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उपनिषद सागर भाग 1: Upanishad Sagar Vol 1
Upanishads in India are ancient source of wisdom and spiritual knowledge. These are theological and philosophical reflections about the essential nature of things. They are also called Vedanta, literally meant - end of Veda, the final goal of the Veda, because it was, as a rule, located at the end of the Brahmana. Upanishads are also literally called 'confidential session' with the teacher, later meant as 'secret lore' because it used to be imparted to the pupil towards the end of the period of instruction. Present volume consists gems from four important Upanishads viz. Isavasya Upanishad, Chandogya Upanishad, Prashna Upanishad,Bṛhadāraṇyaka Upaniṣhad. The author has presented the gist in poetic format in Hindi.
67 pages, Kindle Edition
Published November 13, 2018
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January 11, 2021
एक वर्ष तक दूध से निरन्तर अग्निहोत्र करने पर मृत्यु भी वश में हो जाती है । उस पुरुष ने तीन अन्नों का चयन अपने लिए किया। ये तीन अन्न-‘मन, ‘वाणी’ और ‘प्राण’ हैं वाणी द्वारा पृथ्वीलोक को, मन द्वारा अन्तरिक्षलोक को प्राण द्वारा स्वर्गलोक को पाया जा सकता है। वाणी ॠग्वेद, मन यजुर्वेद, प्राण सामवेद है। जो कुछ भी जानने योग्य है, वह मन का स्वरूप है। वाणी ज्ञान-स्वरूप होकर करती है जीवात्मा की रक्षा जो कुछ अनजाना है, वह प्राण-स्वरूप है। इस विश्व में जो कुछ भी स्वाध्याय या ज्ञान है, वह सब ‘ब्रह्म’ से ही एकीकृत है। वस्तुत: यह सूर्य निश्चित रूप से प्राण से ही उदित होता है और प्राण में ही समा जाता है। इस संसार में जो कुछ भी है, वह नाम, रूप और कर्म, इन तीनों का ही समुदाय है। इन नामों का उपादान ‘वाणी’ हैं। समस्त नामों की उत्पत्ति इस वाणी द्वारा ही होती है। समस्त रूपों का उपादान ‘चक्षु’ है। समस्त सूर्य इस चक्षु से ही उत्पन्न होते हैं। समस्त रूपों को धारण करने से चक्षु ही इन रूपों का प्राण है, ‘ब्रह्म’ है। समस्त कर्मों का उपादान यह ‘आत्मा’ है। समस्त कर्म शरीर से ही होते हैं और उसकी प्रेरणा शरीर में स्थित यह आत्मा ही देती है। यह ‘आत्मा’ ही सब कर्मों का ‘ब्रह्म’ है। आत्मा द्वारा ही नाम, रूप और कर्म उत्पन्न हुए हैं। अत: ये तीनों अलग होते हुए भी एक आत्मा ही हैं। यह आत्मा सत्य से आच्छादित है। यही अमृत है। प्राण ही अमृत-स्वरूप है। नाम और रूप ही सत्य हैं। अमृत और सत्य से ही प्राण आच्छन्न है, ढका हुआ है, अज्ञात है।
शाकल्य - ‘फिर बताइये कि पूर्व में आप किस देवता से युक्त हैं वह किसमें स्थित है?’ याज्ञवल्क्य- ‘वहां मैं आदित्य देवता के साथ युक्त हूं वह आदित्य ‘चक्षु’ में चक्षु ‘रूप’ में स्थित है। वह रूप ‘हृदय’ में स्थित है; ह्रदय के द्वारा ही पुरुष को रूपों का ज्ञान होता है।’
शाकल्य - ‘फिर बताइये कि पूर्व में आप किस देवता से युक्त हैं वह किसमें स्थित है?’ याज्ञवल्क्य- ‘वहां मैं आदित्य देवता के साथ युक्त हूं वह आदित्य ‘चक्षु’ में चक्षु ‘रूप’ में स्थित है। वह रूप ‘हृदय’ में स्थित है; ह्रदय के द्वारा ही पुरुष को रूपों का ज्ञान होता है।’
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