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लाल लकीर

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बेहद संवेदनशील कहानी जिसमें आम लोग एक ऐसी त्रासदी में फँसे हैं जिसके लिये वह खुद जिम्मेदार नहीं हैं लेकिन जिससे बचने का कोई रास्ता भी उनके पास नहीं है। मध्य भारत में माओवादियों और पुलिस की बंदूक से बरसती गोलियाँ, नक्सलियों के जन अदालत, सरकार के बनाये सशस्त्र आरक्षक और 'विकास' का बुलडोज़र, सब कुछ गरीबों को पीसता दिखता है। ऐसे में इस उपन्यास की प्रमुख किरदार भीमे कुंजाम हमारे सामने मानवीय गरिमा की मिसाल है - जो विचारधाराओं से पटे समाज में न्याय के लिए आवाज़ बुलंद करती है।

'लाल लकीर' आज के दौर का उपन्यास है। जिसे पढ़ते हुए आप बस्तर में बड़े होने लगते हैं। गंगा और राजू की तरह पुलिस से भागते हुए गोलियों के शिकार हो जाते हैं। हेड़िया कुंजाम की तरह मारे जाते हैं और भीमे की तरह रामदेव से प्रेम करने लगते हैं। आप बस्तर नहीं गए होंगे। 'लाल लकीर' आपको बस्तर ले जाती है। किताब की शक्ल में यह एक फ़िल्म है। बस्तर में जंग की लकीरों के बीच एक लड़की की मोहब्बत और हौसले की दास्तान। यह कहानी किसी मूवी की तरह आँखों के सामने दौड़ती है। इतनी गहरी खिंच गई है कि इसके आर-पार नक्सल और पुलिस एक जैसे लगते हैं।

319 pages, Paperback

Published January 1, 2016

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About the author

Hridayesh Joshi

6 books4 followers
Hridayesh Joshi is senior editor, National Affairs, NDTV India

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Displaying 1 - 3 of 3 reviews
Profile Image for Vaibhav.
1 review2 followers
March 12, 2019
हम उस दौर में रह रहे है ,जहाँ सारी बहस -विवाद न्यूज़ चैनलों के स्टूडियो में होने लगी है ,और उससे भी बड़ी बहस इस बात को लेकर है ,कि कौन सा न्यूज़ चैनल किस राजनितिक दल के खाँचे में फिट हो रहा है । ऐसे समय में इलेक्ट्रॉनिक मीडिया का एक पत्रकार बस्तर के वॉर ज़ोन से लगातार रिपोर्टिंग करता है ।इन्हीं ज़मीनी रिपोर्टिंग के दौरान एक संवेदनशील कहानी जन्म लेती है ,लाल लकीर ।
जिसके लेखक हृदयेश जोशी है , हृदयेश जोशी इलेक्ट्रॉनिक मीडिया के उन गिने-चुनें पत्रकारों में है जो अपनी संवेदनशील एवं ज़मीनी रिपोर्टिंग के लिये जाने जाते है ,और मेरे फेवरेट भी है। लाल लकीर को पढ़ने के दौरान आपको ये एहसास होगा कि हम नक्सली हिंसा और पुलिसिया दमन की जो छिटपुट खबरें रोजाना अख़बार में पढ़ते है ,लाल लकीर उसका स्पष्ट ब्यौरा हमारे सामने रखती है । लाल लकीर एक प्रेम कहानी है -दो आदिवासियों के बीच प्यार की दास्तान है ।
इन किरदारों से रूबरू होते समय ऐसा महसूस होता है ,कि जैसे सच में एक आज़ाद प्रेम कहानी एक ऐसी जगह जन्म ले रही है जहाँ इंसान अपनी रोजाना जरूरतों और बुनियादी हक के सवालों से जूझ रहा है । ये कहानी एक ऐसे प्रेमी जोड़े भीमे और रामदेव की है जो बस्तर के एक गाँव में नक्सली और पुलिसिया ज़्यादती के शिकार होते है ,धीरे -धीरे इनकी आवाज़ छत्तीसगढ़ से लेकर दिल्ली तक सुनाई देती है ।मगर इनकी आवाज़ नक्सलियों और पुलिस की बन्दूक की गोलियों की आवाज़ में दब जाती है । इस कहानी के किरदार जितने दिलचस्प है ,उतने ही वास्तविक भी लगने लगते है ।अमूमन बस्तर ,सुकमा ,दन्तेवाड़ा के इलाके में पुलिस आम आदिवासी को परेशान करती है और कई बार इन्हें नक्सली बताकर मौत के घाट उतार देती है।वहीं दूसरी ओर नक्सली इन्हें पुलिस का मुखबिर होने के नाम पर इनकी हत्या कर देते है ।
नक्सली खुद को जनताना सरकार ,केंद्र -राज्य की सरकार को बुर्जुआ का प्रतिनिधि और संसद को सुअरो का बाड़ा बोलते है । लाल लकीर की पूरी कहानी बस्तर और इसके इर्द -गिर्द होने वाली तमाम घटनाओं को एक कहानी में बयान करती है । लाल लकीर उस बनावटीपन से दूर है , जो अक्सर हम अख़बारों और तमाम बहसों में सुनते है ।
लाल लकीर को पढ़ने के बाद एक बात स्पष्ट होती है ,जिसका हृदयेश जिक्र करते है ,कि इन इलाकों में एक लकीर नक्सली और राज्य तंत्र के बीच खींच दी गयी है , जिसमें आप या तो लकीर के इस तरफ है या दूसरी तरफ । आम आदिवासी और गरीब इस लकीर के बीच सिर्फ पिस रहा है ।
Profile Image for Ashish Kumar.
104 reviews5 followers
September 23, 2021
‘लाल लकीर’ आपके अंदर भी गहरे लकीर खिंच सकती है। ये उपन्यास प्रेम कहानी होने के साथ बस्तर में रह रहे जनजातियों की व्यथा को भी आपके सामने रखती है। इतनी मज़बूती है इस किताब में कि आप पढ़ेंगे तो ऐसा लगेगा बस्तर में प्रवेश कर रहे है इस उपन्यास के पात्र आपसे बात करेंगे। कई बार आप उनके समस्या को समझते हुए किसी पूर्णविराम के साथ अपने आप को विराम देकर सोचेंगे की आख़िर ‘भिमे कुंजाम’ या किसी भी पात्र के साथ ऐसा क्यूँ हो रहा है।

इस उपन्यास में ‘भिमे कुंजाम’ मुख्य किरदार में है इस लड़की को जितनी मज़बूती से रखा गया है मुझे लगा मैंने इतनी मज़बूत और अहिंसा से भरी हुई लड़की देखी नही ना कहीं पढ़ी।’भिमे’और ‘रामदेव’ की प्रेम कहानी और आस पास बुने हुए किरदार से आपको प्रेम भी होगा और क्रोध भी आएगा लेकिन आपको लाल लकीर कहीं फिंकी नही दिखेगी।

सरकार,व्यवस्था,पोलिस, एस पी ओस,सलवा जूडुम और नक्सलियों के बीच कैसे गाँव के लोग या बस्तर के जनजातीय लोग फँस जाते है उसकी भी लकीर आपको दिखेगी। आपको पढ़ते हुए इस उपन्यास के कई पात्र आस पास भी दिखेंगे। लेकिन जिस सिचूएशन में बस्तर की पोलीस वार ज़ोन में काम करती है उस तरीक़े को पढ़ के आप अचंभित भी होंगे और घिन भी आ सकती है कि आपके आस पास भी ऐसे लोग है जिनकी नज़रों में अपने ईगो के आगे किसी की जान की कोई क़ीमत नही।

आप पढ़िए,पढ़ने के बाद इस किताब के कई पात्र जो आपके कई नए दोस्त बनेंगे भिमे,रामदेव,सुरी,बिशन,संजीवन रेड्डी,सरीता,सीमा,रम्मैया, शक्ति इसके अलावा कई और छोटे छोटे ऐसे पात्रा है जिन्हें आप अपने दिमाग के घर में रख कर बातें कर सकते है।

लाल लकीर आपको सिनेमा का अनुभव दे सकता है अगर आप सिनेमा से जुड़े हुए है तो सिनेमा के कई बारीकियों को भी राइटिंग में महसूस कर सकते है। इसके लिए हृदयेश जोशी को बहुत-बहुत बधाई।
Hridayesh Joshi 👏🏻👏🏻
1 review
July 13, 2019
Nice book
This entire review has been hidden because of spoilers.
Displaying 1 - 3 of 3 reviews

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