आजादी के बाद भारतीय समाज और व्यक्ति-जीवन में जैसी विरुपताएँ पनपी हैं, वे यों भी एक गहरे विद्रूप की सृष्टि करती हैं | फिर यह पुस्तक तो रविन्द्रनाथ त्यागी-जैसे समर्थ व्यंग्यकार के चुने हुए व्यंग्य निबंधों का संकलन है | रविन्द्रनाथ त्यागी समकालीन साहित्यिक परिदृश्य में एक महत्त्पूर्ण व्यंग्य लेखक के रूप में जाने जाते हैं | उनकी व्यंग्य रचनाओं में घटनाओं और चरित्रों के बजाय परिवेश और स्थितिओं का चित्रण मिलता है, जिसके माध्यम से वे अपने समय और समाज के विभिन्न अंतर्विरोधों को रेखांकित करते हैं | इस प्रक्रिया में उनके लिए इतिहास, पुराण, साहित्य, संस्कृति, राजनीति और प्रशासन-कुछ भी निषिद्ध नहीं है | सबकुछ जैसे उनके लेखकीय अनुभव में शामिल है | वे बिना अपना बचाव किए हर जगह चोट करते हैं और बेहद सहज भाव से, मनो हँसते-हंसाते जीवन के गंभीर बुनियादी सवालों तक जा पहुँचते हैं | ‘पूज्य’ कही जानेवाले नारी उनके व्यंग्यों में सब कहीं मौजूद है, जो कहीं सामंती तो कहीं पूँजीवादी अप-संस्कृति से उपजी पुरुष-कुंठाओं और विकृतियों की शिकार नजर आती है | कहना न होगा कि यह कृति अपने समय की बहुत-सी अशिष्टताओं पर बहुत ही शिष्टता से विचार करती है |
यशस्वी व्यंग्यकार और समर्थ कवि रवीन्द्रनाथ त्यागी का जन्म एक सितम्बर उन्नीस सौ इकत्तीस को उ.प्र. के बिजनौर जिले में स्थित नहटौर नाम कश्स्बे में हुआ। भयंकर गरीबी के कारण बचपन में उन्होंने मात्र संस्कृत ही पढ़ी और बाद में किसी तरह इलाहाबाद युनिवर्सिटी से एम.ए. की परीक्षा में सर्वप्रथम स्थान पाया। उसके बाद वे देश की सर्वोच्च सिविल सर्विसेजश् की प्रतियोगिता में बैठे और इंडियन डिफेंस एकाउंट्स सर्विस के लिए चुने गए। सन् उन्नीस सौ नवासी में वे कंट्रोलर ऑफ डिफेंस एकाउंट्स के पद से सेवा-निवृत्त हुए।
लिखने का शौक उन्हें बचपन से था। अब तक छह कविता-संग्रह, उन्नीस व्यंग्य-संग्रह और विशिष्ट रचनाओं के चार संकलन प्रकाशित। ‘उर्दू-हिन्दी हास्य-व्यंग्य’ नामक महत्वपूर्ण ग्रंथ का संपादन।
डॉ. कमलकिशोर गोयनका द्वारा संपादित ‘रवीन्द्रनाथ त्यागी: प्रतिनिधि रचनाएं’ नामक विशद ग्रंथ अलग से प्रकाशित।
भारत सरकार की सर्वोच्च प्रशासनिक सेवा में अधिकारी रहे रवीन्द्रनाथ त्यागी उन बिसराए हुए व्यंग्यकारों में से हैं जिन्होंने आज़ादी के पहले का भी दौर देखा है और उस समय के भारतीय समाज, प्रशासन, परम्परा और अन्य सभी क्षेत्रों पर ख़ूब व्यंग्य लिखे हैं.. उनके व्यंग्यों की सबसे ख़ास बात ये रही की खांटी निबंधात्मक न हो कर मनोरंजक भी रहे हैं जोकि उनके लिखे हुए हो सभी आयु वर्ग के लिए रुचिकर बनाता है.. उदाहरणों और उपमाओं से लदे हुए उनके व्यंग्यों का ये संकलन सटायर जानने, पढ़ने-लिखने वालों के लिए बेहद कीमती है..