पंद्रह कहानियाँ अभी-अभी ख़त्म की है, और दिमाग की खिड़की अभी तक ठीक से बंद नहीं हुई है। कुछ कहानियों के सीन साफ़-साफ़ याद भी नहीं, कुछ डिटेल्स घुल-मिल गई हैं, लेकिन उनका असर… वो अभी भी काम कर रहा है। जैसे किताब ने दिमाग के किसी कोने में अपना कुछ सामान छोड़ दिया हो और बिना बताए चली गई हो।
मंटो को पहले भी पढ़ा है, तो मोटे तौर पर पता था किस तरह की दुनिया में जा रहा हूँ—बँटवारे की दरारें, मज़हब का बोझ, जिस्म और शराफ़त के बीच की अजीब सी खींचतान, और वो लोग जिन्हें समाज अक्सर देखना नहीं चाहता। नंदिता दास ने कहानियों का चुनाव वाकई सोच-समझकर किया है। लेकिन मंटो का असली कमाल विषय नहीं, नज़र है। वो एक बहुत छोटी सी बात पकड़ लेते हैं—कभी एक ज़िद, कभी एक अटकी हुई सोच, कभी बस एक “हूँह!”—और फिर उसी को इतना फैलाते हैं कि वही पूरी कहानी बन जाती है, वही पूरा किरदार, वही उसकी पूरी ज़िंदगी। आख़िर में ऐसा लगता है कि कहानी नहीं पढ़ी, कुछ देर किसी और के दिमाग में रहकर लौट आए हैं।
मंटो न भाषण देते हैं, न नारे लगाते हैं। उन्हें ज़्यादा दिलचस्पी इस बात में है कि इंसान अपने आप को कैसे समझाता है। अपनी सहूलियत को कैसे उसूल बना लेता है। अपनी कमज़ोरी को कैसे मजबूरी का नाम दे देता है। और यहीं पढ़ते-पढ़ते थोड़ी बेचैनी होती है।
कई जगह लगा—मैं इस आदमी से सहमत नहीं हूँ… लेकिन उसकी सोच का रास्ता जाना-पहचाना सा लग रहा है। और वही पहचान थोड़ी डरावनी भी लगती है।
इन कहानियों में इतिहास है, लेकिन किताबों वाला नहीं। ये वो इतिहास है जो इंसान के अंदर घुसकर उसके सही-गलत की भाषा बिगाड़ देता है। मंटो जैसे चुपचाप कह रहे हों कि जब रिश्ते टूटते हैं, तो सिर्फ़ देश और शहर नहीं टूटते—लोगों के सोचने के तरीके भी टूट जाते हैं। फिर लोग ऐसे फ़ैसले करते हैं जो उन्हें बिल्कुल ठीक लगते हैं, और दूसरों को बिल्कुल असहनीय।
हिंदी में पढ़ते हुए ये एहसास रहता है कि कुछ न कुछ तो छूट रहा होगा—कोई लहजा, कोई कड़वाहट, कोई सड़क की ज़ुबान। लेकिन फिर भी मंटो यहाँ भी चुभते हैं। शायद इसके लिए बहुत ज़्यादा सजावट की ज़रूरत नहीं होती।
हाँ, ये भी सच है कि किताब हल्की नहीं है। एक ही तरह की बेचैनी बार-बार सामने आती है। ये संग्रह आपको आराम देने नहीं आया। ये बार-बार उसी जगह ले जाता है जहाँ से हम आम तौर पर नज़र फेर लेते हैं। लेकिन शायद मंटो से यही उम्मीद भी करनी चाहिए। वो बहलाने नहीं, याद दिलाने आते हैं।
पढ़ते हुए एक बात बार-बार दिमाग में आती रही: मंटो लोगों के झूठ में नहीं, उन कहानियों में ज़्यादा दिलचस्पी रखते हैं जिनके सहारे लोग अपनी ज़िंदगी चला लेते हैं।
किताब ख़त्म होने के बाद मेरे पास कोई साफ़-सुथरे जवाब नहीं बचे। मज़हब, नैतिकता, उसूल—सब थोड़े कम सीधे, थोड़े ज़्यादा उलझे हुए लगने लगे हैं। शायद अच्छी किताबें ऐसा ही करती हैं। कुछ सिखाती नहीं, बस सोचने का तरीका थोड़ा सा बदलकर छोड़ देती हैं।
और वो बदलाव जल्दी वापस अपनी जगह नहीं जाता। टोबा टेक सिंह आज भी वहीं पड़ा रह जाता है।