इस उपन्यास की इतनी तारीफ सुनकर मुझे लगा था शायद मैं भी इसको इतना ही पसंद करूँगा जितना ज्यादातर पाठकों ने किया है। निश्चय ही इस उपन्यास की भाषा, अवध के जीवन का वर्णन, और शुक्ल जी का व्यंग्य काबिले तारीफ है। जैसा की अन्य पाठकों ने कहा है, यह उपन्यास कई मामलों में समय पर खरा भी उतरा है। पर मुझे राग दरबारी में कुछ खामियां नज़र आयीं जिनकी वजह से इसको पढ़ना उतना आनंदमय नहीं रहा जितनी मेरी उम्मीद थी। कुछ उदाहरण निम्न हैं:
- अच्छी लेखनी का एक सिद्धांत है "शो, डोंट टेल", अर्थात आपको जो कहना है वो आप पात्रों और कथा के विकास के माध्यम से कहें, ना की खुद ही उसको विस्तार से बताएं। शुक्ल जी कुछ पात्रों के माध्यम से अपनी लेखनी आगे बढ़ाते हैं, पर अक्सर वे खुद ही विस्तार से देश, गाँव, शहर, सरकार, भ्रष्टाचार, शिक्षा इत्यादि पर लम्बे लम्बे व्यंग्य लिखते हैं। जैसे उपन्यास आगे बढ़ता है, इस तरह के व्यंग्य काफी दुहराए हुए लगते हैं और उपन्यास में रूचि कम करते हैं।
- इस उपन्यास में महिला किरदार या तो हैं ही नहीं या फिर वे बस हाशिये पर एक सेक्स ऑब्जेक्ट की तरह मौजूद हैं। उपन्यास में एक भी केंद्रीय महिला किरदार नहीं है। बेला का ज़िक्र उपन्यास में अक्सर आता है पर हमेशा दूसरे मर्दों के परिप्रेक्ष्य में। और किसी भी महिला का कहानी में कोई रोल नहीं है। कहानी के इर्द गिर्द कुछ महिलाओं और लड़कियों का ज़िक्र होता है, पर वे हमेशा या तो खुद वासना उकसाती हुई (जैसे शहर की "अंग्रेजी बोलने वाली" लड़कियां) या फिर मर्दों की कल्पना में वासना की कमी पूरी करती मिलती हैं। यह सोचकर अचम्भा होता है की गाँव की इस कथा में एक भी महिला केंद्र में नहीं है।
- उपन्यास का व्यंग्य कई जगहों पर ऐसे लिखा है की समझ नहीं आता लेखक विदेश के प्रति खुद हीन भावना से ग्रसित हैं, या फिर देश की हीन भावना दर्शा रहे हैं। अक्सर विदेशी अभिनेत्रियों का ज़िक्र आता है जिनको, फिर से, केवल सेक्स ऑब्जेक्ट्स के रूप में बताया जाता है। अक्सर विदेशी शिक्षा, दर्शन, इत्यादि का भी ज़िक्र आता है, जिसके प्रति भी एक हीन भावना रहती है। क्या वास्तव में देश में इस तरह की हीन भावना है या फिर शुक्ल जी के मन में ऐसी भावना थी, यह कहना मुश्किल हो जाता है।
इन खामियों के चलते मेरी नज़र में यह उपन्यास कालजयी नहीं बन पाता। मैंने कम ही हिंदी/उर्दू लेखकों को पढ़ा है, पर उनमें मुंशी प्रेमचंद, मंटो, धर्मवीर भर्ती जी की रचनाएँ राग दरबारी की तुलना में ज्यादा कालजयी मालूम होती हैं।