यश मजेजी के अमेज़न पर अन्य उपन्यास - वो मीरा नहीं थी (Woh Meera Nahin Thi by Yash Majeji) मंशा (Mansha by Yash Majeji) उपन्यास उम्र के बारे में - उपन्यास “उम्र” एक बेहद संवेदनशील उपन्यास है। इस उपन्यास का प्रत्येक पृष्ठ अपने आप में विचारणीय है और उम्र द्वारा जीवन में उत्पन्न परिस्थितियों के बारे में सोचने पर आपको मजबूर कर देगा। उपन्यास में एक 8 बरस के बच्चे के त्याग का वर्णन अपने आप में अनूठा है। कहानी बेहद नई और दिलचस्प है और आपको प्रारम्भ से अंत तक भावनात्मक बहाव में बहने को विवश कर देगी। उपन्यास उम्र में वर्णित कुछ अंश निम्न हैं - 1. अभिमन्यु के नेत्रों से याचना टपक रही थी और वह एक याचक की भाँति बैठा था, अपनी माँ की प्रशंसाओं का याचक। उसके हृदय में यह ही भाव थे कि देखो कैसा सुंदर चित्र है, इसके लिए मेरी माँ की प्रशंसा करो। वह वैसा ही अनुकरण कर रहा था जैसा कि एक साधु मंदिर के बाहर प्रांगण में बैठा, दूर से आए दर्शनार्थी को अपने समीप बैठाकर, उसकी ओर प्रशंसा भरे भावों से कहता हो, कैसा सुंदर स्थान है, कितनी शांति मिलती है मन को, है ना? और फिर वह उसी दर्शनार्थी को इस आस से देखता रहता है कि ओह अब वह भी मेरे भगवान के स्थान की प्रशंसा करेंगे। उनकी प्रशंसा सुनकर साधु के मुखमण्डल पर जो प्रसन्ना की लहर उठती है, उसकी तुलना नहीं की जा सकती। कुछ लोग जो दूसरों को प्रसन्नताएं प्रदान करना नहीं चाहते, साधु की ओर देखकर कहते हैं- कैसी बातें करते हो साधु? हमें तो इस स्थान में कोई सुन्दरता नहीं दिखती। हमें तो यहाँ शान्ति नहीं मिलती, और साधु उनकी इन बातों पर अपना जी मलिन कर बैठता है। 2. अभिमन्यु ने दीवार पर टंगे आईने पर नज़र डाली। उसमें वह स्वयं को स्पष्ट देख सकते थे। एक क्षण आईने को गौर से देखने के बाद अभिमन्यु मन ही मन आईने पर हँस दिए। उनके मन में उसके प्रति अनगिनत भावों का सृजन हुआ जिसका सार था कि ओह आईने तुम भी बड़ी विचित्र वस्तु हो, जिस व्यक्ति के सामने जाते हो उस जैसे ही दिखने लगते हो, तुम्हारा अपना कोई अस्तित्व नहीं है? फिर मन ही मन विचार आया, निःसंदेह आईना भी मजबूर है, घरों में जगह बनाना है तो जी हज़ूरी सीख गया। जिस व्यक्ति के समक्ष जाता है उस जैसा ही अपने आपको बना लेता है, और देखने वाला उसकी इस कला पर मोहित होकर ही उसे अपने घर में सहेज कर रखता है। वास्तव में यह जी हजूरी ही उसकी पहचान है। आईने का जीवन दीवार पर टंगकर, हाथ में आकर और किसी की भूल से छूटकर गिरने पर समाप्त होने के लिए ही बना है और उसकी उम्र का निर्धारण भी उस व्यक्ति के द्वारा ही होता है जिसके हाथ में वह गया है। 3. प्रकाश चाौधरी ने समंदर की प्रशंसा करते हुए कहा - ‘‘ओह सागर। तुम श्रेष्ठ हो भैया। तुम बड़े सयाने हो। तुम्हारे भीतर कितनी जल की अनगिनत बूंदें हैं, कितना बड़ा परिवार है पर तुम अपने किसी भी सदस्य को अपने से दूर नहीं जाने देते। जल की वह बूँद जो तुमसे विमुख होकर, वाष्प बनकर आसमान की ओर चली जाती है, वह भी तुम्हारे स्नेह के कारण तुम्हारे पास आए बिना नहीं रुकती। शुरू में बूँद कहती होगी तुमसे, ‘‘तुम श्रेष्ठ नहीं हो, तुम्हारी विचारधाराएं श्रेष्ठ नहीं हैं, इसलिए हम तुमसे विमुख हैं और दूर आसमान पर जाती हैं। वहाँ हम अपनी अलग दुनिया बसाऐंगे,’’ पर तुम इस प्रकार की बातें सुनकर उनसे विमुख तो नहीं हो जाते। तुम कहते होगे, ‘‘तुम जा रही हो अपनी अलग दुनिया में मुझसे विमुख होकर, पर कम से कम एक बार क्रोध तो करती जाओ मेरे ऊपर। मेरे कृत्यों के ऊपर।’’ तुम उनसे क्रोध करने का अधिकार तो नहीं छीनते। और वह रह-रहकर तुम पर क्रोध करतीं हैं। तुम पर बरसती हैं और तुम उन्हें अपने गले लगा लेते हो और वह तुम में विलीन हो जाती हैं।’’ समंदर में बड़ा प्रेम है तभी तो जल के कण उसमें ही मिलने चले आते हैं नदियों में बहकर। लेखक के बारे में - यश मजेजी, एक संवेदनशील लेखक हैं और ग्वालियर के निवासी हैं। लेखन इनका जुनून हैं और वे स्क्रीन राईटर एसोसिएशन (SWA), मुंबई के एसोसिएट सदस्य हैं। आप हिन्दी फिल्मों में गीतकार एवं कहानीकार के रूप में अपना योगदान प्रदान करने की आकांक्षा रखते हैं। इनसे ईमेल आईडी writeryashmajeji@gmail.com पर संपर्क किया जा सकता है।