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ठिठुरता हुआ गणतंत्र

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परसाई हँसाने की हड़बड़ी में नहीं होते। वे पढ़नेवाले को देवता नहीं मानते, न ग्राहक, सिर्फ एक नागरिक मानते हैं, वह भी उस देश का जिसका स्वतंत्रता दिवस बारिश के मौसम में पड़ता है और गणतंत्र दिवस कड़ाके की ठंड में। परसाई की निगाह से यह बात नहीं बच सकी तो सिर्फ इसलिए कि ये दोनों पर्व उनके लिए सिर्फ उत्सव नहीं, सोचने-विचारने के भी दिन हैं। वे नहीं चाहते कि इन दिनों को सिर्फ थोथी राष्ट्र-श्लाघा में व्यर्थ कर दिया जाए, जैसा कि आम तौर पर होता है। देखने का यही नज़रिया परसाई को परसाई बनाता है और हिन्दी व्यंग्य की परम्परा में उन्हें अलग स्थान पर प्रतिष्ठित करता है। प्रचलित, स्वीकृत और उत्सवीकृत की वे बहुत निर्मम ढंग से चीर-फाड़ करते हैं। इसी संग्रह में 'इंस्पेक्टर मातादीन चाँद पर' शीर्षक व्यंग्य में वे भ

131 pages, Kindle Edition

Published January 1, 2018

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179 people want to read

About the author

Harishankar Parsai

87 books240 followers
Harishankar Parsai (हरिशंकर परसाई) was one of the greatest hindi satire writer. Despite holding a MA degree in English, he never wrote in this language. Started his career as a teacher, he later quit it to become a full time writer and started a literature magazine "Vasudha"(it was later closed because of financial difficulties).

He was famous for his blunt and pinching style of writing which included allegorical as well as realist approach. He was funny enough to make you laugh but serious enough to prick your conscience. There would be hardly any dimension of life left which has not appeared in his satires. He received Sahitya Academy Award(biggest literature award in India) for his book "Viklaang Sraddha ka Daur". He has penned down some novels also.

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Displaying 1 - 16 of 16 reviews
Profile Image for Kirti Upreti.
232 reviews139 followers
September 8, 2020
Act of God - आजकल ये शब्द काफ़ी प्रचलित अर्थात् viral हो रहे हैं। हालात ही कुछ ऐसे हैं कि इनको भगवान के कांड के सिवाय क्या कहा जाए किसी को समझ नहीं आ रहा। पर मुझे ये अचंभित प्रतिक्रिया समझ में आती है।

मेरा सामाजिक साक्षात्कार बहुत ही कम है। कभी कोई विशेष इच्छा नहीं होती लोगों से मिलने की। और जब मिलना पड़ता है तो allergy जैसा महसूस होता है। क्योंकि मुझे लोगों की मक्कारी और दोगलापन देख के यही लगता है कि ये महानुभाव भी Act of God ही हैं वरना इतना नीचे गिरने की कोई मामूली वजह तो नहीं हो सकती।

फ़िर मुझसे मेरे bookworm होने की वजह पूछी जाती है। तो क्या है कि मेरे अहो भाग्य कि परसाई जी जैसे लोग ढेर सारा सच लिख के इन पन्नों में संरक्षित कर गए हैं। जब भी मुझे दुनिया की नौटंकी बर्दाश्त करने की अपनी क्षमता क्षीण होती मालूम होती है, तब किताबों में घुस के दिमाग recharge किया जाता है। मन को याद रहता है कि घर में कुछ किताबें हैं, जिनमें कई सारी दुनिया हैं, जिनमें कुछ लोग आज भी जिंदा हैं। और उनको भी इस भसड़ और झूठ से भरी दुनिया से allergy है। ऐसे लोग मुझे अच्छे लगते हैं। खुश रहने के लिए इतना काफ़ी है।
Profile Image for Raghav Sharma.
165 reviews1 follower
January 31, 2022
परसाई जी ने व्यंग्य नहीं, सत्य लिखा है । दशकों पहले लिखे ये व्यंग्यात्मक निबन्ध आज भी सामयिक लगते हैं । परसाई जी मनुष्य के व्यवहार की बारीकियों को समझते थे और ख़ासकर यदि वह मनुष्य नेता, अफ़सर या सरकारी कर्मचारी हो तो उसके चिरंतन चरित्र (या चरित्रहीनता कहें) पर उनकी बेजोड़ पकड़ दिखाई देती है । परसाई पुल चाहे बने न बने पर परसाई जी अमर ही रहेंगे ।
Profile Image for Amit.
80 reviews1 follower
March 16, 2023
मुझे शुरु में लगा "ठिठुरता हुआ गणतंत्र" भारत की व्यवस्था पर सीधा straight forward व्यंग्य होगा। परंतु "ठिठुरता हुआ गणतंत्र" और "भीगी हुई स्वतंत्रता" का कारण जनवरी और अगस्त का मौसम है, यह पढ़कर आप लेखक की समझ व व्यंग्य कला का अंदाजा लगा सकते हैं। किताब पढ़कर ऐसा लगता है, परसाई जी के व्यंग्य scanner से शायद ही कोई घटना, दुर्घटना या सिचुएशन छूटती हो। टिप्पणी चाहे किसी ऑफिस ट्रांसफर्स की हो रही हो , पुलिस कार्रवाई या फिर फिल्मी रोमांच की हो रही हो, परसाई जी की पंक्तियां,आपको हसाकर लोटपोट कर देंगी। "ठिठुरता हुआ गणतंत्र" ऐसी timeless लेखनी है, जो की कई दशकों बाद भी, उतनी ही मजेदार व प्रासंगिक है। "हम बिहार में चुनाव लड़ रहे हैं" और "इंस्पेक्टर मातादीन चांद पर", यह दो chapters मेरे पसंदीदा हैं। परसाई जी light व सरल हिंदी में लिखते थे, यही कारण था कि उनकी लेखनियां जनता ने सर आंखों पर रखी। A brilliant book by a brilliant observer of Indian society. A must read.
Profile Image for Tarun.
115 reviews60 followers
October 24, 2020
परसाई जी का सटीक , सुथरा व्यंग्य आज भी प्रासंगिक है। क्या गहरी नज़र रखते थे! कभी गुदगुदाने , कभी सोचने पर बाध्य कर देने वाली आलोचना के पोषक विटामिन को ग्रहण करने के लिए इस किताब को अवश्य पढ़ें।
Profile Image for Punit.
72 reviews2 followers
April 2, 2025
परसाई जी का एक और राजनितिक और समाजिक व्यंग्य का शानदार मिश्रण..

वे गणतंत्र दिवस की परेड देखते हुए लिखते हैं..
"स्वतंत्रता-दिवस भीगता है और गणतंत्र-दिवस ठिठुरता है। मैं ओवरकोट में हाथ डाले परेड देखता हूँ। रेडियो टिप्पणीकार कहता है - ‘घोर करतल-ध्वनि हो रही है।’ मैं देख रहा हूँ, नहीं हो रही है। हम सब तो कोट में हाथ डाले बैठे हैं।"

हरिशंकर परसाई जी की लेखन शैली को अगर एक शब्द में बयान करें, तो वह है ‘तीखापन’। लेकिन यह तीखापन ऐसा है, जो सिर्फ चुभता नहीं, बल्कि चुभते हुए हंसाता है, सोचने पर मजबूर करता है और फिर आईना दिखाता है।

उनकी लेखनी में न कोई बनावटीपन है, न ही शब्दों का अतिरेक...बस सीधा-सादा, लेकिन ऐसा वार जो सीधे दिल और दिमाग पर असर करता है।

परसाई जी की खासियत यह है कि वह जटिल से जटिल बात को भी इतने सहज ढंग से कह देते हैं कि हर कोई उसे समझ ले। वह लिखते हैं जैसे कोई दोस्त आपके सामने बैठकर गप्पें मार रहा हो...हल्के-फुल्के अंदाज में, मगर हर वाक्य में एक गहरी बात छुपी हुई होती है।

उदाहरणतार्थ वे एक बारात की चर्चा करते हुए लिखते हैं "विवाह का दृश्य बड़ा दारुण होता है. विदा के वक्त औरतों के साथ मिलकर रोने को जी करता है. लड़की के बिछुड़ने के कारण नहीं, उसके बाप की हालत देखकर लगता है, इस कौम की आधी ताकत लड़कियों की शादी करने में जा रही है. पाव ताकत छिपाने में जा रही है- शराब पीकर छिपाने में, प्रेम करके छिपाने में, घूस लेकर छिपाने में- बची हुई पाव ताकत से देश का निर्माण हो रहा है- तो जितना हो रहा है, बहुत हो रहा है. आखिर एक चौथाई ताकत से कितना होगा.." बारात से सरकार तक पंहुँच जाना यही तो कला है...

उनका व्यंग्य कभी सतही नहीं होता। वह सतह को खुरचते हैं और परत-दर-परत समाज की सच्चाई को सामने लाते हैं। चाहे राजनीति हो, धर्म हो या सामाजिक रूढ़िया...परसाई जी की नजर से कोई बच नहीं पाता।

वह लिखते हैं, "आत्मविश्वास धन का होता है, विद्या का भी और बल का भी, पर सबसे बड़ा आत्मविश्वास नासमझी का होता है।" इसे पढ़कर कौन ठहाका नहीं लगाएगा? लेकिन हँसी के पीछे छुपी गहरी चोट को नजरअंदाज करना भी मुश्किल होता है।

वह समाज के नासूर को उंगलियों से छूते हैं और उस पर हल्का-सा नमक छिड़क देते हैं...बस, यही उनकी लेखन शैली का कमाल है। उनकी हर पंक्ति में एक कहानी है, हर शब्द में एक सवाल। जो परसाई जी को पढ़ता है, वह तैयार रहता है..हँसने के लिए भी और थोड़ा शर्मिंदा होने के लिए भी। क्योंकि उनकी कलम सिर्फ लिखती नहीं है, वह जगाती भी है।
Profile Image for Alok Sharma.
80 reviews
August 29, 2020
परसाई जी की जय हो।

अवलोकन में बारीकी किसी मंझे हुए कारीगर सी, कटाक्ष इतने तीखे की एक सूक्ष्म से सूक्ष्म पाखंड करने वाला भी आत्म-अवलोकन करने पर विवश हो जाए।

नजरिए की सीमा इतनी विशालकाय की में स्वयं अपने पाखंड से बिन पर्दे परिचित हो गया।

पूरे समाज को अपना आइना देखने के लिए
घर में रखे आइने को तोड उसकी जगह परसाई जी के व्यंग चस्पा करने चाहिए।

परन्तु पढ़ कर एक निराशा अवश्य हुई।

कैसे भारतीय समाज का राजनीतिक सामाजिक ढांचा ज्यो का त्यों बना हुए है।
इतनी कुरुतियों पर कितनों ने कितनी बार जम कर प्रहार किया पर शायद यह कुटे हुए लोहे के समान अपनी बनावट को कंठस्थ कर चुका है।

पाठक पढ़ कर चकित होगा किस प्रकार यह व्यंग रचनाएं आधुनिक काल में भी अपनी प्रासंगिकता बनाए हुए है।
Profile Image for Manish Sain.
22 reviews
March 16, 2022
There are few who can match Parsai's satire in any language, I'd say. Such timeless writing matched with an understanding of the subject makes it a great collection of some of his choicest critique.
Profile Image for Shashank.
6 reviews5 followers
August 2, 2020
Absolutely amazing book. The satire seems to apt for the times we live in. It could be because, we as a society/country may not have progressed in time. But it could also be due to the depth of understanding Parsai has of the human nature and hence the society as the whole. He refers to himself, in one of the essays, as a pickpocket of experiences of other people. And that he uses these experiences in his writings.
Profile Image for Amit Kumar.
24 reviews
June 4, 2022
Awesome

Parsai ji ki ye kitaab sabhi kitabon ki hi tarah ek utkristh rachna hai yadi aap vyang vidha ko padhna pasand karte hai to ye kitaab aapke liye hai.
9 reviews
October 9, 2022
Nice one especially on Politics

Written in 80s and still seems relevant. Simple and to the point. Comments on human nature and behaviour in Parsai style
Profile Image for Rutam Udgata.
11 reviews
October 20, 2025
इस किताब का एक-एक पन्ना चुमनीय है। हिंदी साहित्य और व्यंग्य में रुचि रखने वाले हर एक पाठक को हरिशंकर परसाई जी की लिखी रचनाओं को पढ़ना चाहिए। वे सही माइनों में व्यंग्य-सम्राट कहे जाते हैं।
Profile Image for Vishvajeet.
33 reviews8 followers
August 31, 2023
"ठिठुरता हुआ गणतंत्र" पढ़ने से पूर्व हमने परसाई जी द्वारा रचित "शिकायत मुझे भी है" पढ़ी थी और उस कृति के विषय में जो भी कहा था, ये कृति उस से बिलकुल भी अलग नही है। उत्कृष्ट हास्य निबंधों का एक संग्रह। परसाई जी की वाक्-पटुता पहले से आखिरी पृष्ट तक बांधे रखती है।
210 reviews
October 3, 2022
very nice book. full of satirism. he had eyes on smallest matters and made good fun of them
24 reviews1 follower
January 6, 2023
One of the best!

Hilarious and sharp commentary on society, as always!A must read! Parsai was a visionary and his critique of the society stands relevant even today.
Displaying 1 - 16 of 16 reviews

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