर्स भी वापस ले लिया गया। इस प्रकार कानून की नजरों में सभी को बराबरी पर ला दिया गया।
पश्च दृष्टि (Hind Sight) के लाभ के साथ हम जानते है कौन सा विश्वास जीता । हालांकि यह देखते हुए कि उपन्यास 1930 के दशक में आधारित है हम नहीं जानते कि कौन सा विश्वास जीतने की संभावना है । यहां महत्वपूर्ण बात यह है कि कैसे विभिन्न पात्रों ने अपने विश्वासों, परीक्षणों और क्लेशों का सामना किया और अंततः उन्होने अपने चुने मार्ग पर चलने के कारण क्या दंड या पुरस्कार प्राप्त किया।
करीब 400 पन्नों के कारण, पुस्तक कुछ लोगों को ज्यादा बड़ी / मोटी लग सकती है। कुछ स्थानों पर आपको लगता है कि थोड़े अथिक संपादन के साथ इसे और अधिक कॉम्पैक्ट बनाया जा सकता था। संभवतः इस पुस्तक के लिए उस समय प्रचलित विभिन्न दर्शन पर एक ग्रंथ होने का मतलब नहीं था । हालांकि दूसरा पहलू यह है कि, पुस्तक का आकार लेखक को प्रत्येक चरित्र को विकसित करने की अनुमति देता है और पाठक को पात्रों, उनके कार्यों और उनके कार्यों के पीछे के कारणों के साथ पहचान करने में सक्षम बनाता है।
हमें लेखक यह भी बताने कि कोशिश करते हें कि क्यों भारत इतने वर्षों तक ग़ुलाम रहा। उमानाथ (प्रमुख पात्र रामनाथ तिवारी के मँझले पुत्र) कहते हें, “.....हम लोग शुरू से आखिर तक – सब के सब बहुत बड़े कायर हैं। अगर कायर न होते तो भला ये लोग ग़ुलामी करते होते? और इतने बड़े कायर होते हुए भी यह लोग जरा – जरा सी बात पर लड़ पड़ते हैं, हत्या कर डालते हैं, फांसी चढ़ जाते हैं।........हम हिंदुस्तानियों में पशुता पूरी तरह भरी हुई है। इसी पशुता से प्रेरित हो कर हम सब यह कर डालते हैं। लेकिन जब मनुष्यता प्रदर्शित करनी होती है, जब साहस की आवश्यकता होती है तभी हम हिंदुस्तानी अपने को बहुत गिरा हुआ पाते हैं।"
यह बिल्कुल स्पष्ट है कि लेखक की सहानुभूति कांग्रेस/गांधी जी के दर्शन से है । यद्यपि कई स्थानों पर वह पात्रों के माध्यम से अपना दृढ़ विश्वास व्यक्त करते हैं कि गांधी जी जरूर एक महान आत्मा हैं, यहां तक कि संभवतः एक अवतार भी परंतु आम जनता अहिंसा के मार्ग पर कब तक और कैसे बनी रह सकती है जब हिंसा उसकी स्वाभाविक प्रवृत्ति है, यह संशय बरकरार था।
यह पुस्तक बहुत विस्तार से बताता है कि कैसे विभिन्न प्रतिस्पर्धी सिद्धांतों की उपस्थिति में, एक विशेष सिद्धांत को गति मिलती है और इस प्रकार औरों की तुलना में अधिक समर्थन प्राप्त होता है। आप यह भी कुछ हद तक समझ सकते हें कि समाज का एक आभिजात्य/ धनाढ्य / सफल वर्ग जिनके पास खोने को सबकुछ था अगर उनका दाव गलत जाता, वो फिर भी कांग्रेस के साथ संरेखित करके साम्राज्य का विरोध करने का फैसला करते हें । या संभवतः उन लोगों के लिए यह कोई दांव नहीं था और उन्होने सच में अंतरात्मा कि आवाज़ सुनी थी।
यदि आप गाँव और शहर, शिक्षित और अशिक्षित, तथाकथित ऊंची और नीची जाति, हिन्दू – गैर हिन्दू और उन सबके सोचने का तरीका और तरीके के पीछे का कारण समझना चाहते हें, तो आपको यह पुस्तक अवश्य पढ़नी चाहिए।
जैसा की कालजयी कृतियों के साथ होता रहा है कि आप उन्हे चाहे दशकों बाद देखें/ पढ़ें/ सुनें, वो तब भी उतने ही प्रासंगिक लगते हें जितने वे तब थे जब उनकी रचना कि गयी थी। भगवतीचरण वर्मा की “टेढ़े मेढ़े रास्ते” हिन्दी कथा साहित्य के श्रेष्ठतम उपन्यासों में से एक है।