सुरंगमा ‘‘छोट्टो घर खानी मौने की पौड़े सुरंगमा? मौने की पौड़े, मौने की पौड़े?. एक प्राणों से प्रिय व्यक्ति तीन-चार मधुर पंक्तियों से सुरंगमा के जीवन को संझा के वेग से हिलाकर रख देता है। बार बार। शराबी, उन्मादी पति से छूटभागी लक्ष्मी को जीवनदाता मिला अँधेरे भरे रेलवे स्टेशन में। रॉबर्ट और वैरोनिका के स्नेहसिक्त स्पश्र में पनपने लगी थी उसकी नवजात बेटी सुरंगमा, लेकिन तभी विधि के विधान ने दुर्भाग्य का भूकम्पी झटका दिया और उस मलबे से निकली सरल निर्दोष पाँच साल की सुरंगमा कुछ ही महीनों में संसारी पुरखिन बन गई थी, फिर शिक्षिका सुरंगमा के जीवन में अंधड़ की तरह घुसता है, एक राजनेता और सुरंगमा उसकी प्रतिरक्षिता बन बैठती है। क्या वह इस मोहपाश को तोड़कर इस दोहरे जीवन से छूट पाएगी? मौने की पौड़े सुरंगमा? एक एकाकी युवती की आंतरिक और बाहरी संघर्षों की मार्मिक कथा।
"प्रशस्त लॉन की हरीतिमा पर सतरंगी आभा बिखेरती धूप की बृहत् रंगीन छतरी हवा में नाव के पाल सी झूम रही थी..."
विशुद्ध हिंदी में लिपटी शिवानी की कहानियाँ नदी की धारा सी सहज रूप से बहती चली जाती हैं। सर्वप्रथम इन्हीं शब्दों से सम्मोहित होकर जब मैं आगे बढ़ी तो विडम्बनाओं के समक्ष असहाय खड़े किरदारों की नियति पर आँसू बहाए बिना नहीं रह सकी। शिवानी की लेखन शैली निश्चित रूप से असाधारण है। यह बात उनकी नायिका पर भी लागू होती है।
पिछली सदी में लिखी गयी यह भाव-प्रवण कहानी आज भी झकझोरती है। बीते समय की कहानियाँ हमने लिए उस समय की खिड़कियाँ हैं जिससे हमारे तार लगभग कट से गए हैं। यह एक प्रमुख कारण है जो मैं इतनी पुरानी कहानियों को इतने चाव से पढ़ती हूँ।
इस उपन्यास में अनेक ऐसे विषय हैं जो आज भी उतने ही प्रासंगिक हैं, बस किसी किसी का रूप बदल गया है। जैसे सबके अंतर्मन में अनुकूलन द्वारा जमाया गया यह विचार कि उज्ज्वल वर्ण श्याम वर्ण से अपेक्षाकृत श्रेष्ठतर है, या स्त्रियों के प्रति द्वेष का भाव, जिसे अंग्रेज़ी में misogyny कहा जाता है, आदि।
कई अवसरों पर ऐसा प्रतीत भी होता है कि लेखिका यह सब महिमामंडित कर रही हैं। हालाँकि कुछ लोगों का मत यह होगा कि वह शायद अपने समय के दोषों से पूर्ण रूप से बच ना पाई हों। निर्णय पाठक को करना है।
परिस्थिति वश समय से पहले ही दुनिया को समझ लेनेवाली एक युवती के आंतरिक और बाह्य संघर्ष की कहानी है।
कितना भी दुनिया देख लिया जाए , कितना भी पास्ट से भागने की कोशिश की जाए.... क्या हम खुद को अपने भूत और अपने आंतरिक सूनेपन से बचा सकते हैं ?
कुछ ऐसे ही थीम पर बुनी गई कहानी है। ***** किशोरवय के प्रेम को सच्चा प्रेम मान अपना वैभवपूर्ण घर त्याग कर छली गई स्त्री की बेटी, जो माँ के संघर्षों से पूर्ण परिचित है, छले जाने के भय से या विफल दाम्पत्य के भय से एकांतवास चुनती है। लेकिन क्या वो सफल हो सकेगी ?
शिवानी का उपन्यास सुरंगमा उनके अन्य उपन्यासों की ही तरह स्त्री किरदार के दूसरे पहलू की झलक लिए है, किताब की शुरुवात में सुरंगमा को एक मिनिस्टर के घर पर कुछ हिचकिचाहट के साथ खड़ा दिखाते हैं, प्रयोजन है मंत्री की बेटी के लिए ट्यूशन टीचर के तौर पर काम करना, दोनों तरफ से बात न बनते हुए भी बन जाती है, सुरंगमा जो एक बैंक में काम करती है, ये ट्यूशन का काम अपनी आर्थिक स्थिति के चलते करना मंजूर कर लेती है, अपने माता-पिता के आपसी रिश्तों का सुरंगमा के मन पर कुछ ऐसा प्रभाव पड़ता है कि वो ताउम्र विवाह की डोर में ना बंधने का फैसला लेती है लेकिन मंत्री जी के सामने उसके सारे फैसले जैसे विवश हो जाते हैं, अपने आत्मसम्मान को बनाए रखते हुए वो क्यूँ इस रिश्ते में पड़ती है? अपने पिता की सारी कमियों के वाबजूद वो क्यूँ उनसे नफरत नहीं कर पाती? शिवानी के द्वारा रचा ये किरदार वाकई एक ग्रे शेड लिए है, फिर भी मन में ठहरता है, सुरंगमा से ज्यादा उनकी माँ का जीवन भी कितना विचित्र है, एक शाही परिवार में जन्म लेने के बावजूद जिंदगी भर असहाय बने रहना , अपने से दुगनी उम्र के म्यूजिक ट्यूटर के साथ भाग के शादी करना और फिर वहाँ से भाग कर, एक ईसाई की शरण पाना, जिंदगी कितनी उलझनों भरी होकर भी एक आस साथ लिए चलती है, शिवानी के पात्र यही सीखाते हैं, हार को परे ढकेल, हम कैसे दोहरा जीवन जीते चले जाते हैं?
“नाम तो आपका बड़ा सुन्दर है मिस जोशी, ऐसे नाम तो पहाड़ियों में कम होते हैं। मैं भी पहाड़ी हूँ, शायद आप जानती होंगी! क्यों?
वह फिर हँसा, उसकी हँसी प्रत्येक बार उसके ग्लान चेहरे पर सौ पावर का बल्ब-सा जला जाती थी। किन्तु पहली हँसी से कितनी भिन्न थी यह दूसरी हँसी! लाल क्लान्त आँखों का घेरा भी उस हँसी ने ऐसे संकुचित कर दिया कि एक पल को सुरंगमा को लगा, उसकी आँख भी हँसी से सवेरे प्रश्न के साथ-साथ कुटिल भंगिमा में मुँद गई है! उसका कलेजा काँप उठा, यह तेज नरपुंगव का था या नरभक्षी का!
‘जी, मेरे पिता पहाड़ी हैं, माँ बंगाली थीं,’कहने के साथ ही उसकी हथेलियाँ पसीने से तर हो गईं। एक माह पूर्व यह प्रश्न पूछा जाता तो उत्तर यह नहीं होता माँ के लिए तब वह क्या भूतकाल का प्रयोग करती? किन्तु माँ होती तो वह इस अवांछित इंटरव्यू के लिए यहाँ आती ही क्यों?
Surangma (Paperback) by Shivani- Shivani is hindi author from Kumaun area of Uttar Pradesh/Uttaranchal. She has lived in 66 Gulistan Colony, Lucknow and scripted books. Her novels were serialised in popular hindi weekly magazines-Hindustan and Dharmayug. I have been a fan of her writng since that period. We as readers were eager to find the fate of the characters which would come before us in the next weekly edition. She has lived in Rajkot, Orcha, Rampur, Hyderabad. This novel is thr story of Mother and daughter who live thier lives in hope for better. The mother is married to a drunkard husband. Unable to bear his atrocities, she runs away. She is pregnant. She plans to commit suicide. She lies down on the railway line to die but she is saved by the driver ot the train. She lives with him. Her husband finds her and she leaves this home also. Later, Her daughter is afraid of life with men and shrinks into herserlf but she get an offer to work as a teacher to the daughter of a minsiter. She gets into a sordid relationship. I donot want to disclose the interesting story for the reader to read and find out for himself. It is a class book for all to read.
An implausible plot, with typical Shivani tropes – a brilliant, beautiful Brahmin girl from the Kumaon Hills struggling against patriarchy – particularly alcoholic, debauched, lecherous men; coincidences galore; Nainital, Almora, Kumaon villages and the sylvan hills. Not one of her better stories - just occasional flashes of lyrical prose
प्रशस्त लॉन की हरीतिमा पर सतरंगी आभा बिखेरती धुप की बृहत रंगीन छतरी हवा में नाव के पाल-सी झूम रही थी, सामने धरी मेज़ पर दो-तीन फाइलों के पन्ने हवा में फड़फड़ा रहे थे।
Story holds the reader till end. Shivani is one my favorite author and one can feel the story and relate to the emotions of character. Surangama is also one of them.