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ताम्रपट

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मौजूदा समय के जटिल यथार्थ, समाज की बहुमुखी विसंगतियों और आधुनिक मनुष्य के सम्मुख उपस्थित चुनौतियों का जैसा अंकन उपन्यास विधा में सम्भव है, ऐसा और किसी विधा में नहीं। भारतीय भाषाओं के उपन्यासकारों ने अपने समकाल को समझने और विश्लेषित रूप में पाठकों तक पहुँचाने में इस विधा का बखूबी प्रयोग किया है। मराठी में कादम्बरी यानी उपन्यास लेखन का अपना एक इतिहास रहा है। प्रसिद्ध लेखक रंगनाथ पठारे का यह चर्चित उपन्यास ‘ताम्रपट’ उन सब सम्भावनाओं को समेटे हुए है जिनकी अपेक्षा उपन्यास से की जाती है। अपने बृहद् कलेवर में ‘ताम्रपट’ की कथा का फलक भारतीय इतिहास के लगभग चार दशकों में फैला हुआ है—1942 से लेकर 1979 तक। अलग से कहना ज़रूरी नहीं कि यही वह दौर है जब देश ने स्वतंत्रता-प्राप्ति के बाद के उत्साह और अवसाद दोनों को झेलते हुए विश्व-पटल पर अपनी पहचान कराई। इस काल में हमने सत्ता के संघर्षों का विभिन्न रूप देखा, संस्थाओं का बनना और उनका भ्रष्ट होना भी देखा, शिक्षा और संस्कृति के क्षेत्र में अनेक निर्मितियों और विध्वंसों को भी देखा; नागरिकों के नैतिक उत्थान-पतन से भी हम रूबरू हुए। ‘ताम्रपट’ के माध्यम से हम इस पूरी यात्रा से गुज़रते हैं। लेखक की विराट विश्वदृष्टि और अपने आसपास के यथार्थ का विश्वसनीय अभिज्ञान इस उपन्यास में अपने सम्पूर्ण वैभव के साथ उपस्थित है।

608 pages, Hardcover

First published January 1, 1994

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Rangnath Pathare

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March 30, 2023
कृतिशील आदर्शवाद, करारी व्यवहारवाद आणि कोरडी व्यावसायिकता यांच्या उत्कर्षोपकर्षाच्या पार्श्वभूमीवर स्वातंत्र्योत्तर महाराष्ट्र राज्याच्या बाल्य व किशोरावस्थेतील व्यक्तिमत्व विकासाचा राजकीय,सामाजिक व आर्थिक परिप्रेक्ष्यातून मागोवा घेणारी महाकादंबरी. अभ्यासू निरीक्षणे, ओघवती शैली आणि सशक्त पात्रउभारणी यामुळे खूपच वाचनीय झाली आहे. रंगनाथ पठारेंचे सर्वोत्कृष्ट लिखाण.
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