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सुनो चारुशीला

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81 pages, Hardcover

Published January 1, 2013

15 people want to read

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Naresh Saxena

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नरेश सक्सेना ने कहीं लिखा है कि ‘कविता ऐसी जो बुरे वक्त में काम आए.’ तमस से प्रकाश की ओर, असत्य से सत्य की ओर उसकी इसी अनवरत यात्रा ने उसे मनुष्यता का पर्याय बना रखा है. जब भी मनुष्य के सामूहिक विवेक पर खतरा दीखता है कविता अपनी तन्वंगी काया के साथ खड़ी हो जाती है, रोकती, टोकती और समझाती हुई.

बुरे वक्त से जूझने के लिए हमारे पास नरेश सक्सेना की कविताएँ हैं. नरेश सक्सेना (१६ जनवरी, १९३९) के दो कविता संग्रह ही अभी प्रकाशित हैं- ‘समुद्र पर हो रही है बारिश' और ‘सुनो चारुशीला’. उन्हें वैज्ञानिक कवि भी कहा जाता है. नरेश सक्सेना परफेक्शनिस्ट कवि हैं, किसी-किसी कविता पर तो उन्होंने वर्षों तक कार्य किया है. उनकी कविताओं का गहरा असर ख़ास-ओ-आम सभी पाठकों पर है.

Comment by Santosh Arsh and Arun Dev

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