This collection of contemporary satirical essays in Hindi is a way of author to look at the current socio-political scenario and an attempt to recreate the magic of Hindi satire once visible in the world of Sharad Joshi, Shrilal Shukl and Harishankar Parsai. The author takes a dig at the inconsistencies of the modern world, modern value systems and modern politics, waltzing around with fictional heroes from the past. You have characters from Rag Darbari wandering about, Emperor Ashok landing in Karnataka post elections and even legendry writer Sharad Joshi himself coming out of retirement to get his satire published. The attempt of author is to create an outrageously funny world without ever losing the grace, dignity and beauty of language, cautiously and carefully avoiding the smattering of Hinglish and cuss-words modern Indian satire and homour space is infamous for.
A prolific blogger and Self-confessed Twitter lover, Saket is an Engineer with Masters in International Business. Based out of Delhi, he works with an IT major and writes, well, because he can't go without writing. After a book of essays, two earlier collections of poem, has just published, Rescued Poems and is working on his first fictional novel.
गंज श्रीलाल शुक्ल जी की व्यंग्य रचना 'रागदरबारी' का केंद्र स्थल है, जहाँ के जन ख़ुद को गंजहे कहलाना पसंद करते हैं। गंज की कहानी गांव और शहर की है जहां व्यवस्था समाज में घर कर चुकी है, और चूंकि व्यवस्था बन चुकी है तो लोग भी ख़ुद को उस हिसाब से ढाल चुके हैं, इन्हीं गंजहों की कहानी और राजनैतिक व्यंग्य था 'रागदरबारी'.
साकेत जी 'गंजहों की गोष्ठी' करवा रहे हैं जिसमें आज की राजनैतिक व्यवस्था को लेकर चर्चा केंद्र में है, और बहुत ही व्यंग्यात्मक लेखनी के साथ साकेत जी ने हमारे लोकतंत्र की वर्तमान व्यवस्था का वर्णन किया है।
बहुत ही सुन्दर व्यंग्य लिखा है साकेत सूर्येश जी ने. समसामयिक घटनाओं के पात्रोंका सटीक चित्रण और उनके दोगलेपन/मूर्खत्व पर तीक्ष्ण कटाक्ष, आनंदित करने वाले हैं. साथ ही जिन घटनाओं को हम हंस कर छोड़ देते हैं, अपने व्यंग्य से लेखक हमें पुनः उनपर नए दृष्टिकोण से सोचने के लिए विवश कर देता है. पुस्तक लघु-मध्यम लम्बे लेखों का संकलन है, जिन्हें शृखंला में पढ़ने की आवश्यकता नहीं है. यदि समसामयिक राजनीति और व्यंग्य में आपकी रुची है तो यह अवश्य पसंद आएगी. लेखनी का अंदाज़ा नीचे दिए गए कुछ उद्धरणों से लग जाएगा.
"नेता बैठता है तो आम आदमी खड़ा रहता है, मंत्री बैठता है तो विधायक, प्रधानमंत्री बैठता है तो मंत्री और काँग्रेस के अध्यक्ष का पुत्र बैठता है तो पुर्व प्रधानमंत्री खड़े रहते हैं। जिस दिन यह डार्विनी चक्र पलटता है तो समझना चाहिए चुनाव निकट हैं। चुनाव घोषणा के बाद चक्र पलटता है और जनता को सिंहासन पर बिठा कर नेता खड़ा हो जाता है। इसी खड़े होने और बैठने के अभ्यास को राजनीति कहते हैं।"
"लंबी संगीत एवम् संवादहीन राजनीति के बाद भारतीय राजनीति के पटल पर जब केजरीवाल प्रकट हुए तो मानो उन्होंने एक दुखी, उदासीन राष्ट्र को संबोधित कर के कहा – यदा यदा हि हास्यस्य ग्लानिर्भवति भारत, अभ्युत्थानस्यव्यंग्यस्य तदात्मानम सृजाम्यहम।इस प्रकार लोकपाल टोपी धारी, एक हाथ में माफ़ीनामा और दूसरे हाथ में झाड़ू लिए हुए लिए हुए देवाधिदेव केजरीवाल प्रकट हुए। महाप्रभु केजरीवाल जी ने स्वयं को दिल्ली का मालिक घोषित किया और नागरिकों के जीवन को अप्रतिम हास्य से सिंचित किया। न सिर्फ़ दिल्ली मे बल्कि पार्टी मे भी हास्य का स्तर बनाए रखने के लिए समय समय पर नेताओं को निष्काशित करते रहे।"
"प्रकाशक बोले, “एक तरीक़ा है। आप बुद्धिजीवी बन जाएँ।’ ‘उसके लिए क्या करना होगा?’ प्रकाशक महोदय सोच मे डूब गए। अचानक बोले। ‘सबसे पहले तो दाढ़ी बढ़ा लें। और ये क्लर्कों जैसे क़मीज़ पहन कर घूमना बँद करें। फैबइंडिया से बढ़िया सा सूती कुर्ता ख़रीदें। सिगरेट पीते हैं? नही पीते तो शुरू कर दें। गाँजा मिल जाए तो अति उत्तम। चिलम थाम कर सर्वहारा पर चर्चा करें। सरकार गरियाएँ। आप के आस पास कुछ ग़लत हुआ गए दिनों?’ ‘पड़ोस का पप्पन केले के छिलके पर फिसल गया था। और तो कुछ ख़ास नहीं।’ शरद जी शर्मिंदा से हो गए’ ‘उसी पर लेख लिख मारिए’ ‘उस पर क्या? वो तो दुर्घटना थी।’ “अब यह भी हम बतलावें, लेखक आप हैं। लिखिए, पप्पन का गिरना सामाजिक पतन का सूचक है। सवाल यह नही है कि पप्पन गिरा, सवाल यह है कि पप्पन क्यों गिरा। पप्पन फल के छिलके से गिरा, पप्पन यदि माँस खाता तो फल न खाता, छिलका ना होता और पप्पन संभवत: न गिरता। हम पप्पन तो गिरता हुआ देख रहे है, किंतु पप्पन का गिरना अपने आप मे एक घटना नहीं है, सामाजिक पतन का सूचक है। हिंदुत्व के ठेकेदारों ने माँस भक्षण पर इतना प्रतिबंध लगाया है, कि उनके भय से मीट चिकन खाने वाले घर के सामने फलो के छिलके फैला कर रखते हैं और देर सबेर उन पर गिरते हैं। हमें मोदी जी के राज मे फैले उस भय के वातावरण पर ध्यान देना है जिस मे एक पप्पन घर के सामने केले के छिलके बिखेरने को मजबूर है। हो सकता है कि छिलके फैलाना मोदी जी के फ़ासिस्ट स्वच्छ भारत अभियान के विरोध मे पप्पन का एकाकी विरोध हो, किंतु आज के आपातकाल-सरीखे माहौल मे बेचारा मूक है। एक दृष्टि से देखे तो हो सकता है पप्पन उतना भोला भी ना हो। पप्पन उत्तरभारतीय हिंदी-भाषी भगवा आतंकवादी भी हो सकता है, जिसने केले के पत्तों पर खाने वाले दक्षिणभारतीयो के विरूद्घ विष फैलाने के लिए गिरने को केले के छिलके का उपयोग किया हो। आख़िर पप्पन संतरे के छिलके पर भी गिर सकता था। एक भोला भाला बेवक़ूफ़ भारतीय ही होगा जो पप्पन-पतन-काँड मे संतरे के छिलके के ना होने को नागपुर और सँघ से जोड़ कर ना देख सके। हर जगह सँघ का हाथ है, कोने कोने मे पप्पन केले के छिलको पर गिर गिर के विषाक्त सांप्रदायिक वातावरण बना रहे हैं। लोकतंत्र ख़तरे मे है।” "
Saket sir is at par excellence when it comes about writing political satire. His poems and short stories have been equally popular yet this genre has won many hearts. Reading Ganjaho ki Gosthi was a different experience. Such a class political sarcasm in hindi in context of today's India is definitely worth everyone's read. From plot to characters, from narration to center message- Its just perfect. It nails it. A MUST READ.
EPIC ! Hilarious ! Should be on every bookshelf. Saket's satires masterfully blend sublime wit and subtle insight with brilliant writing and structural styles. Made me laugh out loud many times. A quick and funny read. A really enjoyable read. The title and the cover of the book compell you to pick it up. Definitely a good book. A must read book. Highly recommend !
साकेत साहेब का व्यंग आज के दौर का मजेदार कहानी और सार की व्याख्या करता है। हमारे आसपास के जीवन का उच्चतम हास्य रूपी हृदय और दिमाग को छूती हुई कहानियां है।
साकेत जी आपकी आने वाली कहानियों की प्रतीक्षा रहेगी।
लेखक अपने को भाग्यशाली मानते हैं कि उन्हें श्रीलाल शुक्ल, परसाई और शरद जोशी की रचनाएं पढ़ कर बड़े होने का अवसर प्राप्त हुआ। परसाई जी की सबसे बड़ी विशेषता यह थी कि उन्होंने हर तरह के पाखंड, दिखावे और कुरीति को व्यंग्य के माध्यम से निशाना बनाया, बिना विचारधारा के बंधनों में फंसे हुए। यही उन्हें कालजयी बनाता है। लेखक ऐसा नहीं कर पाते हैं। 70 साल की गलतियों को सुधारने वाली दृष्टि रखना अच्छा है, परंतु वह केवल एक पहलू भर ही देखे और दिखाए तो ठीक नहीं है। कलम की धार कई व्यंग्यों में दिखती है, लेकिन फिर जहां अपना पक्ष और गलत पक्ष का भेद प्रकट होता है, मामला गड़बड़ होने लगता है। फिर जो ये रचना हो सकती थी या लेखक का कौशल जिन ऊंचाइयों पर इसे ले जा सकता है हो नहीं पाता है; वैचारिक प्रतिबद्धता आड़े आ जाती है।
I presumed this book to be a very exciting read, it's not every day that you read good political satire, and exciting it was, full of wit and humor, like perfectly timed live comedy. But the excitement didn't last long, soon one realizes the essays take digs at all except one form of socio-political ideology, so much so that it feels like a punch-down comedy. Writing continues to be sharp throughout, though the sharpness doesn't slice the ideological tension but aims to deepen the existing wedge in society.
लेखक साकेत सुर्येश जी से मैं ट्विटर से परिचित हुआ था। वे समसामयिक घटनाओं पर लेख लिखते हैं और ट्वीट करते हैं। "गंजहों की गोष्ठी" से पूर्व मैंने उनकी पुस्तक "एक स्वर सहस्त्र प्रतिध्वनियां" पढ़ी थी। जिसमें पौराणिक कथाओं को नए दृष्टिकोण से लिखा गया था। वह पुस्तक मुझे बहुत अच्छी लगी थी। "गंजहों की गोष्ठी" पुस्तक को आप राजनीतिक व्यंग्य कह सकते हैं। अच्छी पुस्तक, अवश्य पढ़ें।